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भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c9: ३—खरोष्ठी लिपि की उत्पत्ति

भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c9

Language
Hindi

३—खरोष्ठी लिपि की उत्पत्ति

c9.1

३ 'ढ' से प्रारंभ होने वाला धातु ढौक् है.

c9.2

५ युरोपियन् विद्वानों ने 'खरोष्ठी' लिपि का बाकट्रियन्, बाक्ट्रियन् पाली, आरियन्नोपाली, नॉर्थ (उत्तरी) अशोक, काबुलियन् और गांधार आदि नामों से भी परिचय दिया है, परंतु हम इस लेख में 'खरोष्ठी' नाम का ही प्रयोग करेंगे. खरोष्ठी नाम के लिये देखो ऊपर पृ. १८.

c9.3

मौर्यवंशी राजा अशोक के अनेक लेखों६ में से केवल शहबाज़गढ़ी और मान्सेरा के चट्टानों पर खुदे हुए लेख खरोष्ठी लिपि में हैं, जिनसे पाया जाता है कि यह लिपि ई. स. पूर्व की तीसरी शताब्दी में केवल भारतवर्ष के उत्तरी-पश्चिमी सीमांत प्रदेश के आस पास, अर्थात् पंजाब के गांधार७ प्रदेश में, प्रचलित थी. अशोक से पूर्व का इस लिपि का कोई शिलालेख अब तक नहीं मिला, परंतु ईरानियों के कितने एक चांदी के मोटे सिक्कों८ पर ब्राह्मी या खरोष्ठी लिपि के एक एक अक्षर का ठप्पा९ लगा हुआ मिलता है, जिससे अनुमान होता है कि पंजाब की तरफ़ चलने वाले ये ईरानी सिक्के संभवतः सिकंदर से पूर्व के अर्थात् ई. स. पूर्व की चौथी शताब्दी के हों; क्योंकि सिकंदर के विजय से ईरानियों का अधिकार पंजाब पर से उठ गया था.

c9.4

६ राजा अशोक के लेख जिन जिन स्थानों में मिले हैं उनके लिये देखो ऊपर पृ. २, टिप्पण ५. उक्त टिप्पण में दिये हुए स्थानों के नामों में इलाहाबाद (प्रयाग) का नाम भी जोड़ना चाहिये, जो वहां छपने से रह गया है.

c9.5

७ प्राचीन काल में 'गांधार देश' में पंजाब का पश्चिमी हिस्सा तथा अफ़गानिस्तान का पूर्वी हिस्सा अर्थात् उत्तर-पश्चिमी सीमान्त प्रदेश के ज़िले पेशावर और रावलपिंडी तथा अफ़गानिस्तान का ज़िला काबुल गिना जाता था.

c9.6

८ ईरान के प्राचीन चांदी के सिक्के गोली की आकृति के होते थे जिनपर ठप्पा लगाने से वे कुछ चपटे पड़ जाते थे परंतु बहुत मोटे और भद्दे होते थे. उनपर कोई लेख नहीं होता था किंतु मनुष्य आदि की भद्दी शकलों के ठप्पे लगते थे. ईरान के ही नहीं किंतु लीडिआ, ग्रीस, आदि के प्राचीन चांदी के सिक्के भी ईरानी सिक्कों की नाईं गोल, भद्दे, गोली की शक्ल के चांदी के टुकड़े ही होते थे. केवल हिंदुस्तान में ही प्राचीन काल में चौकुंटे या गोल चांदी के सुंदर चपटे सिक्के, जिन्हें कार्षापण कहते थे, बनते थे, कॉरिंथिया वालों ने भी पीछे से चपटे सिक्के बनाये जिसकी देखा देखी दूसरे देशवालों ने भी चपटे सिक्के बनाये (क; कॉ. ए. इं; पृ. ३).

