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भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c7.81

भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c7.81

Language
Hindi

c7.81

एक ही बात बार बार दोहराना न पड़े इस लिये पाणिनि ने कुछ बातें शीर्षक की तरह स्थान स्थान पर लिख कर नियम कर दिया है कि इसके आगे यह सिलसिला चलेगा. इसको अधिकार कहते हैं और यह अधिकार स्वरित चिह्न से जतलाया गया है. यह स्वरित वेद के उच्चारण के उदात्त, अनुदात्त, स्वरित की तरह उच्चारण का ऊंचा या नीचा स्वर नहीं किंतु वर्ण पर का लिखित चिह्न है (स्वरितो नाम स्वरविशेषो वर्णधर्मो न खरधर्मः पा. १.३.११ पर काशिका) क्योंकि अष्टाध्यायी का सूत्रपाठ एकश्रुति या एकस्वर का पाठ माना जाता है, उसमें उदात्त, अनुदात्त, स्वरित का भेद नहीं हो सकता (एकश्रुत्या सूत्राणां पाठात्, पतंजलि के महाभाष्य के पहले आह्निक पर कैयट की टीका). पतंजलि ने इस सूत्र (१.३.११) के व्याख्यान में यह शंका उठाई है कि स्वरित से हम यह नहीं जान सकते कि यह अधिकार कहां तक जायेगा और इस शंका पर कात्यायन का समाधान लिखा है कि जितने सूत्रों तक अधिकार चलाना हो उतनी ही संख्या का वर्ण उसपर लिख दिया जाय (नावतिथोऽल्लब्धसंख्यातवो योगा्नितिवचनात्सिद्धम् ). कैयट ने इसपर दृष्टांत दिया है कि पा. सू. ५.१.३० पर 'इ' अनुबंध लगा देने से यह जाना जायगा कि यह अधिकार दो सूत्रों तक चलेगा. यों शिवसूत्रों में जो वर्णों का क्रम है उसके स्थानीय मान से अ = १, इ = २, उ = ३. इत्यादि गिनती के संकेत पाणिनि के स्वरित चिह्न में होना कात्यायन ने माना है. आगे चल कर यह भी कहा है कि जहां अधिकार अधिक संख्या के सूत्रों में जाने वाला है और अल् (= वर्ण) कम हैं वहां अधिकार जतलाने वाले सूत्र में पाणिनि ने 'प्राक्' (अमुक शब्द या सूत्र से पहले पहले) लगाया है (पतंजलि — अथेदानों यत्राल्पोयांसोऽलः भूयस्य योगानधिकारोऽनुवर्त्तते कथं तत्र कर्तव्यम् ! कात्यायन — भूयसि प्राग्वचनम्. पतंजलि — भूयसि प्राग्वचनं कर्तव्यम्. भूयसि प्रागभूत इति वक्तव्यम्). जहां पर 'प्राक्' शब्द काम में नहीं लिया है और जहां पर सूत्रों की संख्या अल् (वर्ण) से अधिक है (जैसे ३.१.६१ का अधिकार ५४१ सूत्रों पर है) वहां कोई और स्वरित चिह्न काम में आता होगा. इसीके अनुसार पाणिनि ने जहां यह अधिकार किया है कि 'रीश्वर' के पहले सब निपात कहावेंगे (प्रागरीश्वरान्निपाताः पा. १.४.५६) वहां शुद्ध 'ईश्वर' शब्द काम में न लाकर कृत्रिम 'रीश्वर' काम में लिया है क्योंकि रीश्वर शब्द जहां आता है वहीं यह अधिकार समाप्त होता है (अधिरीश्वरे १.४.६७), आगे जहां 'ईश्वर' शब्द आया है (ईश्वरे तोसुन्कसुनौ ३.४.१३) वहां तक यह अधिकार नहीं चलता. यों 'रीश्वर' शब्द काम में लाने से दो ही बातें प्रकट होती हैं, या तो पाणिनि ने अपने आगे के सूत्र तोते की तरह रट लिये थे इससे 'रीश्वर' पद का प्रयोग किया, या उसने अपना व्याकरण लिख कर तैयार किया जिसकी लिखित प्रति के सहारे अधिकार सूत्र के शब्द स्थिर किये. पाठकों से यह कहना व्यर्थ है कि इन दोनों अनुमानों में से कौन सा मानना उचित है.