भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c8: २—ब्राह्मी लिपि की उत्पत्ति
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c8
- Language
- Hindi
२—ब्राह्मी लिपि की उत्पत्ति
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मौर्यवंशी राजा अशोक के लेखों तथा ई. स. पूर्व की चौथी शताब्दी से लगाकर ई. स. की तीसरी शताब्दी के आसपास तक के कितने एक सिक्कों आदि से पाया जाता है कि उस समय इस देश में दो लिपियां प्रचलित थीं; एक तो नागरी की नांई बाईं तरफ से दाहिनी ओर लिखी जाने वाली सार्वदेशिक, और दूसरी फ़ारसी की तरह दाहिनी ओर से बाईं ओर लिखी जाने वाली एकदेशिक. इन लिपियों के प्राचीन नाम क्या थे इस विषय में ब्राह्मणों के पुस्तकों में तो कुछ भी लिखा नहीं मिलता. जैनों के ‘पण्णवणासूत्र’ और ‘समवायांगसूत्र’ में १८ लिपियों१ के नाम मिलते हैं, जिनमें सब से पहिला नाम ‘बंभी’ (ब्राह्मी) है, और भगवतीसूत्र में ‘बंभी’ (ब्राह्मी) लिपि को नमस्कार करके (नमो बंभीए लिविए) सूत्र का प्रारंभ किया गया है. बौद्धों के संस्कृत पुस्तक ‘ललितविस्तर’२ में ६४ लिपियों३ के नाम मिलते हैं जिनमें सब से पहिला ‘ब्राह्मी’ और दूसरा ‘खरोष्ठी’ हैं. चीन में बौद्ध धर्म का प्रचार होने के पश्चात् ई. स. की पहिली से आठवीं शताब्दी तक हिंदुस्तान से कितने ही बौद्ध श्रमण अपने धर्म के प्रचार के निमित्त समय समय पर चीन में गये और उन्होंने बौद्धों के अनेक संस्कृत और प्राकृत ग्रंथों के चीनी भाषा में अनुवाद किये४ या उस काम में सहायता दी. चीन में
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१ बंभी, जवणाणि (या जवणालिया), दोसापुरिया (या दोसापुरिसा), खरोट्ठी (या खरोठी), पुक्खरसारिया, भोगवड्या, पहाराड्या (या पहराइया), उयअंतरिक्खिया (या उयं तरकरिया), अक्खरपिट्ठिया (या अक्खरपुंठिया), वेवड्डया (या वेणड्या), गि[णि?]गहड्या (या गिणहत्तिया), अंकलिवि (या अंकलिक्खा), गणितलिवि (या गणियलिवि), गंधव्वलिवि, आदंसलिवि (या आयसलिवि), माहेसरी (या माहेस्ससी), दामिली और पोलिंदी. ये नाम पण्णवणासूत्र की दो प्राचीन हस्तलिखित पुस्तकों से उद्धृत किये गये हैं.
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२ ‘ललितविस्तर’ में बुद्ध का चरित है. यह ग्रंथ कब बना यह निश्चित नहीं, परंतु इसका चीनी अनुवाद ई. स. ३०८ में हुआ था.
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३ ब्राह्मी, खरोष्ठी, पुष्करसारी, अंगलिपि, वंगलिपि, मगधलिपि, मांग्ल्यलिपि, मनुष्यलिपि, अंगुलीयालिपि, शकारिलिपि, ब्रह्मवल्लीलिपि, द्राविडलिपि, कर्नारिलिपि, दक्षिणलिपि, उग्रलिपि, संख्यालिपि, अनुलोमलिपि, ऊर्ध्वधनुर्लिंपि, दरदलिपि, खास्यलिपि, चीनलिपि, हूणलिपि, मध्याक्षरविस्तरलिपि, पुष्पलिपि, देवलिपि, नागलिपि, यक्षलिपि, गन्धर्वलिपि, किन्नरलिपि, महोरगलिपि, असुरलिपि, गरुडलिपि, मृगचक्रलिपि, चक्रलिपि, वायुमरुलिपि, भौमदेवेलिपि, अंतरिक्षदेवेलिपि, उत्तरकुरुद्वीपलिपि, अपरगोडालिलिपि, पूर्वविदेहलिपि, उत्क्षेपलिपि, निक्षेपलिपि, विक्षेपलिपि, प्रक्षेपलिपि, सागरलिपि, वज्रलिपि, लेखप्रतिलेखलिपि, अनुद्रुतलिपि, शास्त्रावर्तलिपि, गणावर्तलिपि, उत्क्षेप्यावर्तलिपि, विक्षेपावर्तलिपि, पादलिखितलिपि, द्विरुत्तरपदसन्धिलिखितलिपि, दशोत्तरपदसन्धिलिखितलिपि, अध्याहारिणीलिपि, सर्वरुतसंग्रहणीलिपि, विद्यानुलोमलिपि, विमिश्रितलिपि, ऋषितपस्तप्तलिपि, धरणीप्रेक्षणालिपि, सर्वौषधिनिष्यन्दालिपि, सर्वसारसंग्रहणीलिपि और सर्वभूतरुद्ग्रहणीलिपि (ललितविस्तर, अध्याय १०). इनमें से अधिकतर नाम कल्पित हैं.
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४ ई. स. ६७ में काश्यप मातंग चीन के बादशाह मिंग-टी के निमंत्रण से वहां गया, और उसके पीछे मध्यभारत का श्रमण गोभरण भी वहां पहुंचा. इन दोनों ने मिलकर एक सूत्रग्रंथ का अनुवाद किया और काश्यप के मरने के बाद गोभरण ने ई. स. ६८ और ७० के बीच ५ सूत्रों के अनुवाद किये. मध्यभारत के श्रमण धर्मकाल ने चीन में रह कर ई. स. २५० में ‘पातिमोक्ख’ का; धर्मप्रिय ने ई. स. ३८२ में ‘दशसाहस्रिका प्रज्ञापारमिता’ का; कुमारजीव ने ई. स. ४०२ और ४१२ के बीच ‘सुखावतीव्यूह’ (छोटा), ‘वज्रच्छेदिका’ आदि कई ग्रंथों का; श्रमण पुण्यत्रत और कुमारजीव ने मिलकर ई. स. ४०४ में ‘सर्वास्तिवादविनय’ का; मध्यभारत के श्रमण धर्मजातयशस् ने ई. स. ४८१ में ‘अमृताथसूत्र’ का; बुद्धशांत ने ई. स. ५२४ और ५३६ के बीच १० ग्रंथों का और प्रभाकरमित्र ने ई. स. ६२७ और ६३३ के बीच ३ ग्रंथों का चीनी भाषा में अनुवाद किया. मध्यभारत का श्रमण पुण्योपाय (नाथी या नदी?) ई. स. ६५५ में बौद्धों के दोनों संप्रदायों (महायान और हीनयान) के त्रिपिटक से संबंध रखने वाले १५०० से अधिक पुस्तक, जो उसने हिन्दुस्तान और सीलोन (सिंहलद्वीप, लंका) में संग्रह किये थे, लेकर चीन में गया. दक्षिण का श्रमण वज्रबोधि और उसका शिष्य अमोघबज्र ई. स. ७१९ में चीन में गये. वज्रबोधी ने ई. स. ७२३ और ७३० के बीच ४ ग्रंथों का अनुवाद किया और वह ई. स. ७३२ में ७० वर्ष की अवस्था में मरा, जिसके बाद अमोघबज्र ने ई. स. ७४१ में हिन्दुस्तान और सीलोन की यात्रा की. ई. स. ७४६ में वह फिर चीन में पहुंचा और उक्त सन् से लगा कर उसकी मृत्यु तक, जो ई. स. ७७४ में हुई, उसने ७७ ग्रंथों के चीनी अनुवाद किये.
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भी बौद्ध धर्म के तत्वों को जानने के लिये संस्कृत और प्राकृत का पठन पाठन होने लगा और वहां के बहुतेरे विद्वानों ने समय समय पर अपनी भाषा में बौद्ध धर्म के संबंध में अनेक ग्रंथ रचे जिनमें हमारे यहां की कई प्राचीन बातों का पता लगता है. ई. स. ६६८ में बौद्ध विश्वकोष ‘फा युअन चु लिन’ बना, जिसमें ‘ललितविस्तर’ के अनुसार ६४ लिपियों के नाम दिये हैं, जिनमें पहिला ब्राह्मी और दूसरा खरोष्ठी (किय-लु-से-टो=क-लु-से-टो=ख-रो-स-ट=खरोष्ठ) है और ‘खरोष्ठ’ के विवरण में लिखा है कि चीनी भाषा में इस शब्द का अर्थ ‘गधे का होठ’ होता है१. उसी पुस्तक में भिन्न भिन्न लिपियों के वर्णन में लिखा है कि ‘लिखने की कला का शोध तीन दैवी शक्ति वाले आचार्यों ने किया, उनमें से सब से प्रसिद्ध ब्रह्मा है, जिसकी लिपि (ब्राह्मी) बाईं ओर से दाहिनी ओर पढ़ी जाती है. उसके बाद किय-लु (किय-लु-से-टो=खरोष्ठ का संक्षिप्त रूप) है, जिसकी ‘लिपि दाहिनी ओर से बाईं ओर पढ़ी जाती है और सब से कम महत्व का त्सं-की है, जिसकी लिपि (चीनी) ऊपर से नीचे की तरफ़ पढ़ी जाती है. ब्रह्मा और खरोष्ठ भारतवर्ष में हुए और त्सं-की चीन में. ब्रह्मा और खरोष्ठ ने अपनी लिपियां देवलोक से पाईं और त्सं-की ने अपनी लिपि पक्षी आदि के पैरों के चिन्हों पर से बनाईं.’२
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उक्त चीनी पुस्तक के लेख से स्पष्ट हो गया कि जो लिपि बाईं से दाहिनी ओर लिखी जाती है उसका प्राचीन नाम ‘ब्राह्मी’ और दाहिनी से बाईं ओर लिखी जाने वाली का ‘खरोष्ठी’ था. ‘ब्राह्मी’३ लिपि इस देश की स्वतंत्र और सार्वदेशिक लिपि होने से ही जैन और बौद्धों के ग्रंथ भी उसीमें लिखे जाने लगे और इसी से उन्होंने लिपियों की नामावलि में इसको प्रथम स्थान दिया.