c9.7

९ प्रॉफेसर रैप्सन् ने कितने एक ईरानी चांदी के सिक्कों के चित्र विवरण सहित छापे हैं (ज. रॉ. ए. सो; ई. स. १८६५, पृ. ८६५-७७, तथा पृ. ८६५ के सामने का प्लेट, संख्या १-२५) जिनपर ब्राह्मी लिपि के 'यो' 'ब', 'प'. 'ज' और 'गो' अक्षर और खरोष्ठी लिपि के 'म', 'मे', 'मं,' 'ति' 'द' और 'ह' अक्षरों के ठप्पे लगे हुए हैं.

c9.8

अशोक के पीछे इस लिपि का प्रचार बहुधा विदेशी राजाओं के सिक्कों तथा शिलालेख आदि में मिलता है. सिक्कों में बाक्द्रिअन ग्रीक१ (यूनानी), शक२, क्षत्रप३, पार्थिअन४, कितने एक कुशनवंशी राजा५, तथा औदुंबर६ आदि एतद्देशीय वंशों के राजाओं के सिक्कों पर के दूसरी तरफ के प्राकृत लेख इस लिपि में मिलते हैं. इस लिपि के शिलालेख तथा ताम्रलेखादि ब्राह्मी की अपेक्षा बहुत ही थोड़े और बहुधा बहुत छोटे छोटे मिले हैं जो शक७, क्षत्रप८, पार्थिअन९ और

c9.9

१ यूनान के बादशाह सिकंदर ने ई. स. पूर्व ३२६ में हिंदुस्तान पर चढ़ाई कर पंजाब के कितने एक हिस्से और सिंध पर अपना अधिकार जमाया. ये इलाके तो यूनानियों के अधिकार में १० वर्ष भी रहने न पाये परंतु हिंदुकुश पर्वत के उत्तर के बाक्रिया (बलख़) देश में यूनानियों का राज्य दृढ़ हो गया, जहां के राजा युथिडिमस् के समय संभवतः उसके पुत्र डेमेट्रिअस की अधीनता में ई.स. पूर्व की दूसरी शताब्दी के प्रारंभ के आसपास फिर यूनानियों की चढ़ाई इस देश पर हुई और काबुल तथा पंजाब पर फिर उनका अधिकार हो गया, और ई.स. पूर्व की पहिली शताब्दी के अंत से कुछ पहिले तक कई यूनानी राजाओं का राज्य, घटता बढ़ता, बना रहा. उनके सिक्के अफ़गानिस्तान तथा पंजाब में बहुत से मिल आते हैं जिनपर एक ओर प्राचीन ग्रीक (यूनानी) लिपि के, तथा दूसरी ओर बहुधा खरोष्ठी लिपि के प्राकृत लेख हैं. (गा; कॅ. ग्री. सी. किं. बा. इं; सेट ३-१४. हा; कें. कॉ. पं. म्यू; जिल्द १, सेट १-६; और स्मि; कें. कॉ. इं. म्यू; सेट १-६).

c9.10

२ शक लोगों ने यूनानियों से बाक्रिया का राज्य छीना जिसके पीछे वे हिंदुकुश पर्वत को पार कर दक्षिण की ओर बढ़े और उन्होंने पश्चिम में हिरात से लगा कर पूर्व में सिंधु तक का देश अपने अधीन किया. फिर वे क्रमशः आगे बढ़ते गये. उनके सिक्कों पर भी एक ओर यूनानी और दूसरी ओर खरोष्ठी लिपि के लेख हैं (गा; कें. ग्री. सी. किं. बा. इं; सेट १६-२१. हा; कें. कॉ. पं. म्यू; जिल्द १ सेट १०-१४; और स्मि; कें. कॉ. इं. म्यू; सेट. ८-६).

