भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c9.54
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c9.54
- Language
- Hindi
c9.54
१ कलकत्ता हाई कोर्ट के भूतपूर्व जज एफ़. ई. पार्जिटर नामक विद्वान् ने ‘दी पुराण टेक्स्ट ऑफ़ दी डाइनेस्टीज़ ऑफ़ दी कलि एज’ (कलियुग के राजवंशों के संबंध के पुराणों के मूल पाठ) नामक पुस्तक में यह बतलाने का यत्न किया है कि पुराणों के ये पाठ मूल में खरोष्ठी लिपि में और पीछे से उसपर से ब्राह्मी में लिखे गये होंगे. इसके प्रमाण में लिखा है कि ‘विष्णुपुराण में बहुधा अशोकवर्धन नाम मिलता है परंतु उसकी एक हस्तलिखित प्रति (k Vs) में अयोशोकवर्धन पाठ है. यहां पर लेखक ने ‘शो’ को ग़लती से ‘यो’ पढ़ कर वैसा ही लिखा. बाद उसने (या किसी दूसरे ने) यह ग़लती देखी और उस प्रति में ‘शो’ लिखा या बढ़ा दिया. परंतु ‘यो’ को काटा नहीं और अशुद्ध नाम अयोशोक बना रहा और जब वह प्रति (k Vs) लिखी गई तब तक वैसी ही नक़ल होती रही. हिंदुस्तान की केवल खरोष्ठी लिपि में ही ‘यो’ और ‘शो’ अक्सर एक से लिखे जाते हैं अत एव यह प्रायः निश्चित ही है कि विष्णुपुराण में यह अंश अवश्य मूल खरोष्ठी हस्तलिखित प्रति से लिया गया होगा’ (पृ. ८४). इसी तरह विष्णुपुराण की एक प्रति (cy Vs) में ‘कोशल’ के स्थान पर ‘कोयल’ और वायुपुराण की एक प्रति (c Va) में ‘शालिशूक’ के स्थान पर ‘शालियूक’ पाठ मिला. इन तीनों स्थानों में ‘श’ के स्थान पर ‘य’ लिखा है. इसी तरह मत्स्यपुराण की एक हस्तलिखित प्रति (dj Mt) में ‘काशेयाः’ के स्थान पर ‘कालेयाः’ और वायुपुराण में कहीं कहीं ‘शुंगभृत्य’ के स्थान पर ‘शुंगकृत्य’ पाठ मिला (पृ. ८५). इन थोड़े से लेखक दोषों पर से मि. पार्जिटर ने यह अनुमान कर लिया कि लेखक ने ‘श’ को ‘य’ वा ‘ल’ और ‘भ’ को ‘क’ पढ़ लिया और यह अशुद्धता खरोष्ठी से ब्राह्मी में नक़ल करने से ही हुई होगी. परंतु खरोष्ठी लिपि के जितने लेख अब तक मिले हैं उन सब में, सिवाय वर्डक के पात्र पर के लेख के, ‘श’ और ‘य’ में स्पष्ट भेद पाया जाता है (देखो लिपिपत्र ६५-७०). ‘श’ और ‘ल’ में, और ‘भ’ तथा ‘क’ में भ्रम होने की संभावना बहुत ही कम है क्योंकि उनमें स्पष्ट अंतर है. खरोष्ठी लिपि में वास्तव में भ्रम उत्पन्न कराने वाले अक्षरों में से ‘ण’ और ‘न,’ में विशेष भेद बहुधा नहीं मिलता, तथा ‘त,’ ‘न’ और ‘र’ इन तीन अक्षरों में परस्पर भेद मालूम करना मामूली लेखक के लिये कठिन है. इसी तरह स्वरों तथा उनकी मात्राओं में ह्रस्व दीर्घ का भेद न होने तथा विसर्ग और हलंत व्यंजनों का अभाव होने से दीर्घ स्वरों तथा उनकी मात्राओं एवं विसर्ग, हलंत व्यंजन तथा संयुक्त व्यंजनों की शुद्ध नक़ल होना सर्वथा असंभव है. इस लिय यदि पुराणों के ये अंश खरोष्ठी से ब्राह्मी में नक़ल किये गये होते तो उनमें ‘आ,’ ‘ई,’ ‘ऊ,’ ‘ऐ’ और ‘औ’ अक्षर तथा उनकी मात्राओं का तथा विसर्ग और हलंत व्यंजनों का सर्वथा अभाव होता और ‘न’ तथा ‘ण,’ एवं ‘त’ ‘न’ और ‘र’ अक्षरों वाले शब्दों में हज़ारहा गलतियां मिलतीं क्योंकि पुस्तकों की नक़ल करने वाले संस्कृत के विद्वान् नहीं किंतु मामूली पढ़े हुए लोग होते हैं और जैसा वे मूल प्रति में देखते हैं वैसा ही लिख डालते हैं (मक्षिकास्थाने मक्षिका). अत एव पुराणों के हस्तलिखित राजवंशवर्णन के अंश जिस स्थिति में हमें इस समय मिलते हैं उस स्थिति में सर्वथा न मिलते किंतु कातंत्र व्याकरण के प्रारंभ के संधियों तक के पांच चना करते समय उक्त कथन का विरोध किया है (इ. ऐं; जि. ४३, पृ. १६६). यह निश्चित है कि ब्राह्मणों ने खरोष्ठी लिपि को अपने धर्मग्रंथों में कभी स्थान नहीं दिया क्योंकि वह उनके लिखे जाने के योग्य ही न थी और जितने लेख अब तक उस लिपि के मिले हैं उनमें एक भी ऐसा नहीं है जो ब्राह्मणों के धर्म से संबंध रखता हो.
Linked texts (4)
- Vāyupurāṇa — Vyāsa, Sanskrit
- Matsyapurāṇa — Vyāsa, Sanskrit
- Kātantra — Śarvavarman, Sanskrit
- Viṣṇupurāṇa — Vyāsa, Sanskrit