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३ ब्राह्मी लिपि वास्तव में ‘नागरी’ (देवनागरी) का प्राचीन रूप ही है. ‘नागरी’ नाम कब से प्रसिद्धि में आया यह निश्चित नहीं परंतु तांत्रिक समय में ‘नागर’ (नागरी) नाम प्रचलित था, क्यों कि ‘नित्याषोडशिकार्णव’ की ‘सेतुबंध’ नामक टीका का कर्ता भास्करानंद एकार (ए) का त्रिकोण रूप ‘नागर’ (नागरी) लिपि में होना बतलाता है (कोषत्रयवदु- बभ्रौ लोखो यस्य ततः। नागरलिप्या सामप्रदायिकैरेकारस्य त्रिकोणाकारतयैव लेखनात.। इं. ऍ; जिल्द ३५, पृ. २८३). ‘वातुलगम’ की टीका में लिखा है कि शिव मंत्र (ह्रीं) के अक्षरों से शिव की मूर्ति ‘नागर’ (नागरी) लिपि से बन सकती है; दूसरी लिपियों से बन नहीं सकती (शिवमन्त्रवाच्यव्यंक्षराकृतिः नागरलिपिभिरुच्चारयितुं शक्यते । व्यतिरिक्तालिपिभिर्नोच्चारयितं शक्यते । इं. ऍ; जिल्द ३४, पृ. २७६). यूरोपियन विद्वानों ने ‘ब्राह्मी’ लिपि का ‘पाली’, ‘इंडियन पाली’, ‘साउथ (दक्षिणी) अशोक’ या ‘लाट’ लिपि आदि नामों से भी परिचय दिया है परंतु हम इस लेख में सर्वत्र ‘ब्राह्मी’ नाम का ही प्रयोग करेंगे.
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जब कितने एक यूरोपियन विद्वानों ने यह मान लिया कि हिंदू लोग पहिले लिखना नहीं जानते थे तब उनको यह भी निश्चय करने की आवश्यकता हुई कि उनकी प्राचीन लिपि (ब्राह्मी) उन्होंने स्वयं बनाई वा दूसरों से ली. इस विषय में भिन्न भिन्न विद्वानों ने कई भिन्न भिन्न अटकलें लगाईं जिनका सारांश नीचे लिखा जाता है.
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डॉ. आंफ्रेड मूलर का अनुमान है कि सिकंदर के समय यूनानी लोग हिन्दुस्तान में आये उनसे यहां वालों ने अक्षर सीखे. प्रिन्सेप और सेनार्ट४ ने भी यूनानी लिपि से ब्राह्मी लिपि का बनना अनुमान किया और विल्सन५ ने यूनानी अथवा फिनिशियन लिपि से उसका उद्भव माना. हलवे६ ने लिखा है कि ‘ब्राह्मी एक मिश्रित लिपि है जिसके आठ व्यंजन तो ज्यों के त्यों ई. स. पूर्व की चौथी शताब्दी के ‘अरमहक’ अक्षरों से; ६ व्यंजन, दो प्राथमिक स्वर, सब मध्यवर्ती स्वर और अनुस्वार आरियन्नो-पाली(=खरोष्ठी) से; और पांच व्यंजन तथा तीन प्राथमिक स्वर प्रत्यच् वा गौणरूप से
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४ इं. ऍ; जिल्द ३५, पृ. २५३.
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प्रज्ञ नामक श्रमण ई. स. ७८२ में चीन गया और ई. स. ७८५ और ८१० के बीच उसने और एक दूसरे श्रमण ने मिल कर ‘महायानबुद्धिषट्पारमितासूत्र’ तथा तीन दूसरे पुस्तकों का चीनी अनुवाद किया. ये थोड़े से नाम केवल उदाहरणार्थ दिये गये हैं.
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१ इं. ऍ; जिल्द ३४, पृ. २१.
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२ इं. ऍ., जिल्द ३४, पृ. २१.
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५ ज. ए; ई. स. १८८५, पृ. २६८.
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'यूनानी लिपि से लिये गये हैं,' और यह मिश्रण ई. स. पूर्व ३२५ के आस पास (अर्थात् सिकंदर के इस देश में आने के बाद) हुआ माना जाता है.'
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कस्ट१ का मानना है कि एशिया के पश्चिम में रहने वाले फिनिशियन् लोग ई. स. पूर्व की आठवीं शताब्दी में लिखना जानते थे और उनका वाणिज्यसंबंध इस देश (हिन्दुस्तान) के साथ रहने तथा उन्हींके अक्षरों से ग्रीक, रोमन तथा सेमेटिक भाषाओं के अक्षर बनने से अनुमान होता है कि ब्राह्मी लिपि भी फिनिशियन् लिपि से बनी होगी.
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सर् विलियम जोन्स२ ने सेमिटिक् से ब्राह्मी की उत्पत्ति होना अनुमान किया, जिसका कॉप३ तथा लेप्सिअस४ ने अनुमोदन किया. फिर वेबर५ ने सेमिटिक् और ब्राह्मी अक्षरों के बीच कुछ समानता दिखला कर उसी मत को पुष्ट किया। जिसको बेन्फ़ी६, पॉट्७, वेस्टर्गाई८, मैक्समूलर९, फ्रेडरिख मूलर१०, साइज११, ह्रिटनी१२ आदि विद्वानों ने थोड़े बहुत संदेह के साथ स्वीकार किया.
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स्टिवन्सन५ का अनुमान है कि ब्राह्मी लिपि या तो फिनिशियन् लिपि से बनी हो या मिसर के अक्षरों से.
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पॉल गोल्डस्मिथ६ का मानना है कि फिनिशियन् अक्षरों से सिलोन (सिंहलद्वीप, लंका) के अक्षर बने और उनसे भारतवर्ष के; परंतु ई. मूलर७ का कथन है कि सीलोन में लिखने का प्रचार होने के पहिले भारतवर्ष में लिखने का प्रचार था.
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बर्नेल८ का मत यह है कि फिनिशियन् से निकले हुए अरमइक अक्षरों से ब्राह्मी अक्षर बने, परंतु आइजक टेलर९ लिखता है कि अरमइक और ब्राह्मी अक्षर परस्पर नहीं मिलते.
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९ टे; आ; जि. २, पृ. ३१२.
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लेनोर्मेट१० कहता है कि फिनिशियन् अक्षरों से अरब के हिमिअरैटिक अक्षर बने और उनसे ब्राह्मी.
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१० पेंस ऑन फिनिशियन आल्फ़ाबेड्; जि. १, पृ. १५०.
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डीके११ का मत यह है कि ब्राह्मी लिपि असीरिआ१२ की 'क्युनिफ़ॉर्म'१३ लिपि से किसी प्राचीन दक्षिणी१४ सेमिटिक लिपि के द्वारा, जिससे हिमिअरेटिक् लिपि निकली, बनी है.
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२ इं. ऍ; जि. ३५ पृ. २५३.
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३ Indische Skizzen, p. 225-250.
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४ इं. ऍ; जि. ३५, पृ. २५३.
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११ Zeitschrift der Deutschen Morgenlandischen Gessellschaft, Band, XXXI, 398 f.
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१२ असीरिआ के लिये देखो पृ. १, टि. ३.
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१३ यूरोपियन् विद्वानों ने 'क्युनिफ़ॉर्म' उस लिपि का नाम रक्खा है जिसके अक्षर तीर के फल की आकृति के कई चिह्नों को मिलाने से बनते हैं. इस बहुत प्राचीन और विचित्र लिपि के लेख असीरिआ, बाबीलन् तथा ईरान आदि में मिलते हैं. ईरान के प्रसिद्ध बादशाह दारा ने अपना वृत्तान्त इसी लिपि में (तीन भाषाओं में) बेहिस्तान नामक स्थान के चटान पर खुदवाया था.
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१४ फिनिशियन् लिपि से निकली हुई लिपियों में से हिमिअरेटिक् (सेबियन्), इथिओपिक्, कूफ़ी और अरबी आदि दक्षिणी, और अरमइक, सीरिअक और चहिडअन् उत्तरी सेमिटिक् लिपियां कहलाती हैं.
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आइजक टेलर लिखता है कि 'ब्राह्मी लिपि किसी अज्ञात दक्षिणी सेमिटिक लिपि से निकली होगी. वास्तव में वह किस लिपि से निकली यह अब तक मालूम नहीं हुआ। परंतु ओमन१५ या हँड्रेमॉंट१६ या ओर्मेज्१७ आदि के खंडहरों में उस (मूललिपि) का पता एक न एक दिन लगना संभव है.'
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५ ज. बॉ. ब्रॅ. रॉ. ए. सो; जि. ३, पृ. ७५.
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६ ऍकेडेमी; ई. स. १८७७ ता. ६ जनवरी.
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७ मू; रि. ए. इं. सी; पृ. २४.
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१५ अरब के एक प्रदेश का नाम जिसका प्रधान नगर मसकत है.
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१६ अरब के दक्षिण तट पर का एक इलाक़ा जो ओमन से पश्चिम की तरफ़ है.
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१७ ईरान के समुद्र तट पर का एक प्राचीन शहर.
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ऍडवर्ड क्लॉड१८ लिखता है कि फिनिशियन् से सेबियन् (हिमिअरेटिक) लिपि निकली और उससे ब्राह्मी.
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१ ज. रॉ. ए. सो; जिल्द १६, पृ ३२६, ३५६.
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८ ब; सा. इं. पे; पृ. ६.
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१८ स्टोरी ऑफ़ दी आल्फ़ाबेट्; पृ. २०७.
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ई. स. १८६५ में बूलर ने "भारतवर्ष की ब्राह्मी लिपि की उत्पत्ति' विषयक एक छोटी पुस्तक अंग्रेज़ी में लिखी, जिसमें वेबर का अनुकरण कर यह सिद्ध करने का यत्न किया गया कि ब्राह्मी लिपि के २२ अक्षर उत्तरी सेमिटिक लिपियों से लिये गये और बाक़ी के उन्हींपर से बनाये गये हैं, अर्थात् कितने एक अक्षर प्राचीन फिनिशियन- अक्षरों से, कुछ मोअब के राजा मेशा के लेख के फिनिशियन-अक्षरों से और पांच अक्षर असीरिया के तोलों पर खुदे हुए अक्षरों से मिलने हुए बतलाये हैं. इसमें बहुत कुछ खैंचतान की गई है जिसके विषय में आगे लिखा जायगा.