c9.11

३ 'क्षत्रप' शब्द संस्कृत शैली का सा दीखने पर भी संस्कृत का नहीं किंतु प्राचीन ईरानी भाषा का है, जिसमें क्षत्र या छत्र शब्द का अर्थ 'ज़िला' और 'क्षत्रप' का अर्थ ज़िले का हाकिम होता है. ये क्षत्रप भी बहुधा शक ही थे और प्रारंभ में शक राजाओं की तरफ से ज़िलों के हाकिम या सामंत रहे परंतु पीछे से स्वतंत्र भी हो गये. देश भेद के अनुसार क्षत्रपों के दो विभाग किये जा सकते हैं—'उत्तरी' अर्थात् तक्षशिला, मथुरा आदि के और 'पश्चिमी' अर्थात् मालवा, राजपूताना, गुजरात, काठियावाड़, कच्छ और दक्षिण के. उत्तरी क्षत्रपों में से मनियुल के पुत्र जिहोनिस, आर्त्तस के पुत्र खरमोस्त तथा रंजुवुल (राजुल) आदि के सिक्कों पर और पश्चिमी क्षत्रपों में से केवल भूमक, नहपान, और चष्टन के सिक्कों पर खरोष्ठी लेख मिलते हैं (बाकी सब के सिक्कों पर दूसरी ओर ब्राह्मी के लेख हैं).

c9.12

४ पार्थिअन राजा भी शक जाति के ही होने चाहियें, परंतु पार्थिआ की तरफ से आने के कारण उनको पार्थिअन कहते हैं. उनका राज्य कंदहार, सीस्तान, पश्चिमी पंजाब और सिंध तक घटता बढ़ता रहा. उनके सिक्कों पर भी दूसरी तरफ खरोष्ठी लिपि के लेख हैं (गा; कें. कॉ. ग्री. सी. किं. बा. इं; सेट २२-२३. हा; कें. कॉ. पं. म्यू; जि. १, सेट १५-१६.० स्मि; कें. कॉ. इं. म्यू; सेट ६.)

c9.13

५ कुशनवंशी मध्य एशिया से इस देश में आये. कल्हण अपनी राजतरंगिणी में इस वंश के राजाओं को तुरुष्क (तुर्क) बतलाता है और उनके सिक्कों पर की उनकी तस्वीरों की तुर्की पौशाक कल्हण के लेख की पुष्टि करती है. इनका राज्य बहुत विस्तृत हुआ और इनमें राजा कनिष्क बड़ा ही प्रतापी हुआ. इस वंश के राजाओं में से कुजुल कडफसिस, कुजुलकर कडफसिस और वेम कडफसिस इन तीन के सिक्कों पर खरोष्ठी लेख मिलते हैं और कनिष्क, हुविष्क और वासुदेव के सिक्कों की दोनों ओर ग्रीक लेख ही हैं; गा; कें. कॉ. ग्री. सी. किं. बा. इं; सेट २५-२६. हा; कें. कॉ. पं. म्यू; जि. १, सेट १७-२०. स्मि; कें. कॉ. इं. म्यू; सेट ११-१४.

c9.14

६ औदुंबर और कुनिंदवंशी राजाओं के पंजाब से मिलने वाले सिक्कों पर दूसरी तरफ खरोष्ठी लिपि के लेख मिलते हैं.

c9.15

७ शक वंशी राजा मोग (मोअ) के राजत्वकाल का उसके क्षत्रप पतिक का, जो क्षत्रप लिअक कुजुलक का पुत्र था, एक ताम्रलेख (सं. ७८ का) तक्षशिला से मिला है (ए. इं; जि. ४, पृ. ५४-५६).

c9.16

८ मथुरा के महाक्षत्रप राजुल के राज्य समय उसकी अग्रमहिषी (मुख्य राणी) नदसीअकस ने मथुरा में बौद्ध स्तूप तथा सर्वास्तिवादी बौद्धों के लिये संघाराम (मठ) बनवाया जिसका लेख एक थंभे के सिंहाकृति वाले सिरे पर सिंहों के शरीर पर खुदा हुआ मथुरा से मिला है. राजुल के पुत्र आदि के तथा उस स्तूप के उत्सव में शामिल होने वाले कई अन्य पुरुषों के भी छोटे छोटे लेख उसके साथ खुदे हुए हैं जिनमें से एक ऊपर कहे हुए पतिक का भी है (ए. इं; जि. ६ पृ. १४१-४७). क्षत्रप गणपुत्रवक (?) के पुत्र कथिणिक क्षत्रप का एक लेख माणिकिआल (रावलपिंडी से क़रीब २० मील दक्षिण-पूर्व) के स्तूप में से मिले हुए पीतल के डिब्बे के ढक्कन पर खुदा हुआ है (ए. इं; जि. १२, पृ. २६६).

