भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c8.155
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c8.155
- Language
- Hindi
c8.155
आदर्श लिपि में यह गुण होना चाहिये कि प्रत्येक उच्चारण के लिये असंदिग्ध संकेत हो जिससे जो बोला जाय वह ठीक वैसा ही लिखा जाय और जो लिखा जाय वह ठीक वैसा ही पढ़ा जाय. उच्चारित अक्षर और लिखित वर्ण के इस संबंध को निभाने के उद्देश्य का विचार करें तो ब्राह्मी लिपि सर्वोत्तम है और इसमें और सेमिटिक् लिपियों में रात दिन का सा अंतर है. इसमें स्वर और व्यंजन पूरे हैं और स्वरों में ह्रस्व, दीर्घ के लिये तथा अनुस्वार और विसर्ग के लिये उपयुक्त संकेत न्यारे न्यारे हैं; व्यंजन भी उच्चारण के स्थानों के अनुसार वैज्ञानिक क्रम से जमाये गए हैं. इसमें किसी प्रकार की त्रुटि नहीं है और आर्य भाषाओं की ध्वनियों को व्यक्त करने के लिये इसमें किसी प्रकार के संशोधन या परिवर्तन की अपेक्षा नहीं है. व्यंजनों के साथ स्वरों के संयोग को मात्रा के चिह्नों से प्रकट करने की इसमें ऐसी विशेषता है जो किसी और लिपि में नहीं है. साहित्य और सभ्यता की अति उच्च अवस्था में ही ऐसी लिपि का विकास हो सकता है. वैदिक और प्राचीन संस्कृत वाङ्मय के ६३ या ६४ मूल उच्चारणों के लिये केवल १८ उच्चारणों के प्रकट करने वाले २२ संकेतों की दरिद्र सेमिटिक् लिपि कैसे पर्याप्त होती ? सेमिटिक् लिपि में और उससे निकली सभी लिपियों में स्वर और व्यंजन पृथक् पृथक् नहीं हैं. स्वरों में ह्रस्व दीर्घ का भेद नहीं. न उनके अक्षर विन्यास का कोई भी क्रम है. एक उच्चारण के लिये एक से अधिक चिह्न हैं और एक ही चिह्न एक नहीं, किंतु अनेक उच्चारणों के लिये भी है. व्यंजन में स्वर का योग दिखलाने के लिये मात्रा का संकेत नहीं, परंतु स्वर ही व्यंजन के आगे लिखा जाता है और संयुक्त ध्वनि के लिये वर्णों का संयोग नहीं. स्वर भी अपूर्ण हैं. ऐसी अपूर्ण और क्रमसहित लिपि को ले कर, उसकी लिखावट का रूप पलट कर, वर्णों को तोड़ मरोड़ कर, केवल अट्ठारह उच्चारणों के चिह्न उसमें पाकर बाकी उच्चारणों के संकेत स्वयं गढ़ कर, स्वरों के लिये मात्राचिह्न बना कर, अनुस्वार और विसर्ग की कल्पना कर, स्वर व्यंजनों को पृथक् कर, उन्हें उच्चारण के स्थान और प्रयत्न के अनु सार नए क्रम से सजा कर सर्वांगपूर्ण लिपि बनाने की योग्यता जिस जाति में मानी जाती है, क्या वह इतनी सभ्य नहीं रही होगी कि केवल अट्ठारह अक्षरों के संकेतों के लिये दूसरों का मुंह न ताक कर उन्हें स्वयं ही अपने लिये बना ले?