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बूलर के उक्त पुस्तक के प्रकट होने के बाद चार और विद्वानों ने भी प्रसंगवशात् इस विषय में अपनी अपनी संमति प्रकट की है. उनमें से प्रॉ. मॅकडॉनल्ड१ बूलर के मत को स्वीकार करता है.
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१ मॅक; हि. सं. लि; पृ. १६.
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डॉ. राइस डेविड्ज़२ ने इस विषय के भिन्न भिन्न मतों का उल्लेख करने के पश्चात् अपनी संमति इस तरह प्रकट की है कि 'मैं यह मानने का साहस करता हूं कि इन [ भिन्न भिन्न ] शोधों के एकीकरण के लिये केवल यही कल्पना हो सकती है कि ब्राह्मी लिपि के अक्षर न तो उत्तरी और न दक्षिणी सेमिटिक अक्षरों से बने हैं, किंतु उन अक्षरों से जिनसे उत्तरी और दक्षिणी सेमिटिक अक्षर स्वयं बने हैं अर्थात् युफ्रेटिस नदी की वादी की सेमिटिक से पूर्व की किसी लिपि से.'
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२ डे; बु. इं; पृ. ११४.
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डॉ. बार्नेट३ बूलर का ही अनुसरण करता है और प्रो. रॅपसन्४ ने उपर्युक्त मोअब के लेख की फ़िनिशियन लिपि से ब्राह्मी लिपि की उत्पत्ति मानी है.
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३ बा; ऐं. इं; पृ. २२५.
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४ रॅ ; ए. इं; पृ. १७-१८.
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इस प्रकार कई एक यूरोपियन विद्वान ब्राह्मी लिपि की उत्पत्ति का पता लगाने के लिये हिअरोटिक (मिसर की), क्युनिफ़ार्म (असीरिया की), फ़िनिशियन, हिमिअरोटिक (सेबियन), अरमइक, और खरोष्ठी लिपियों में से अपनी अपनी रुचि के अनुसार किसी न किसी एक की शरण लेते हैं. आइज़क टेलर इनमें से किसी में भी ब्राह्मी से समानता न देख ओमन, हॅड्रमाँट या ओर्मज़ के खंडहेरों में से किसी नई लिपि के मिलने की राह देखता है और डॉ. राइस डेविड्ज़ युफ्रेटिस नदी की वादी में से सेमिटिक लिपियों से पूर्व की किसी अज्ञात लिपि का पता लगा कर उपर्युक्त भिन्न भिन्न मतों का एकीकरण करने की आशा करता है.
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यदि ऊपर लिखी हुई लिपियों में से किसी एक की ब्राह्मी के साथ कुछ भी वास्तविक समानता होती तो सर्वथा इतने भिन्न मत न होते; जिस लिपि में समानता पाई जाती उसीको सब स्वीकार कर लेते, परंतु ऐसा न होना ही उपर्युक्त भिन्न भिन्न कल्पनाओं का मूल हुआ जो साथ ही साथ उन कल्पनाओं में हठधर्मी का होना प्रकट करता है.
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यह तो निश्चित है कि चाहे जिन दो लिपियों की वर्णमालाओं का परस्पर मिलान करने का उद्योग किया जावे तो कुछ अक्षरों की आकृतियां परस्पर मिल ही जाती हैं चाहे उनके उच्चारणों में कितना ही अंतर क्यों न हो. यदि ब्राह्मी लिपि का वर्तमान उर्दू लिपि के टाइप (छापे के अक्षरों) से मिलान किया जावे तो ब्राह्मी का ‘र’ [Page: vertical stroke representing Brahmi letter ra] (अलिफ़) से, ‘ज’ ع (ऐन) से, और ‘ल’ ل (लाम्) से मिलता हुआ है. इसी तरह यदि ब्राह्मी का वर्तमान अंग्रेज़ी (रोमन) टाइप से मिलान किया जावे तो 'ग' A (ए) से, 'ध' D (डी) से, 'ज' E (ई) से, 'र' । (आइ) से, 'त' J (जे) से, 'उ' L (एल) से, 'ठ' O (ओ) से, 'प' U (यू) से, 'क' X (ऐक्स) से और 'ओ' Z (ज़ेड्) से बहुत कुछ मिलता हुआ है. इस प्रकार उर्दू के तीन और अंग्रेज़ी के दश अक्षर ब्राह्मी से आकृति में मिलने पर भी यह नहीं कहा जा सकता कि ब्राह्मी लिपि उर्दू या अंग्रेज़ी से निकली है क्यों कि समान उच्चारण वाले एक भी अक्षर में (सिवाय उर्दू के 'लाम्' ل और ब्राह्मी के 'ल' के) समानता, जो लिपियों के परस्पर संबंध को निश्चय करने की एक मात्र कसौटी है, पाई नहीं जाती.
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ई. स. पूर्व की सातवीं शताब्दी के आसपास फ़िनिशियन लिपि से ग्रीक (यूनानी) अक्षर बने, जो प्रारंभ में दाहिनी ओर से बाईं ओर को लिखे जाते थे, परंतु पीछे से बाईं ओर से दाहिनी ओर लिखे जाने लगे जिससे कुछ अक्षरों१ का रुख़ बदल गया. इस फेरफार के पीछे उनसे पुराने लैटिन और लैटिन से अंग्रेज़ी (रोमन) अक्षर बने. यों फ़िनिशियन और वर्तमान अंग्रेज़ी (रोमन) अक्षरों का लगभग २६०० वर्ष पूर्व का संबंध होने पर भी उनका परस्पर मिलान किया जावे तो A (ए), B (बी), D (डी), E (ई), H (ऐच), K (के), L (ऐल), M (ऐम् ), N (ऐन् ), P (पी), Q (क्यू), R (आर) और T (टी) ये १३ अक्षर अपने मूल फ़िनिशियन् अक्षरों से बहुत कुछ मिलते हुए हैं.
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१ फ़िनिशियन् के अक्षर 'हे' 'वाव्' 'काफ्' और 'रेश' से क्रमशः निकले हुए चार ग्रीक (यूनानी) अक्षरों 'एप्सिलन,' 'वाओ,' 'कप्पा' और 'ह्रो' का रुख बदल गया. पीछे से ग्रीक लिपि में 'वाओ' का प्रचार न रहा.
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इसी तरह अशोक के समय की ब्राह्मी लिपि का उपर्युक्त हिअरेटिक, फ़िनिशियन् आदि लिपियों के साथ मिलाने करने पर यदि ब्राह्मी उनमें से किसी से निकली हो तो उस लिपि के साथ ब्राह्मी की समानता, अंग्रेज़ी और फ़िनिशियन् के बीच की समानता से बहुत अधिक होनी चाहिये थी क्यों कि वर्तमान अंग्रेज़ी की अपेक्षा ब्राह्मी का फ़िनिशियन् के साथ क़रीब २२०० वर्ष पहिले का संबंध होता है; परंतु ब्राह्मी का उक्त लिपियों के साथ मिलान करने से पाया जाता है कि:—
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इजिप्त (मिसर) की हिअरेटिक्२ लिपि का एक भी अक्षर समान उच्चारण वाले ब्राह्मी अक्षर से नहीं मिलता.
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असीरिया३ की 'क्युनिफ़ॉर्म' लिपि से न तो फ़िनिशियन् आदि सेमिटिक् लिपियों का और न ब्राह्मी का निकलना संभव है. वह लिपि भी प्रारंभ में चित्रात्मक थी परंतु पीछे से ईरानियों ने उसे वर्णात्मक बनाया तो भी उसके अक्षर चलती हुई क़लम से लिखे नहीं जा सकते. उसका प्रत्येक अक्षर तीर के फल की सी आकृति के कई चिन्हों को मिलाने से बनता है. वह भी एक प्रकार से चीनी लिपि की नांई चित्रलिपि सी ही है और उसका लिखना सरल नहीं किंतु विकट है.
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३ एशिया के पश्चिमी भाग में युफ़्रेटिज़ नदी के पास का एक प्रदेश जो तुर्क राज्य में है. प्राचीन काल में यह बड़ा प्रतापी राज्य था जिसकी राजधानी निवेवा थी. इस राज्य का विस्तार बढ़ता घटता रहा और एक समय मेड़िआ, पर्शिआ (ईरान), अर्मीनिआ, सीरिआ आदि देश इसीके अंतर्गत थे. ऐसा पाया जाता है कि यह राज्य प्राचीन बाबीलन के राज्य में से निकला और पीछा उसीमें मिल गया. मुसलमानों के राजत्वकाल में बड़ी आबादी वाला यह राज्य ऊजड़ सा हो गया. 'क्युनिफ़ॉर्म' लिपि यहीं के लोगों ने प्रचलित की थी.
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फ़िनिशियन् लिपि की वर्णमाला में २२ अक्षर हैं जिनमें से केवल एक 'गिमेल्' (ग) अक्षर (मोअब के लेख का) ब्राह्मी के 'ग'४ से मिलता है.
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२ मिसर में बहुत प्राचीन काल में जो लिपि प्रचलित थी वह अक्षरात्मक नहीं किंतु चित्रलिपि थी. उसमें अक्षर न थे किंतु केवल आशय सूचक चित्र बनाये जाते थे जैसे कि 'मनुष्य ने प्रार्थना की' कहना हो तो हाथ जोड़े हुए मनुष्य का चित्र बना दिया जाता था. इसी तरह कई भिन्न भिन्न चिन्हों द्वारा कोई एक विषय बतलाया जाता था. उसके पीछे उसी चित्रलिपि से वर्णात्मक लिपि बनी जिसको यूरोपियन् विद्वान् 'हिअरेटिक्' कहते हैं. उसीसे फ़िनिशियन् लिपि का निकलना माना जाता है.
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४ यदि केवल आकृति की समानता देखी जावे तो फ़िनिशियन् का 'दालेथ्' (द) ब्राह्मी के 'ए' से, 'तेथ्' (त) 'ध' से (कुछ कुछ), 'ऐन्' (ए) 'ठ' से, 'त्साधे' (स) 'झ' से (कुछ कुछ) और 'ताव्' (त) 'क' से (ठीक) मिलता हुआ है. यह समानता ठीक वैसी ही है जैसी कि ऊपर (पृ. २० में) बतलाई हुई वर्तमान अंग्रेज़ी टाइप (छापे के अक्षरों) के १० अक्षरों की ब्राह्मी के १० अक्षरों से.
