भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c7.83
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c7.83
- Language
- Hindi
c7.83
६ 'ग्रंथ' शब्द पाणिनि ने रचित पुस्तक के अर्थ में लिया है (समुदायो यसोऽग्रन्थे १.३.७५; अधिकृत्य कृते ग्रंथे ४.३.८७; कृते ग्रन्थे ४.३.११६ आदि). वेद की शाखाओं के लिये, जो ऋषियों से कही गई हैं (जिन्हें आस्तिक हिन्दू ऋषियों की बनाई हुई नहीं मानते) 'प्रोक्त' शब्द काम में लाया गया है, 'कृत' नहीं (तेन प्रोक्तम् ४.३.१०१) और 'प्रोक्त' ग्रंथों में 'पुराणप्रोक्त' शब्द के प्रयोग से दिखाया है कि कुछ वेद के ब्राह्मण पाणिनि के पहिले के थे और कुछ उन्हीं के काल के (पुराणप्रोक्तेषु ब्राह्मणकल्पेषु ४.३.१०५; वार्तिक 'तुल्यकालत्वात्'), किंतु पाराशर्य (पराशर के पुत्र) और कर्मंद के 'भिक्षुसूत्र,' तथा शिलालि और कृशाश्व के 'नटसूत्रों' को न मालूम क्यों 'प्रोक्त' में गिनाया है. जो हो, 'भिक्षुशास्त्र' और 'नाट्यशास्त्र' के दो दो सूत्र-ग्रंथ उस समय विद्यमान थे (पाराशर्यशिलालिभ्यां भिक्षुनटसूत्रयोः। कर्मन्दकृशाश्वाद्भिनिः ४.३.११०-११). नवीन विषय पर पहिले पहिल बनाये हुए ग्रंथ को 'उपज्ञात' कहा है (उपज्ञाते ४.३.११५; उपज्ञोपक्रमं तदाद्याचिख्यासायां २.४.२१). किसी विषय को लेकर (अधिकृत्य) बने हुए ग्रंथों में 'शिशुक्रन्दीय' (बच्चों के रोने के संबंध का ग्रंथ), 'यमसदीय' (यम की सभा के विषय का ग्रंथ), 'दो नाम मिला कर बना ग्रंथ' (जैसे 'अग्निकाश्यपीय'-यह नाम पाणिनि ने नहीं दिया) और 'इंद्र- जननीय' (इन्द्र के जन्म पर ग्रंथ) के नाम दिये हैं और अंत में 'आदि' लगाकर बतलाया है कि ऐसे ग्रंथ बहुत से होंगे (शिशुकन्दयमसभार्हेन्द्र जननादिभ्यश्छः ४.३.८८). इस प्रकार पाणिनि ने केवल 'ग्रंथ' शब्द ही नहीं दिया वरन कई ग्रंथों के नाम और उनके विषयों का पता भी दिया है. पाणिनि के सूत्र 'कृते ग्रंथे' (४.३.८७) के वार्तिक पर कात्यायन ने आख्यायिका का भी उल्लेख किया है और भाष्यकार पतंजलि ने 'वासवदत्ता', 'सुमनोत्तरा' और 'भैमरथी' आख्यायिकाओं के नाम दिये हैं.
Linked texts (1)
- Aṣṭādhyāyī — Pāṇini, Sanskrit