c9.17

९ पार्थिअन राजा गोंडोफरस के राज्य वर्ष २६ (सं. १०३) का एक शिलालेख तख्तीबही (पंजाब के ज़िले युसफ़ज़ई में) से मिला है (ज. प. ऐ. स. १८६०, भाग १, पृ. ११६).

c9.18

कुशनवंशी१ राजाओं के समय के हैं इनमें से कितने एक' में राजाओं के नाम मिलते हैं, और दूसरों में साधारण पुरुषों२ के ही नाम हैं, राजाओं के नहीं. ये बौद्ध स्तूपों में रक्खे हुए पत्थर आदि के पात्रों और सोने, चांदी या तांबे के पत्रों पर; अथवा चट्टानों और शिलाओं या मूर्त्तियों के आसनों पर खुदे हुए मिले हैं. इनमें से अधिकतर गांधारदेश से ही मिले हैं, और वहां भी विशेषकर तक्षशिला (शाहढेरी, पंजाब के ज़िले रावलपिंडी में) और चारसड्डा (पुष्कलावती) से. पंजाब के बाहर अफ़गानिस्तान में वर्डक (ज़िले वर्डक में) तथा हिड्डा (जलालाबाद से ५ मील दक्षिण) आदि में, और मथुरा में, मिले हैं, अन्यत्र३ नहीं.

c9.19

१ कुशनवंशी राजाओं के समय के खरोष्ठी लिपि के लेख अधिक संख्या में मिले हैं. राजा कनिष्क के समय का एक शिलालेख (सं. ११ का) ज़ेड़ा (ज़िले यूसफ़ज़ई में) से (ज. ए. ई. स. १८६०, भाग १, पृ. १३६); एक ताम्रलेख (सं. ११ का) सुएविहार (पंजाब के बहावलपुर राज्य में) से (इं. पँ; जि. १०, पृ. ३२६; और जि. ११, पृ. १२८); एक लेख माणिक्याल से (क; आ. स. रि; जि ५, पृ. १६० के सामने का प्लेट); और पेशावर के कनिष्कविहार के स्तूप से मिले हुए डिब्बे पर खुदे हुए तीन छोटे छोटे लेख (आ. स; ई. स. १९०६-१०, पृ. १३६-३८) मिले हैं. आरा नामक नाले (बाघनीलाब से २ मील पर-पंजाब में) के अंदर के एक पुराने कुप में से वाशिेप्प के पुत्र कनिष्क के समय का एक शिलालेख (सं. ४१ का) मिला है (इं. पँ; जि. ३७, पृ. ५८). हुविष्क के समय का एक लेख (सं. ५१ का) वर्डक (अफ़गानिस्तान में) के स्तूप में से मिले हुए एक पीतल के पात्र पर खुदा है (ए. इं; जि. ११, पृ २१०-११). पंजतार (ज़िले युसफ़ज़ई में) से एक शिलालेख (सं. १२२ का) किसी गुशन (कुशन) वंशी राजा के समय का (क; आ. स. रि; जि. ५, पृ. १६१, और प्लेट १६, संख्या ४), तथा महाराज राजातिराज देवपुत्र खुशन (कुशन. उक्त नाम के राजा या कुशन वंशी किसी राजा) का एक लेख (सं १३६ का) रौप्यपत्र पर खुदा हुआ तक्षशिला से मिला है (ज. रॉ. ए. सो; ई. स. १६१४, पृ. ६७२-७६ और ई. स. १६१५, पृ. १६२ के सामने का प्लेट).