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प्राचीन ग्रीक (यूनानी) लिपि के दो अक्षर 'गामा' (ग) और 'थीटा'५ (थ) ब्राह्मी के 'ग' और 'थ' से मिलते हैं.
c8.65
५ ग्रीक थीटा (थ) फ़िनिशियन् 'तेथ' से निकला है जिसका मूल उच्चारण 'त' था और उसीसे अरबी का 'तोए' (b) निकला. ग्रीक में 'त' का उच्चारण न होने से फ़िनिशियन् 'ताओ' का ग्रीक में टाओ (ट) बनाया गया और तेथ् को थीटा (थ). फ़िनिशियन् में 'ट' या 'थ' का उच्चारण ही न था.
c8.66
हिमिअरिटिक१ लिपि के २२ अक्षरों में से केवल एक 'गिमे़ल' (ग) अक्षर टेढ़ा करने पर ब्राह्मी के 'ग' से मिलता है.
c8.67
अरमइक्२ लिपि में से भी केवल एक गिमेल अक्षर 'ग' से मिलता है.
c8.68
खरोष्ठी लिपि की वर्णमाला के ३७ अक्षरों में से एक भी अक्षर ब्राह्मी लिपि से नहीं मिलता.
c8.69
लिपियों के इस मिलान को पढ़ कर पाठक लोग यह प्रश्न किये बिना न रहेंगे कि जब बूलर फ़िनिशिअन् लिपि के २२ अक्षरों से ब्राह्मी के २२ अक्षरों की उत्पत्ति बतलाता है तब तुम इन लिपियों के समान उच्चारण वाले अक्षरों में से केवल एक 'गिमेल' (ग) अक्षर की ब्राह्मी के 'ग' से समानता होना प्रकट करते हो यह क्या बात है? इसके उत्तर में मेरा कथन यह है कि पृष्ठ २४ में प्राचीन अक्षरों का एक नक्शा३ दिया है जिसमें मिसर के हिअरेटिक, फ़िनिशिअन्, हिमिअरिटिक (सेबियन्) और अरमइक् लिपियों के प्राचीन अक्षर दिये हैं और उनके साथ ही साथ समान उच्चारण वाले खरोष्ठी तथा ब्राह्मी अक्षर भी दिये हैं. उनका परस्पर मिलान करने से पाठकों को मालूम हो ही जायगा कि सेमिटिक और ब्राह्मी लिपि में वास्तविक समानता कितनी सी है. तो भी उनको यह जिज्ञासा रह जायगी कि समान उच्चारण वाले अक्षर तो परस्पर मिलते नहीं, ऐसी दशा में बूलर ने फ़िनिशिअन् के २२ अक्षरों से, जो ब्राह्मी के १८ उच्चारणों४ का ही काम दे सकते हैं, ब्राह्मी के २२ अक्षरों का निकलना कैसे बता दिया. इस लिये हम बूलर के मिलान का कुछ परिचय यहां करा देते हैं.
c8.70
१ मुसलमानी धर्म के प्रादुर्भाव से बहुत पहिले दक्षिणी अरब में फ़िनिशिअन् से कुछ ही मिलती हुई एक प्रकार की लिपि प्रचलित थी जिसको 'हिमिअरिटिक' कहते हैं. उक्त लिपि के प्राचीन लेख वहां के 'सबा' नामक राज्य में विशेष मिलने के कारण उसी लिपि को 'सेबियन्' भी कहते हैं.
c8.71
२ ग्रीक (यूनानी) लोग जिस प्रदेश को सीरिआ कहते थे करीब करीब उसीको प्राचीन सेमिटिक भाषा में 'अरम्' कहते थे. उसके अंतर्गत एशिया के पश्चिम का 'मेसोपोटेमिआ' प्रदेश था, सिवाय पेलेस्टाइन के. वहां की भाषा और लिपि को अरमइक् या अरमिअन् कहते हैं.
c8.72
३ इस नक्शे में दस खड़ी पंक्तियां बनाई गई हैं, जिनमें से पहिली पंक्ति में सेमिटिक वर्णमाला के अक्षरों के नाम तथा उनकी ध्वनि के सूचक अक्षर नागरी में दिये हैं; दूसरी पंक्ति में मिसर की हिअरेटिक लिपि के अक्षर दिये हैं (ए. ब्रि; जिल्द १, पृ. ६०० से-नवां संस्करण); तीसरी में प्राचीन फ़िनिशिअन् अक्षर (ए. ब्रि; जि. १, पृ. ६०० से); चौथी में मोअब के राजा मेशा के ई.स. पूर्व की नवीं शताब्दी के शिलालेख से फ़िनिशिअन् अक्षर (ए. ब्रि; जि. ३३, पृ. ६०२ से-दसवां संस्करण); पांचवीं में हिमिअरिटिक लिपि के अक्षर (ए. ब्रि; जि. ३३, पृ. ६०२ से); छठी में सक्कारा (मिसर में), तीमा (अरब में) आदि के ई. स. पूर्व की पांचवीं शताब्दी के शिला लेखों से अरमइक् अक्षर (इं. ऐं; जि. २४, पृ. २८६ के सामने के सेट से); सातवीं में मिसर के पपायरसों से अरमइक् अक्षर (इं; ऐं; जि. २४, पृ. २८६ से); आठवीं में डॉ. सर जॉन मार्शल के उद्योग से तक्षशिला से मिले हुए ई. स. पूर्व की चौथी शताब्दी के अरमइक् लेख के फ़ोटो (ज. रॉ. ए. सो; ई.स. १६१५, पृ. ३४० के सामने के सेट) से अक्षर छांटे गये हैं; नवीं में समान उच्चारण वाले खरोष्ठी अक्षर अशोक के लेखों से लिये हैं; और दसवीं में समान उच्चारण वाले ब्राह्मी लिपि के अक्षर अशोक के लेखों से उद्धृत किये गये हैं.
c8.73
४ जैसे अंग्रेजी में C (सीं), K (के) और Q (क्यू) ये तीन अक्षर 'क' की ध्वनि के सूचक हैं और उर्दू में 'से' ث 'सीन्' س और 'स्वाद' ص 'स' की ध्वनि के सूचक हैं ऐसे ही फ़िनिशिअन् अक्षरों में भी आठ अक्षर ऐसे हैं जो चार ही उच्चारण का काम देते हैं अर्थात् 'हे' और 'हेथ' (जिससे अरबी का 'हे' ح और अंग्रेजी का H 'एच' निकला) इन दोनों से 'ह'; 'तेथ' (जिससे अरबी का 'तॉय' ط) और 'ताव' (जिससे 'ते' ت निकला) दोनों से 'त'; 'काफ्' और 'क़ॉफ्' से 'क', ऐसे ही 'सामेख' (जिससे अरबी का सीन س) और 'त्साधे' (जिस से 'स्वाद' ص निकला) से 'स' का उच्चारण होता है; जिससे फ़िनिशिअन् २२ अक्षर ब्राह्मी के १८ उच्चारणों का ही काम दे सकते हैं.
c8.74
सेमिटिक और ब्राह्मी लिपि की बनावट में बड़ा अंतर यह है कि फ़िनिशिअन् आदि अक्षरों का ऊपर का भाग बहुधा स्थूल५ होता है और नीचे का भाग खड़ी या तिरछी लकीर से बनता है परंतु ब्राह्मी अक्षरों में से अधिक अक्षरों का ऊपर का भाग पतली लकीर से प्रारंभ होता है और नीचे आ कर स्थूल६ बनता है. इस वैषम्य के एकीकरण के लिये बूलर ने यह मान लिया कि 'हिंदुओं ने [कितने एक] सेमिटिक अक्षरों को उलट दिया है अर्थात् उनका ऊपर का हिस्सा नीचे और नीचे का
c8.75
५ देखो आगे पृष्ठ २३ में दिया हुआ नक्शा.
c8.76
६ देखो लिपिपत्र पहिला.
c8.77
सेमिटिक् वर्णमालाओं के अक्षरों का नक्शा—
c8.78
समान उच्चारण वाले खरोष्ठी तथा ब्राह्मी अक्षरों सहित.
c8.79
| सेमिटिक् अक्षरों के नाम तथा उच्चारण. | हिअ-रेटिक्. | फ़िनिशियन्. | | हिमिम्र-रिटिक् (सेबियन्) | अरमइक्. | | | समान उच्चारण वाले खरोष्ठी तथा ब्राह्मी अक्षर (अशोक के लेखों से). | |
| | | प्राचीन. | मोअब के लेख से. | | सक़ारा, टीमा, आदि के लेखों से. | पपायरसों से. | तक्षशिला के लेख से. | खरोष्ठी. | ब्राह्मी. |
| अलेफ़् (अ) | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] |
| बेथ् (ब) | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] |
| गिमेल् (ग) | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] |
| दालेथ् (द) | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] |
| हे (ह) | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] |
| वाव् (व) | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] |
| ज़ाइन् (ज़) | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] |
| हेथ् (ह) | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | | [Figure:] | [Figure:] |
| तेथ् (त) | [Figure:] | [Figure:] | | [Figure:] | | | | [Figure:] | [Figure:] |
| योद् (य) | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] |
| काफ़् (क) | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] |
| लामेद् (ल) | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] |
| मेम् (म) | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] |
| नून् (न) | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] |
| सामेख् (स) | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | | [Figure:] | [Figure:] |
| आइन् (ए) | | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | | | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] |
| पे (प) | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] |
| त्साधे (स) | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] |
| क़ॉफ़् (क़) | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] |
| रेश् (र) | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] |
| शिन् (श) | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] |
| ताव् (त) | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] | [Figure:] |
c8.80
ऊपर कर दिया है अथवा [खड़े] अक्षरों को आड़ा कर दिया है और [कितने एक] के कोणों को खोल दिया है१'.
c8.81
फ़िनिशिअन और ब्राह्मी की लेखन प्रणाली एक दूसरे से विपरीत होने के कारण बहुत से अक्षरों की परस्पर समानता बतलाने में बाधा पड़ती थी जिसके लिये बूलर ने यह मान लिया कि 'ब्राह्मी लिपि का रुख पलटने से (अर्थात् जो लिपि पहिले दाहिनी ओर से बाईं ओर लिखी२ जाती थी उसे पीछे से बाईं ओर से दाहिनी ओर लिखने से) कितने एक [सेमिटिक] अक्षरों का रुख ग्रीक अक्षरों की नांई दाहिनी ओर से बाईं ओर को बदल गया'३.
