भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c8.168
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c8.168
- Language
- Hindi
c8.168
बाबू जगन्मोहनवर्मा ने एक लंबा चौड़ा लेख२ लिख कर यह बतलाने का यत्न किया है कि 'वैदिक चित्रलिपि या उससे निकली हुई सांकेतिक लिपि से ब्राह्मी लिपि का विकास हुआ', परन्तु उस लेख में कल्पित वैदिक चित्रलिपि के अनेक मनमाने चित्र अनुमान कर उनसे भिन्न अक्षरों के विकास की जो कल्पना की गई है उसमें एक भी अक्षर की उत्पत्ति के लिये कोई भी प्राचीन लिखित प्रमाण नहीं दिया जा सका. ऐसी दशा में उनकी यह कल्पना रोचक होने पर भी प्रमाणरहित होने से स्वीकार नहीं की जा सकती. बाबू जगन्मोहनवर्मा ने दूसरी बात यह३ भी निकाली है कि 'ट,' 'ठ,' 'ड,' 'ढ' और 'ण' ये पांच मूर्धन्य वर्ण आर्यों के नहीं थे. वैदिक काल के आरंभ में अनार्यों की भाषा में मूर्धन्य वर्णों का प्रयोग जब आर्यों ने देखा तब वे उनके कानों को बड़े मनोहर लगे, अतएव उन्होंने उन्हें अपनी भाषा में ले लिया.'