c9.20

२ हिड्डा के स्तूप से मिले हुए मिट्टी के पात्र पर (सं. २८ का) लेख (ज. रॉ. ए. सो; ई. स. १६१५, पृ. ६२, और उस के सामने का प्लेट); शकदरी (पंजाब के ज़िले अटक में) से मिला हुआ (सं. ४० का) शिलालेख (इं. पँ; जि. ३७, पृ. ६६); ओहिंद (यूसफ़ज़ई ज़िले में) का (सं. ६१ का) लेख (क; आ. स. रि; जि. ५, पृ. ५८; सेट १६, संख्या २.); फतहजंग (ज़िले अटक में) का (सं. ६८ का) शिलालेख (ज. ए; ई. स. १८६०, भाग १, पृ. १३०); सुचइ (ज़िले यूसफ़ज़ई में) से मिला हुआ (सं. ८१) का शिलालेख (इं. पँ; जि. ३७, पृ. ६४); बाँज पहाड का (सं. १०२ का) लेख (ज. ए; ई. स. १८६४, भाग २, पृ. ५१४); पाजा (ज़िले यूसफ़ज़ई में) का (सं. १११ का) शिला लेख (इं. पँ; जि. ३७, पृ. ६५); कलदरा नदी (पश्चिमोत्तर सीमांत प्रदेश में दर्गई के पास) में से मिला हुआ (सं. ११३) का शिलालेख (इं. पँ; जि. ३७, पृ. ६६); स्कारहढेरी (चारसड्डा अर्थात् हस्तनगर से ८ मील उत्तर में) से मिली हुई हारिती की मूर्त्ति के आसनपर खुदा हुआ (सं. १७६ का) लेख (आ. स; ई. स. १६०३-४; पृ. २५५; सेट ७०, संख्या ६); देवाई (ज़िले यूसफ़ज़ई में) का (सं २०० का) शिलालेख (ज. ए; ई. स. १८६४, भाग २, पृ. ५१०); लोरियन तंगाई (ज़िले स्वात में) से मिली हुई बुद्ध की मूर्त्ति के आसन पर खुदा हुआ (सं. ३१८ का) लेख (आ. स; ई. स. १६०३-४; पृ. २५२; सेट ७०, संख्या ४); हस्तनगर (पेशावर ज़िले की चारसड्डा तहसील में) से मिली हुई बुद्ध की (अपने शिष्यों सहित) मूर्त्ति के आसन पर खुदा हुआ (सं. ३८४ का) लेख (ए. इं; जि. १२, पृ. २०२). ये सब साधारण पुरुषों के संवत् वाले लेख हैं. इन लेखों में जो संवत् लिखा है वह कौन सा है यह अभी तक पूर्णतया निश्चित नहीं हुआ, परंतु हमारी संमति में उनमें से अधिकतर लेखों का संवत् शक् संवत् ही होना चाहिये. बिना संवत् वाले लेख ये हैं— तक्षशिला के गंगू नामक स्तूप से मिला हुआ सुवर्णपत्र पर खुदा हुआ लेख (क; आ. स. रि; जि. २, पृ. १३०, और प्लेट ५६); माणिक्याल के स्तूप से मिले हुए छोटे से रौप्यपत्र पर खुदा हुआ छोटा सा लेख (पँ. इं; जि. १२, पृ. २०१); तक्षशिला के स्तूप से मिला हुआ ताम्रपत्र पर का लेख (क; आ. स. रि; जि. २, सेट ५६, संख्या ३; ज. ए. सो. बंगा; ई. स. १६०८, पृ. ३६४); तक्षशिला के स्तूप से मिले हुए पात्र पर का लेख (दूँ. इं; जि. ८, पृ. २६६); मोरा (कालाहिसार से १० मील पश्चिम में) के एक चौकूंटे प्राचीन कुए में तीन तरफ एक एक छोटा लेख (क; आ. स. रि; २ सेट ५६); चारसड्डा (पुष्कलावती) के स्तूपों से मिले हुए ५ छोटे छोटे लेख, जिनमें से ३ मिट्टी की इंडियां पर (आ. स; १६०२-३, पृ. १६३) और दो मूर्तियों के आसनों पर (आ. स; १६०२-३, पृ. १६७, १६८) खुदे हुए हैं; कन्निआरा और पठ्यार (दोनों ज़िले कांगड़ा में) से एक एक छोटा लेख (चट्टान पर खुदा) (पँ. इं; जि. ७, पृ. ११८ के सामने का सेट); यूसफ़ज़ई ज़िले में सहरी बहलोल से दो, और सह्री से एक शिलालेख, (क; आ. स. रि; जि. ५, सेट १६, संख्या, ५ और ६); और गांधार शैली की मूर्त्तियों के आसनों पर के ६ छोटे छोटे लेख (आ. स; ई. स. १६०३-४; सेट ७०, संख्या २, ३, ५, ६, ७ और ८).