c8.82
जब इन फेरफ़ारों से भी काम न चला तब बूलर ने २२ अक्षरों में से प्रत्येक की उत्पत्ति बतला ने के समय बहुत से और फेरफ़ार भी मान लिये जिनमें से मुख्य ये हैं:—
c8.83
कहीं लकीर को कुछ [इधर उधर] हटा दिया४, जहां लकीर न थी वहां नई खींच दी५, कहीं मिटा दी६, कहीं बढ़ा दी७, कहीं घटा दी८, कहीं नीचे लटकती हुई लकीर ऊपर की तरफ़ फिरा दी९, तिरछी लकीर सीधी करदी१०, आड़ी लकीर खड़ी करदी११, दो लकीरों के बीच के अंतर को नई लकीर से जोड़ दिया१२, एक दूसरी को काटने वाली दो लकीरों के स्थान में बिंदु बना दिया१३, बाईं तरफ़ मुड़ी हुई लकीर के अंत को ऊपर बढ़ा कर गांठ बनादी१४, त्रिकोण को धनुषाकार बना दिया१५, कोण या कोणों को मिटा कर उनके स्थान में अर्धवृत्त सा बना दिया१६ आदि. इतना करने पर भी सात१७ अक्षरों की उत्पत्ति तो ऐसे अक्षरों से माननी पड़ी कि जिनका उच्चारण बिलकुल बेमेल है.
c8.84
५ ज़ाइन् से 'ज' की उत्पत्ति में 'ज' के बीच की आड़ी लकीर.
c8.85
६ ज़ाइन् से 'ज' की उत्पत्ति में; हेथ से 'घ' की उत्पत्ति में.
c8.86
७ हेथ से 'घ' की उत्पत्ति में.
c8.87
९ योध् से 'य' की उत्पत्ति में.
c8.88
१० नून् से 'न' की उत्पत्ति में; योध् से 'य' की उत्पत्ति में.
c8.89
११ दालेथ् से 'ध' की उत्पत्ति में.
c8.90
१२ वाव् से 'व' की उत्पत्ति में.
c8.91
१३ तैथ् से 'थ' की उत्पत्ति में.
c8.92
१४ मेम् से 'म' की उत्पत्ति में.
c8.93
१५ दालेथ् से 'ध' की उत्पत्ति में.
c8.94
१६ मेम् से 'म' की उत्पत्ति में.
c8.95
१७ दालेथ् (द) से 'ध' की; हेथ् (ह) से 'घ' की; तेथ् (त) से 'थ' की; सामेख् (स) से 'ष' की; फ़े (फ) से 'प' की. त्साधे (त्स) से 'च' की; और कॉफ़् (क़) से 'ख' की.
c8.96
ऊपर बतलाये हुए फेरफ़ार करने पर फ़िनिशिअन अक्षरों से ब्राह्मी अक्षरों की उत्पत्ति बूलर ने किस तरह सिद्ध की जिसके केवल चार उदाहरण नीचे दिये जाते हैं:— १-अलेफ़ से 'अ' - 𐤀 𐤀 𐤀 𐤀 २-हेथ्१८ से 'घ' - 𐤇 𐤇 𐤇 𐤇 𐤇 ३-योध् से 'य' - 𐤉 𐤉 𐤉 𐤉 𐤉 𐤉 ४-मेम् से 'म' - 𐤌 𐤌 𐤌 𐤌
c8.97
१ बू; इं. पे; पृ. ११.
c8.98
२ ब्राह्मी लिपि पहिले दाहिनी ओर से बाईं ओर लिखी जाती थी वा नहीं यह विचार आगे किया जायगा.
c8.99
३ बू; इं. पे; पृ. ११.
c8.100
४ अलेफ़ से 'अ' की उत्पत्ति में; बू; इं. पे; पृ. १२.
c8.101
८ ज़ाइन् से 'ज' की उत्पत्ति में ज़ाइन् के ऊपर और नीचे की दोनों आड़ी लकीरों के बाईं तरफ़ बाहर निकले हुए अंशों का कम करना.
c8.102
१८ पृ. एसा. ब्रि; जि. १, पृ. ६०० में तथा डॉ. ई. रॉडिजर् संपादित और परिवर्धित जेसेनिएअस् के हिब्रू ग्रामर् (व्याक-रण) में इस अक्षर का नाम चेथ (च) लिखा है (पृ. १३) परंतु बंबई की छपी हुई 'हिब्रू प्राइमरी रीडर' नामक छोटी पुस्तक में, जिसमें हिब्रू अक्षरों के नाम तथा उच्चारण अंग्रेज़ी और मराठी (नागरी लिपि) दोनों में दिये हैं, इसका नाम 'हेथ्' (पृ. १) और इसका ध्वनिमूचक चिह्न 'ह' (पृ. ३) दिया है. इसीसे ग्रीक (युनानी) अक्षर 'एटा' बना जिससे अंग्रेज़ी का h (ऐच्) अक्षर, जो 'ह' की ध्वनि का सूचक है, तथा इसीसे अरबी का ح (हे), जो 'ह' का सूचक है, निकला है. अत एव हमने इस अक्षर का नाम 'हिब्रू प्राइमरी रीडर' के अनुसार 'हेथ्' लिखा है.
c8.103
इन चारों अक्षरों की उत्पत्ति में पहिला अक्षर प्राचीन फ़िनिशिअन लिपि का है और अंतिम अक्षर अशोक के लेखों से है. बाकी के सब अक्षर परिवर्त्तन की बीच की दशा के सूचक अनु-मान किये गये हैं कहीं लिखे हुए नहीं मिले. इन रूपान्तरों का विवरण यह है कि:—
c8.104
१-अलेफ़् के पहिले रूप का रुख बदलने से दूसरा रूप बना. दूसरे की खड़ी लकीर को दाहिनी तरफ़ हटाने से तीसरा बना. उसपर से चौथा रूप बन गया.
c8.105
२-हेथ् के पहिले रूप की खड़ी लकीरों को समान लंबाई की बनाने और तीनों आड़ी लकीरों को सीधी करने से दूसरा रूप बना. इस प्रकार सीधे बने हुए खड़े अक्षर को आड़ा करने से तीसरा रूप बना, जिसके ऊपर के भाग की आड़ी लकीरों को मिटा देने से चौथा रूप बना. फिर बाईं ओर की पहिली खड़ी लकीर को लंबी कर देने से पांचवां रूप बन गया.
c8.106
३-योध् की सब तिरछी लकीरों को सीधी करने से दूसरा रूप बना, जिसका रुख बदलने से तीसरा रूप बना. इस खड़े अक्षर को आड़ा करने से चौथा रूप बना. उसकी नीचे लटकती हुई लकीर को ऊपर की तरफ़ फिरा देने से पांचवां रूप बना, जिसकी मध्य की खड़ी लकीर को लंबी करने से छठा रूप बना और उसपर से सातवां.
c8.107
४-मेम् के नीचे वाली बाईं ओर मुड़ी हुई लकीर को ऊपर की तरफ़ बढ़ा कर ग्रंथि बना देने से दूसरा रूप बना. फिर ऊपर के बाईं तरफ़ के कोण वाले हिस्सों को मिटा कर उनकी जगह अर्धवृत्त सी रेखा बना देने से तीसरा रूप बना. उसके ग्रंथि वाले भाग को बढ़ा कर ऊपर निकालने से चौथा रूप बन गया.
c8.108
बूलर के माने हुए अक्षरों के ये फेरफार ऐसे हैं कि उनके अनुसार अक्षरों का तोड़ मरोड़ करने से केवल फिनिशियन् से ब्राह्मी की उत्पत्ति बतलाई जा सकती है ऐसा ही नहीं, किंतु दुनिया भर की चाहे जिस लिपि से किसी भी लिपि की उत्पत्ति आसानी से सिद्ध हो सकती है. उदाहरण के लिये तक्षशिला के अरमइक् लिपि के लेख के अक्षरों से तथा वर्तमान अंग्रेज़ी टाइप (छापे के अक्षरों) से ब्राह्मी लिपि के अक्षर कितनी आसानी से बनाये जा सकते हैं यह नीचे बतलाया जाता है-
c8.109
तक्षशिला के लेख से—
c8.110
१-अलेफ़ से 'अ'-[Figure:] २-बेथ् से 'ब'-[Figure:] ३-गिमेल् से 'ग'-[Figure:] ४-दालेथ् से 'द'-[Figure:] ५-हे से 'ह'-[Figure:] ६-वाव् से 'व'-[Figure:]
c8.111
इन ६ अक्षरों के रूपांतरों में प्रत्येक का पहिला रूप तक्षशिला के लेख से लिया गया है और अंतिम रूप अशोक के लेखों के अनुसार है. बीच के परिवर्तन बूलर के माने हुए नियमों के अनुसार अनुमान किये गये हैं, जिनका ब्यौरा इस तरह है—
c8.112
१-अलेफ् के पहिले रूप के ऊपर के तथा नीचे के कोनों को कुछ चौड़े करने से दूसरा रूप बना. उसकी दाहिनी तरफ की दोनों तिरछी लकीरों को सीधी करने से तीसरा रूप बन गया.
c8.113
२-बेथ् के पहिले रूप के ऊपर की छोटी सी खड़ी लकीर को मिटाने से दूसरा रूप बना. उसकी बाईं तरफ़ एक खड़ी लकीर खींचने से तीसरा रूप बन गया.
c8.114
३-गिमेल् 'ग' से मिलता ही है.
c8.115
४-दालेथ् के पहिले रूप के नीचे की खड़ी लकीर के साथ बाईं तरफ़ एक आड़ी लकीर जोड़ने से दूसरा रूप बना और उस नई जुड़ी हुई लकीर के बाएं किनारे पर ज़रासी छोटी खड़ी लकीर जोड़ने से तीसरा रूप बन गया.
c8.116
५-हे के पहिले रूप को उलट देने से दूसरा रूप बना; उसका रुख पलटने से तीसरा रूप बन गया जो अशोक के सारनाथ के लेख के 'ह' से मिलता हुआ है और चौथा रूप गिरनार के लेख से है.
c8.117
६-वाव् के पहिले रूप को उलटने से दूसरा रूप बना, जिसका रुख पलटने से तीसरा बना, फिर उसकी दाहिनी तरफ़ की झुकी हुई लकीर के स्थान में ग्रंथि बना देने से चौथा रूप बना.
