भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c7.75
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c7.75
- Language
- Hindi
c7.75
९ मैक्समुलर, बूलर आदि कितने येक यूरोपियन विद्वान् पाणिनि का ई. स. पूर्व की चौथी शताब्दी में होना मानते हैं और पाणिनीय व्याकरण के अद्वितीय ज्ञाता गोल्डस्टूकर ने पाणिनि का बुद्ध से पूर्व होना माना है. इनमें से गोल्डस्टूकर का लिखना ठीक जचता है, क्योंकि पाणिनि से बहुत समय पीछे कात्यायन ने उसके सूत्रों पर ‘वार्तिक’ लिखे. इसका प्रमाण यह है कि वार्तिकों में न केवल पाणिनि के छोड़े हुए प्रयोगों और अर्थों का स्पष्टीकरण है वरन बहुत से नये प्रयोगों और नये अर्थों का भी विचार है, जो पाणिनि के पीछे व्यवहार में आये होंगे. पाणिनि से [कमसे कम तीन पीढ़ी] पीछे दाक्षायण व्याडि ने पाणिनि के सूत्रों पर ‘संग्रह’ नामक व्याख्यानरूप ग्रंथ रचा. भर्तृहरि ने अपने ‘वाक्यपदीय’ नामक ग्रंथ में लिखा है कि 'संग्रह' के, जो 'वाक्यपदीय' के टीकाकार पुण्यराज के लेखानुसार एक लाख श्लोक का था, अस्त हो जाने पर पतंजलि ने 'महाभाष्य' लिखकर 'संग्रह' के आशय का संक्षेप किया. पतंजलि का समय ई.स. पूर्व की दूसरी शताब्दी निश्चित है. ऐसी दशा में पाणिनि और पतंजलि के बीच कई शताब्दियों का अन्तर होना चाहिये.