c9.21

३ केवल अशोक के सिद्धापुर (माइसोर राज्य में) के लेख (संख्या १) के अंत की अर्थात् १३ वीं पंक्ति में 'पडेन लिखितं' के बाद खरोष्ठी लिपि में 'लिपिकरेण' खुदा है (ए. इं; जि. ३. पृ. १३८ के सामने का सेट), जिससे अनुमान होता है कि उक्त लेख का लेखक 'पड़' (पंड) पंजाब की तरफ़ का होना चाहिये, जिसको खरोष्ठी लिपि का भी ज्ञान होगा जिसे जतलाने के लिये ही उसने ये अंतिम पांच अक्षर उस लिपि में लिखे हों. इसी तरह भरहुत के प्रसिद्ध स्तूप के द्वार पर कहीं एक एक अक्षर खरोष्ठी का खुदा हुआ मिला है (क; भ. स्तूं; सेट ८): ये पंजाब की तरफ़ से आये हुए शिल्पियों के खोदे हुए होने चाहियें.

c9.22

खरोष्ठी लिपि की लेखन शैली फ़ारसी की नांई दाहिनी ओर से बाईं ओर होने से निश्चित है कि यह लिपि सेमिटिक् वर्ग की है, और इसके ११ अक्षर—'क'१, 'ज'२, 'द'३, 'न'४, 'ब'५, 'य'६, 'र'७, 'व'८, 'ष'९, 'स'१० और 'ह'११ समान उच्चारण वाले अरमइक् अक्षरों से बहुत कुछ मिलते हुए हैं.

c9.23

९ 'प' को उलटा करने पर वह पॅपायरसों तथा सक्कारा आदि के लेखों के 'शिन्' से मिलता है.

c9.24

१० 'स' तक्षशिला और सक्कारा के लेखों के 'त्साधे' से मिलता है.

c9.25

११ 'ह' तक्षशिला के लेख के 'हे' से मिलता हुआ है.

c9.26

सेमिटिक् लिपि संबंधी आधुनिक शोध से अनुमान होता है कि असीरिया और बाबीलन् में क्यूनिफ़ॉर्म लिपि का प्रचार होने पर भी राजकीय और व्यौपार के कामों में अरमइक् लिपि१२ काम में आती थी. हखामनी१३ (अर्कैमीनियन्) वंश के बादशाहों के समय ईरान के राज्य का प्रताप बहुत बढ़ा और दूर दूर के देश१४ उक्त राज्य के अधीन हो गये. उस समय के अरमइक् लिपि के अनेक शिलालेख मिसर१५, अरब१६ और एशिया माइनर१७ में मिले हैं और एक ईरान१८ में तथा एक हिंदुस्तान

c9.27

१ खरोष्ठी का 'क' तक्षशिला के लेख तथा पॅपायरसों के 'कॉफ्' से मिलता हुआ है (देखो पृ. २३ पर छपा हुआ नक्शा).

c9.28

२ 'ज' सक्कारा, टीमा आदि के लेखों के 'ज़ाइन्' से मिलता हुआ है.

c9.29

३ 'द' तक्षशिला के लेख, पॅपायरसों तथा सक्कारा आदि के लेखों के 'दालेथ्' से मिलता है.

c9.30

४ 'न' तक्षशिला के लेख, पॅपायरसों तथा सक्कारा आदि के लेखों के 'नून्' से मिलता है.

c9.31

५ 'ब' तक्षशिला के लेख, पॅपायरसों तथा सक्कारा आदि के लेखों के 'बेथ्' से मिलता है.