c8.118
वर्तमान अंग्रेज़ी छापे के अक्षरों से— १-‘ए’ से ‘अ’ A A H [Figure:] २-‘बी’ से ‘व’ B B [Figure:] ३-‘सी’ से ‘च’ C d D ४-‘डी’ से ‘द’ D [Figure:] [Figure:] ५-‘ई’ से ‘ए’ E [Figure:] [Figure:] [Figure:] ६-‘ऐफ़’ से ‘क’ F E b b
c8.119
इनमें से प्रत्येक अक्षर के रूपांतरों में पहिला रूप वर्तमान अंग्रेज़ी छापे का अक्षर और अंतिम रूप अशोक के लेखों से है. बीच के कुल रूप बूलर के सूत्रों के अनुसार अनुमान किये हैं जिनका विवरण इस तरह है—
c8.120
१-‘ए’ के पहिले रूप के ऊपर के कोण को खोल देने से दूसरा रूप बना, जिसकी दोनों निरछी खड़ी लकीरों को सीधी करने से तीसरा रूप हुआ और उससे चौथा.
c8.121
२-‘बी’ की बीच की लकीर को मिटाने से दूसरा रूप और उसकी दाहिनी तरफ़ की वक्र रेखा को सीधी करने से तीसरा बना.
c8.122
२ प., त्रि; जि. ३३, पृ. ६०३.
c8.123
३-‘सी’ की दाहिनी तरफ़ एक खड़ी लकीर जोड़ने से दूसरा रूप बन गया और उससे तीसरा.
c8.124
४-‘डी’ की बाईं ओर की खड़ी लकीर को मिटाने से दूसरा रूप बना, जिसके बाईं तरफ़ के किनारों के साथ एक एक छोटी खड़ी लकीर जोड़ने से तीसरा रूप बन गया.
c8.125
५ ‘ई’ की बीच की लकीर मिटा देने से दूसरा रूप; उसकी दाहिनी तरफ़ की दोनों लकीरों को निरछी करने से तीसरा रूप और उससे चौथा बन गया.
c8.126
६ ऐफ़ को उलटने से दूसरा रूप बना, जिसके नीचे की दाहिनी तरफ़ की दो आड़ी लकीरों को एक खड़ी लकीर से जोड़ देने से तीसरा रूप और उससे चौथा बन गया.
c8.127
तक्षशिला के अरमइक लेख से तथा अंग्रेज़ी के छापे के अक्षरों से ब्राह्मी लिपि की उत्पत्ति बताने में फिनिशिअन की अपेक्षा अधिक सरलता होने पर भी यह नहीं कहा जा सकता कि उनसे ब्राह्मी अक्षर बने हैं. ऐसी दशा में बूलर का मत किसी तरह स्वीकार नहीं हो सकता क्योंकि फिनिशिअन् के गिमेल (ग) और ब्राह्मी के ‘ग’ को छोड़ कर अन्य किसी समान उच्चारण वाले अक्षर में समानता नहीं है. बूलर का सारा यत्न खींचतान ही है. इसीसे बूलर की ‘भारतवर्ष की ब्राह्मी लिपि की उत्पत्ति’ के छपने के बाद ‘बुद्धिस्ट इंडिया’ नामक पुस्तक के कर्ता डॉ. राइस डेविड्ज़ को यह मानना पड़ा कि ‘ब्राह्मी लिपि के अक्षर न तो उत्तरी और न दक्षिणी सेमिटिक अक्षरों से बने हैं’[^१, ऐसे ही ‘एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटैनिका’ नामक महान अंग्रेज़ी विश्वकोश में इस विषय में यह लिखा गया कि ‘बूलर का कथन यद्यपि पाण्डित्य और चतुराई से भरा हुआ है तो भी यह मानना पड़ता है कि वह अधिक निश्चय नहीं दिलाता. इस लिपि का उद्भव कहां से हुआ इसका निर्णय निश्चित रूप से करने के पहिले इसके प्राचीन इतिहास के और भी प्रमाणों का ढूंढ़ना आवश्यक है, और ऐसे प्रमाण मिल सकेंगे इसमें कोई संदेह नहीं’.
c8.128
यदि ब्राह्मी और खरोष्ठी दोनों लिपियां फिनिशिअन् से, जिसकी उत्पत्ति ई. स. पूर्व की १० वीं शताब्दी के आस पास मानी जाती है, निकली होतीं तो ई. स. पूर्व की तीसरी शताब्दी में, अर्थात् अशोक के समय, उनमें परस्पर बहुत कुछ समानता होनी चाहिये थी जैसी कि अशोक के समय की
c8.129
१ देखो ऊपर, पृ. २०.
c8.130
ब्राह्मी से निकली हुई ई. स. की पांचवीं और छठी शताब्दी की गुप्त और तेलुगु-कनड़ी लिपियों के बीच पाई जाती है, परंतु उन दोनों (ब्राह्मी और खरोष्ठी) में एक भी अक्षर की समानता का न होना भी यही सिद्ध करता है कि ये दोनों लिपियां एक ही मूल लिपि से सर्वथा नहीं निकलीं१, अर्थात् खरोष्ठी सेमिटिक से निकली हुई है और ब्राह्मी सेमिटिक से नहीं.
c8.131
फिनिशियन लिपि से ब्राह्मी लिपि की उत्पत्ति मानने का सिद्धान्त कहां तक प्रामाणिक और स्वीकार करने योग्य है इसका विचार यहां तक किया गया. अब बूलर के इस दूसरे कथन की समीक्षा आवश्यक है कि 'ब्राह्मी लिपि पहिले दाहिनी ओर से बाईं ओर लिखी जाती थी.'
c8.132
बूलर को फिनिशियन लिपि से ब्राह्मी की उत्पत्ति सिद्ध करने के यत्न में कितने एक अक्षरों का रुख बदलने की आवश्यकता थी. ई. स. १८६१ में जनरल कनिंगहाम ने 'कॉइन्स ऑफ़ एन्श्यंट् इंडिया' नामक भारतवर्ष के प्राचीन सिक्कों के विषय का एक पुस्तक प्रकट किया जिसमें एरण२ से मिले हुए कई एक तांबे के सिक्के भी छापे. उनमें से एक पर का ब्राह्मी लिपि का लेख 'धमपालस'३ दाहिनी ओर से बाईं ओर को पढ़ा जाता है. इस उलटे लेख के तिनके के सहारे को बूलर ने बड़े महत्व का माना और इसीके आधार पर अपनी 'ब्राह्मी लिपि की उत्पत्ति' विषयक पुस्तक में लिखा कि 'सेमिटिक से ब्राह्मी लिपि की उत्पत्ति सिद्ध करने के प्रमाणों की शृंखला को पूर्ण करने के लिये जिस कड़ी की त्रुटि थी वह वास्तव में यही है'४; तथा उस सिक्के को ई. स. पूर्व ३५० के आस पास का मान कर यह सिद्धांत कर लिया कि 'उस समय ब्राह्मी लिपि दाहिनी ओर से बाईं ओर तथा बाईं ओर से दाहिनी ओर (दोनों तरह) लिखी जाती थी'.
c8.133
१ ई. स. १८६४ में मैंने 'प्राचीनलिपिमाला' का प्रथम संस्करण छापा, जिसकी एक प्रति डॉ. बूलर को भेट की. उसकी पहुंच स्वीकार करने के साथ डॉ. बूलर ने लिखा 'कि तुम ब्राह्मी लिपि को भारतवासियों की निर्माण की हुई स्वतंत्र लिपि मानते हो यह ठीक नहीं. ब्राह्मी लिपि सेमिटिक लिपि से निकली हुई है.' इसके उत्तर में मैंने लिखा कि 'यदि ब्राह्मी और खरोष्ठी दोनों लिपियां एक ही मूल लिपि की शाखें हैं तो ७०० वर्ष के भीतर ही उनमें परस्पर एक भी अक्षर की समानता न रही इसका क्या कारण है सो आप कृपा कर सूचित कीजिये.' परंतु इसका कुछ भी उत्तर वे न दे सके और न अब भी कोई दे सकता है.
c8.134
२ मध्य प्रदेश के सागर ज़िले का एक प्राचीन नगर.
c8.135
३ क; कॉ. ए. इं; पृ. १०१; प्लेट ११, संख्या १८.
c8.136
४ बू; इं. स्ट; संख्या ३, पृ. ३ (ई. स. १८६५).
c8.137
६ बूलर ने लिखा है कि 'अशोक के लेखों में दाहिनी ओर से बाईं ओर लिखने के चिह्न बहुत कम मिलते हैं. जोगड और धौली के लेखों में 'ओ' उलटा है; और जौगड तथा देहली के सिवालिक स्तंभ के लेख में 'ध' कचित् उलटा मिलता है' (बू; इं. पे; पृ. ६), परंतु ये तो मामूली लेखकों के हस्तदोष या देशभेद के तुच्छ अंतर हैं. क्योंकि 'ओ' की आकृति, एक खड़ी लकीर के ऊपर के छोर से बाईं ओर को और नीचे के छोर से दाहिनी ओर को एक एक आड़ी लकीर खींचने से, बनती है. यह संभव है कि असावधान लेखक पहिले खड़ी लकीर खींच कर आड़ी लकीरें खींचने में गलती कर जावे. 'ध' की आकृति धनुष के सदृश होने के कारण उसकी प्रत्यंचा चाहे दाहिनी तरफ़ रहे या बाईं तरफ़ इसमें मामूली अनपढ़ लेखक शायद ही फ़र्क़ माने. देशभेद से भी कभी कभी किसी अक्षर की आकृति उलटी लिखी मिलती है जैसे कि ई. स. की छठी शताब्दी के यशोधर्मन् के लेख में 'उ' नागरी के 'उ' का सा है (देखो लिपिपत्र १८ वां) परंतु उसी शताब्दी के गरुळक सिंहादित्य के दानपत्र में उससे उलटा है (लिपिपत्र ३८ वां). वर्तमान बंगला लिपि का 'स' उलट लिखा जाता है (लिपि पत्र ७८) परंतु पहिले ऐसा न था (लिपिपत्र ३२-३५).
