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भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c7.22

भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c7.22

Language
Hindi

c7.22

२ अशोक के समय अथवा उससे पूर्व व्यंजन के साथ जुड़ने वाली स्वरों की मात्राओं में से केवल 'ई' की प्राचीन मात्रा लुप्त होकर उसके स्थान में नया चिन्ह काम में आने लगा ऐसा ही नहीं, किंतु 'औ' की मात्रा में भी परिव र्तन हुआ होगा, क्योंकि महाक्षत्रप रुद्रदामन् के गिरनार के लेख में 'औ' की मात्रा तीन प्रकार से लगी है:—'पौ' के साथ एक प्रकार की, 'नौ' और 'मौ' के साथ दूसरे प्रकार की और 'यौ' के साथ तीसरी तरह की है (देखो लिपिपत्र = वां). इनमें से पहिले प्रकार की मात्रा तो अशोक के लेखों की शैली की ही है ('ओ' की मात्रा की बाईं तरफ एक और आड़ी लकीर जोड़ी गई है), परंतु दूसरे प्रकार की मात्रा की उत्पत्ति का पता अशोक के लेखों में नहीं लगता और न पिछले किसी लेख में उसका प्रचार पाया जाता है, जिससे यही अनुमान होता है कि उसका रूपांतर अशोक से पूर्व ही हो गया हो और किसी लेखक को उसका ज्ञान होने से उसने उसका भी प्रयोग किया हो, जैसे कि कुटिल लिपि की 'आ' की मात्रा [Image of symbol] (जो व्यंजन के ऊपर लगाई जाती थी) का लिखना इस समय से कई शताब्दी पूर्व से ही उठ गया है और उसके स्थान में व्यंजन की दाहिनी ओर एक खड़ी लकीर '।' लगाई जाती है, परंतु कितने एक पुस्तकलेखकों को अब भी उसका ज्ञान है और जब वे भूल से कहीं 'आ' की मात्रा छोड़ जाते हैं और व्यंजन की दाहिनी ओर उसके लिखने का स्थान नहीं होता तब वे उसके ऊपर कुटिल लिपि का [Image of symbol] चिन्ह लगा देते हैं.