भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c8.8
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c8.8
- Language
- Hindi
c8.8
३ ब्राह्मी लिपि वास्तव में ‘नागरी’ (देवनागरी) का प्राचीन रूप ही है. ‘नागरी’ नाम कब से प्रसिद्धि में आया यह निश्चित नहीं परंतु तांत्रिक समय में ‘नागर’ (नागरी) नाम प्रचलित था, क्यों कि ‘नित्याषोडशिकार्णव’ की ‘सेतुबंध’ नामक टीका का कर्ता भास्करानंद एकार (ए) का त्रिकोण रूप ‘नागर’ (नागरी) लिपि में होना बतलाता है (कोषत्रयवदु- बभ्रौ लोखो यस्य ततः। नागरलिप्या सामप्रदायिकैरेकारस्य त्रिकोणाकारतयैव लेखनात.। इं. ऍ; जिल्द ३५, पृ. २८३). ‘वातुलगम’ की टीका में लिखा है कि शिव मंत्र (ह्रीं) के अक्षरों से शिव की मूर्ति ‘नागर’ (नागरी) लिपि से बन सकती है; दूसरी लिपियों से बन नहीं सकती (शिवमन्त्रवाच्यव्यंक्षराकृतिः नागरलिपिभिरुच्चारयितुं शक्यते । व्यतिरिक्तालिपिभिर्नोच्चारयितं शक्यते । इं. ऍ; जिल्द ३४, पृ. २७६). यूरोपियन विद्वानों ने ‘ब्राह्मी’ लिपि का ‘पाली’, ‘इंडियन पाली’, ‘साउथ (दक्षिणी) अशोक’ या ‘लाट’ लिपि आदि नामों से भी परिचय दिया है परंतु हम इस लेख में सर्वत्र ‘ब्राह्मी’ नाम का ही प्रयोग करेंगे.