c8.138
इस कल्पना का मुख्य आधार एरण का सिक्का ही है, क्योंकि अब तक कोई शिलालेख इस देश में ऐसा नहीं मिला कि जिसमें ब्राह्मी लिपि फ़ारसी की नांई उलटी लिखी हुई मिली हो५. किसी सिक्के पर लेख का उलटा आ जाना कोई आश्चर्य की बात नहीं है क्योंकि सिक्के पर उभरे हुए अक्षर सीधे आने के लिये सिक्के के ठप्पे में अक्षर उलटे खोदने पड़ते हैं अर्थात् जो लिपियां बाईं ओर से दाहिनी ओर (जैसे कि ब्राह्मी और उससे निकली हुई सब लिपियां और अंगरेज़ी भी) लिखी जाती हैं उनके ठप्पों में सिके की इबारत की पंक्ति का आरंभ दाहिनी ओर से करके प्रत्येक अक्षर उलटा खोदना पड़ता है, परंतु यदि खोदनेवाला इसमें चूक जाय और ठप्पे पर बाईं ओर से खोदने लग जाय तो सिक्के पर सारा लेख उलटा आ जाता है, जैसा कि एरण के सिक्के पर पाया जाता है. यदि वह एक
c8.139
५ बू; इं. स्ट; संख्या ३, पृ. ४३.
c8.140
दो अक्षरों को ही उलटा खोदना भूल कर सीधा खोद दे तो केवल वे ही अक्षर सिक्के पर उलटे आ जावेंगे.
c8.141
ऐसी ग़लतियां कभी कभी हो जाने के उदाहरण मिल आते हैं. सातवाहन (आंध्र) वंश के राजा शातकर्णी के भिन्न प्रकार के दो सिक्कों पर ‘शतकणिस’ (शातकणैः) सारा लेख एरण के सिक्के की नांई उलटा आ गया है१. पार्थियन् अब्दगसिस् के एक सिक्के पर के खरोष्ठी लेख का एक अंश उलटा आ गया है अर्थात् नागरी की नांई बाईं ओर से दाहिनी ओर है (रॅ;इं. कॉ; पृ. १५). विक्रम संवत् १६४३ के बने हुए इंदौर राज्य के पैसे पर ‘एक पाव आना इंदौर’ यह लेख उलटा आ गया है२. महाक्षत्रप रंजुवुल (राजुल) के एक सिक्के पर खरोष्ठी लेख की तरफ के ग्रीक अक्षर Y और E से बने हुए मोनोग्राम३ में E अक्षर उलटा आ गया है४; परंतु दूसरे सिक्कों पर सीधा है५. एक प्राचीन मुद्रा पर ‘श्रीमसपकुल’ लेख है, जिसमें ‘श्री’ और ‘प’ ये दो अक्षर उलटे आ गये हैं६. ऐसे ही पटना से मिली हुई एक मुद्रा पर के ‘अगपलश’ (अंगपालस्य) लेख में ‘अ’ उलटा आ गया है७.
c8.142
२ इं. ऐं; जि. २६, पृ. ३३६.
c8.143
३ पूरे नाम के प्रत्येक अंश के प्रारंभ के सांकेतिक दो या तीन वर्णों को मिला कर जो एक विलक्षण चिह्न बनाया जाता है उसे अंग्रेज़ी में ‘मोनोग्राम’ (एकाक्षर) कहते हैं.
c8.144
४ गा; कॉ. ग्री. सी; पृ. ६७, संख्या ५.
c8.145
५ गा; कॉ. ग्री. सी; पृ. ६७, संख्या ६.
c8.146
६ ज. रॉ. ए. सो; ई. स. १६०१, पृ. १०४, संख्या ६.
c8.147
७ क; आ. स. रि; जि. १५, प्लेट ३, संख्या २.
c8.148
ऐसी दशा में एरण के सिक्के पर के उलटे लेख के आधार पर यह मान लेना कि. ‘ब्राह्मी लिपि पहिले दाहिनी ओर से बाईं ओर लिखी जाती थी’ किसी तरह आदरणीय नहीं हो सकता८.
c8.149
८ ई. स. १८६५ में डॉन मार्टिनो डी. ज़िल्वा विक्रमसिंहे ने रॉयल एशिआटिक सोसाइटी के जर्नल (त्रैमासिक पत्रिका) में एक पत्र प्रकाशित कर यह बतलाना चाहा था कि ‘सीलोन में कई शिलालेख प्राचीन ब्राह्मी लिपि के मिले हैं, जिनमें से दो में अक्षर उलटे हैं, परंतु उनकी छापों के अभाव में उनका विवेचन नहीं किया जा सकता’ (ज. रॉ. ए. सो; ई. स. १८६५, पृ. ८६५-६८) और ई. स. १६०१ में एक लेख उसी जर्नल में फिर छपवाया जिसमें उलटा खुदा हुआ कोई शिलालेख तो प्रकाशित न किया किंतु उनकी छापें शीघ्र प्राप्त करने का यत्न करने की इच्छा प्रकट की, और अशोक के गिरनार के लेख में ‘प्र’ के स्थान में ‘पे’ ‘त्र’ के स्थान में ‘र्त’ आदि जो अशुद्धियां मिलती हैं उनपर से यह सिद्धांत निकाला कि ‘ब्राह्मी लिपि का रुख बदलने से ये अक्षर इस तरह लिखे गये’ (ज. रॉ. ए. सो; ई. स. १६०१, पृ. ३०१-५); परंतु गिरनार के सारे लेख को ध्यानपूर्वक पढ़नेवाले को यह अवश्य मालूम हो जायगा कि उसके लिखनेवाले को संयुक्ताक्षरों का ठीक ठीक ज्ञान न था और संयुक्ताक्षर में प्रथम आने वाले ‘र्’ (रेफ) तथा द्वितीय आने वाले ‘र’ का अन्तर तो वह समझता ही न था जिससे उसने संयुक्ताक्षरों में ऐसी ऐसी अनेक अशुद्धियां की हैं. यदि इन अशुद्धियों पर से ही यह सिद्धांत स्थिर किया जा सकता हो कि ये ब्राह्मी लिपि के उलटे लिखे जाने के प्रत्यक्ष उदाहरण हैं तो बात दूसरी है. ई. स. १६०३ में डॉ. राइस डेविड्स ने विक्रमसिंहे के ऊपर लिखे हुए पत्र और लेख के हवाले से मान लिया कि ब्राह्मी लिपि उलटी भी लिखी जाती थी (डे; बु. इं; पृ. ११४), परंतु साथ में यह भी लिख दिया कि ‘अब तक उलटी लिपि का कोई शिलालेख प्रसिद्ध नहीं हुआ.’
c8.150
प्रसिद्ध पुरातत्ववेत्ता डॉ. हूल्श (Hultzsch) ने लिखा है९ कि ‘बूलर एरण के सिक्के को, जिस पर के अक्षर दाहिनी ओर से बाईं ओर हैं, ब्राह्मी के सेमिटिक लिपि से निकलने का प्रमाण मानता है; इसमें मैं उससे सहमत नहीं हो सकता. यह जानी हुई बात है कि सिक्के पर अक्षर ठीक आने के लिये ठप्पे पर उनको उलटा खोदना चाहिये; इस बात को हिन्दुस्तानी ठप्पा खोदने वाले अक्सर भूल जाते हैं.’ डॉ. फ्लीट१० ने भी ऐसा ही मत प्रकट किया है.
c8.151
१ रा; कॉ. आं. क्षा. पृ. ४, प्लेट १, संख्या ६ और ११.
c8.152
९ इं. ऐं; जि. २६, पृ. ३३६.
c8.153
१० बूं; ई. पे. के अंग्रेज़ी अनुवाद की भूमिका; पृ. ३-४.
c8.154
ब्राह्मी लिपि के न तो अक्षर फिनिशियन् या किसी अन्य लिपि से निकले हैं और न उसकी बाईं ओर से दाहिनी ओर लिखने की प्रणाली किसी और लिपि से बदल कर बनाई गई है. यह भारतवर्ष के आर्यों का अपनी खोज से उत्पन्न किया हुआ मौलिक आविष्कार है. इसकी प्राचीनता और सर्वांगसुंदरता से चाहे इसका कर्त्ता ब्रह्मा देवता माना जा कर इसका नाम ब्राह्मी पड़ा, चाहे साक्षरसमाज ब्राह्मणों की लिपि होने से यह ब्राह्मी कहलाई हो१, पर इसमें संदेह नहीं कि इसका फ़िनिशियन् से कुछ भी संबंध नहीं.
c8.155
आदर्श लिपि में यह गुण होना चाहिये कि प्रत्येक उच्चारण के लिये असंदिग्ध संकेत हो जिससे जो बोला जाय वह ठीक वैसा ही लिखा जाय और जो लिखा जाय वह ठीक वैसा ही पढ़ा जाय. उच्चारित अक्षर और लिखित वर्ण के इस संबंध को निभाने के उद्देश्य का विचार करें तो ब्राह्मी लिपि सर्वोत्तम है और इसमें और सेमिटिक् लिपियों में रात दिन का सा अंतर है. इसमें स्वर और व्यंजन पूरे हैं और स्वरों में ह्रस्व, दीर्घ के लिये तथा अनुस्वार और विसर्ग के लिये उपयुक्त संकेत न्यारे न्यारे हैं; व्यंजन भी उच्चारण के स्थानों के अनुसार वैज्ञानिक क्रम से जमाये गए हैं. इसमें किसी प्रकार की त्रुटि नहीं है और आर्य भाषाओं की ध्वनियों को व्यक्त करने के लिये इसमें किसी प्रकार के संशोधन या परिवर्तन की अपेक्षा नहीं है. व्यंजनों के साथ स्वरों के संयोग को मात्रा के चिह्नों से प्रकट करने की इसमें ऐसी विशेषता है जो किसी और लिपि में नहीं है. साहित्य और सभ्यता की अति उच्च अवस्था में ही ऐसी लिपि का विकास हो सकता है. वैदिक और प्राचीन संस्कृत वाङ्मय के ६३ या ६४ मूल उच्चारणों के लिये केवल १८ उच्चारणों के प्रकट करने वाले २२ संकेतों की दरिद्र सेमिटिक् लिपि कैसे पर्याप्त होती ? सेमिटिक् लिपि में और उससे निकली सभी लिपियों में स्वर और व्यंजन पृथक् पृथक् नहीं हैं. स्वरों में ह्रस्व दीर्घ का भेद नहीं. न उनके अक्षर विन्यास का कोई भी क्रम है. एक उच्चारण के लिये एक से अधिक चिह्न हैं और एक ही चिह्न एक नहीं, किंतु अनेक उच्चारणों के लिये भी है. व्यंजन में स्वर का योग दिखलाने के लिये मात्रा का संकेत नहीं, परंतु स्वर ही व्यंजन के आगे लिखा जाता है और संयुक्त ध्वनि के लिये वर्णों का संयोग नहीं. स्वर भी अपूर्ण हैं. ऐसी अपूर्ण और क्रमसहित लिपि को ले कर, उसकी लिखावट का रूप पलट कर, वर्णों को तोड़ मरोड़ कर, केवल अट्ठारह उच्चारणों के चिह्न उसमें पाकर बाकी उच्चारणों के संकेत स्वयं गढ़ कर, स्वरों के लिये मात्राचिह्न बना कर, अनुस्वार और विसर्ग की कल्पना कर, स्वर व्यंजनों को पृथक् कर, उन्हें उच्चारण के स्थान और प्रयत्न के अनु सार नए क्रम से सजा कर सर्वांगपूर्ण लिपि बनाने की योग्यता जिस जाति में मानी जाती है, क्या वह इतनी सभ्य नहीं रही होगी कि केवल अट्ठारह अक्षरों के संकेतों के लिये दूसरों का मुंह न ताक कर उन्हें स्वयं ही अपने लिये बना ले?
c8.156
१ इं. पँ; जि. ३५, पृ. १३.
c8.157
एडवर्ड थॉमस का कथन२ है कि 'ब्राह्मी अक्षर भारतवासियों के ही बनाये हुए हैं और उनकी सरलता से उनके बनाने वालों की बड़ी बुद्धिमानी प्रकट होती है'.
c8.158
२ म्यू. क्रॉ; ई. स. १८८३, नंबर ३.
c8.159
प्रोफेसर डॉसन का लिखना३ है कि 'ब्राह्मी लिपि की विशेषताएं सब तरह विदेशी उत्पत्ति से उसकी स्वतंत्रता प्रकट करती हैं और विश्वास के साथ आग्रहपूर्वक यह कहा जा सकता है कि सब तर्क और अनुमान उसके स्वतंत्र आविष्कार ही होने के पक्ष में हैं.'
c8.160
३ ज. रॉ. ए. सो; ई. स. १८८१, पृ. १०२; और इं. पँ; जि. ३५, पृ. २५३.
c8.161
जेनरल कनिंगहाम का मत यह४ है कि 'ब्राह्मी लिपि भारतवासियों की निर्माण की हुई स्वतंत्र लिपि है.' प्रोफेसर लैसन्५ ब्राह्मी लिपि की विदेशी उत्पत्ति के कथन को सर्वथा अस्वीकार करता है.
c8.162
४ क; कॉर्. ए. इं; जि. १, पृ. ५२.
c8.163
५ Indische Alterthumskunde, 2nd Edition i. p. 1006 (1867).
c8.164
हिन्दुस्तान का प्राचीन इतिहास अभी तक घने अंधकार में छिपा हुआ है. पुराने शहरों और बस्तियों के चिन्ह वर्तमान धरातल से पचासों फुट नीचे हैं, क्योंकि बार बार विदेशियों के आक्रमणों से पुराने स्थान नष्ट होते गये और उन पर नए बसते गए. सारा देश एक राजा के अधीन न होने से क्रमबद्ध इतिहास भी न रहा. प्राचीन इतिहास का शोध अभी हमारे यहां आरंभिक अवस्था में है तो भी उससे जितना कुछ मालूम हुआ है वह बड़े महत्त्व का है, परंतु अधिक प्राचीन काल के
c8.165
अवशेषों तक अभी वह नहीं पहुंच सका है. अभी तक प्राचीन शिलालेख जो मिले हैं वे ई. स. पूर्व की पांचवीं शताब्दी से पहिले के नहीं हैं, परंतु साहित्य में प्रत्यक्ष या गौण रीति से लेखनकला के जो हवाले मिलते हैं वे बहुत प्राचीन समय तक जाते हैं. उन सब से सिद्ध होता है कि लेखनकला सर्वसाधारण में प्रचलित, एक पुरानी बात थी जिसमें कोई अनोखापन न था. जितने प्रमाण मिले हैं, चाहे प्राचीन शिलालेखों के अक्षरों की शैली, और चाहे साहित्य के उल्लेख, सभी यह दिखाते हैं कि लेखनकला अपनी प्रौढ़ावस्था में थी. उसके आरम्भिक विकास के समय का पता नहीं चलता. ऐसी दशा में यह निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता कि ब्राह्मी लिपि का आविष्कार कैसे हुआ और इस परिपक्व रूप में, कि जिसमें ही हम उसे पाते हैं, वह किन किन परिवर्तनों के बाद पहुंची. मिसर आदि में जैसे भावों के संकेतरूप चित्र हुए और वे शब्दों के संकेत हो कर उनसे अक्षरों के संकेत बने, इस तरह यहां भी किसी चित्रलिपि से ब्राह्मी लिपि बनी, या प्रारम्भ से ध्वनि के ही सूचक चिन्ह बना लिये गये, यह कुछ निश्चय के साथ नहीं कहा जा सकता. निश्चय के साथ इतना ही कहा जा सकता है कि इस विषय के प्रमाण जहां तक मिलते हैं वहां तक ब्राह्मी लिपि अपनी प्रौढ़ अवस्था में और पूर्ण व्यवहार में आती हुई मिलती है और उसका किसी बाहरी स्रोत और प्रभाव से निकलना सिद्ध नहीं होता.
c8.166
आर. शाम शास्त्री ने 'देवनागरी लिपि की उत्पत्ति के विषय का सिद्धांत' नामक एक विस्तृत लेख१ में यह सिद्ध करने का यत्न किया है कि देवताओं की मूर्तियां बनने के पूर्व उनकी उपासना सांकेतिक चिन्हों द्वारा होती थी जो कई त्रिकोण तथा चक्रों आदि से बने हुए यंत्र के, जो 'देवनगर' कहलाता था, मध्य में लिखे जाते थे. देवनगर के मध्य लिखे जाने वाले अनेक प्रकार के सांकेतिक चिन्ह कालांतर में उन उन नामों के पहिले अक्षर माने जाने लगे और देवनगर के मध्य उनका स्थान होने से उनका नाम 'देवनागरी' हुआ. वह लेख बड़ी गवेषणा के साथ लिखा गया है और युक्तियुक्त अवश्य है, परंतु जब तक यह सिद्ध न हो कि जिन जिन तांत्रिक पुस्तकों से अवतरण उद्धृत किये गये हैं वे वैदिक साहित्य के समय के पहिले के, या कम से कम मौर्यकाल से पहिले के, हैं, तब तक हम उनका मत स्वीकार नहीं कर सकते.
c8.167
१ इं. ऐं; जि. ३५, पृ. २५३-६७; २७०-८०; ३११-२४.
c8.168
बाबू जगन्मोहनवर्मा ने एक लंबा चौड़ा लेख२ लिख कर यह बतलाने का यत्न किया है कि 'वैदिक चित्रलिपि या उससे निकली हुई सांकेतिक लिपि से ब्राह्मी लिपि का विकास हुआ', परन्तु उस लेख में कल्पित वैदिक चित्रलिपि के अनेक मनमाने चित्र अनुमान कर उनसे भिन्न अक्षरों के विकास की जो कल्पना की गई है उसमें एक भी अक्षर की उत्पत्ति के लिये कोई भी प्राचीन लिखित प्रमाण नहीं दिया जा सका. ऐसी दशा में उनकी यह कल्पना रोचक होने पर भी प्रमाणरहित होने से स्वीकार नहीं की जा सकती. बाबू जगन्मोहनवर्मा ने दूसरी बात यह३ भी निकाली है कि 'ट,' 'ठ,' 'ड,' 'ढ' और 'ण' ये पांच मूर्धन्य वर्ण आर्यों के नहीं थे. वैदिक काल के आरंभ में अनार्यों की भाषा में मूर्धन्य वर्णों का प्रयोग जब आर्यों ने देखा तब वे उनके कानों को बड़े मनोहर लगे, अतएव उन्होंने उन्हें अपनी भाषा में ले लिया.'
c8.169
२ सरस्वती; ई. स. १६१५, पृ. ३७०-७१.
c8.170
३ सरस्वती; ई. स. १६१३ से १६१५ तक कई जगह.
c8.171
इसके प्रमाण में लिखा है कि 'पारसी आर्यों की वर्णमाला में मूर्धन्य वर्णों का सर्वथा अभाव है और धातुपाठ में थोड़े से धातुओं को छोड़ कर शेष कोई धातु ऐसा नहीं जिसके आदि में मूर्धन्यवर्ण हो', परंतु पारसी आर्यों के यहां केवल मूर्धन्यवर्णों का ही अभाव है यही नहीं किंतु उन की वर्णमाला में 'छ,' 'भ' और 'ल' वर्ण भी नहीं हैं और वैदिक या संस्कृत साहित्य में 'ञ' से प्रारंभ होने वाला कोई धातु या शब्द भी नहीं है, तो क्या 'छ,' 'भ', 'ल' और 'ञ' वर्ण
c8.172
भी अनार्यों से ही लिये गये? 'ट'१, 'ड'२, 'ढ'३ और 'ण'४ से प्रारंभ होने वाले बहुत से धातु हैं, और जिनमें मूर्धन्य वर्णों का प्रयोग हुआ हो ऐसे हज़ारहा शब्द वैदिक साहित्य में पाये जाते हैं. ग्रीक आर्यों की भाषा में 'ट' और 'ड' ही हैं, 'त' और 'द' का सर्वथा अभाव है और सेमिटिक् अनार्यों की लिपियों में मूर्धन्य वर्णों का सर्वथा अभाव पाया जाता है (देखो पृ. २३ में छुपा हुआ नक्शा); इसी से ग्रीकों ने फ़िनिशियन् अक्षर 'ताव' ('त' का सूचक) से टाओ ('ट'), और दालेथ ('द') से डेल्टा ('ड') बनाया. ऐसी दशा में बाबू जगन्मोहनवर्मा का यह दूसरा कथन भी आदरणीय नहीं हो सकता.
c8.173
१ 'ट' से प्रारंभ होने वाले धातु टंक, टल्, टिक्, टिए, टीक और टवल् हैं.
c8.174
२ 'ड' से प्रारंभ होने वाले धातु डए, डम्, डंब्, डंश्, डिए, डिम् और डी हैं.
c8.175
४ पाणिनि ने धातुपाठ में बहुत से धातु 'ण' से प्रारंभ होने वाले माने हैं (णो नः; पा. .६ । १ । ६५; उपसर्गा-दसमासेऽपि णोपदेशस्य; पा. ८ । ४ । १४).
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