c9.32

६ 'य' तक्षशिला के लेख, पॅपायरसों तथा सक्कारा आदि के लेखों के 'योध्' से मिलता है.

c9.33

७ 'र' तक्षशिला के लेख तथा पॅपायरसों के 'रेश' से मिलता है.

c9.34

८ 'व' तक्षशिला तथा सक्कारा आदि के लेखों के 'वाव्' से मिलता है.

c9.35

१२ ज. रॅॉ. ए. सो; ई. स. १६१५, पृ. ३४६-४७.

c9.36

१३ आर्य्य जाति के हखामन (ऍर्कैमीनि) नामक ईरानी राजवंशो (जो ई. स. पूर्व की ८ वीं शताब्दी में हुआ हो) के नाम पर से उसके वंशज, ईरान के बादशाह, हखामनी वंशी कहलाते हैं. पहिले ईरान का राज्य मीडिया के अधीन था और हखामन के वंशज साइरस (कुरु कुरुष-कैखुसरो) ने, जो प्रारंभ में अनशान (ईरान में) का स्वामी या शासक था, मीडिआ के राजा अस्त्यगिस (इष्टुविगु) को छलवल से परास्त कर समस्त ईरान और मीडिआ पर अपना साम्राज्य ई. स. पूर्व ५५८ के आस पास जामाया, जिसकी समाप्ति ई. स. पूर्व ३३१ में यूनान के बादशाह सिकंदर ने बादशाह दारा (तीसरे) को परास्त कर की.

c9.37

१४ हखामनी वंश के साम्राज्य के संस्थापक साइरस ने ईरान, मीडिआ, लीड़िआ (एशिया माइनर का पूर्वी आधा हिस्सा), एशिया माइनर का पश्चिमी हिस्सा जिसमें यूनानियों के कई उपनिवेश थे, आयोनिआ (मीडिया से पश्चिम का एशिया माइनर का समुद्रतट का प्रदेश), खीवा, समरकंद, बुखारा, अफ़गानिस्तान तथा गांधार आदि देश अपने अधीन किये. उसके पुत्र कंबैसिस (कंबुजीय) ने मिसर देश विजय किया. कंबैसिस के पुत्र दारा (प्रथम) ने ग्रीस के थ्रेस तथा मसीडन आदि हिस्सों पर अपना अधिकार जमाया और पूर्व में हिंदुस्तान में आगे बढ़कर सिंधुत्तट का प्रदेश अपने अधीन किया.

c9.38

१५ मिसर में सक्कारा, सेरापिअम तथा एंबिडॉस आदि स्थानों में अरमइक् लिपि के लेख मिले हैं जिनमें से सक्कारा का लेख ई. स. पूर्व ४८२ का है (पेलिऑग्राफ़िक सोसाइरीज़ ओरियंटल सीरीज़, प्लेट ६३).

c9.39

१६ अरब में हजाज से उत्तर के टीमा नामक स्थान में कुछ अरमइक् लिपि के लेख मिले हैं, जिनमें से एक ई. स. पूर्व ५०० के आसपास का माना जाता है. टीमा में अरमइक् भाषा का व्यवहार करने वाले व्यौपारियों की आबादी थी (प. त्रि; जि. २४, पृ. ६४७).

c9.40

१७ एशिया माइनर-टर्की के एशियाई राज्य का पश्चिमी हिस्सा जो टर्की के यूरोपी राज्य से मिला हुआ है.

c9.41

१८ ईरान के सॅफ़ कलेह (तेहरान और तेब्रीज़ के बीच) नामक स्थान में एक लेख मिला है (ई. पॅ; जि. २४, पृ. २८७).

c9.42

में तक्षाशिला नगर१ से भी मिल चुका है. मिसर से हख्वामनियों के राजत्वकाल के उसी लिपि के बहुतेरे पॅपायरस्२ मिले हैं और एशिया माइनर से मिले हुए ईरानी क्षत्रपों (सत्रपों) के कई सिक्कों३ पर उसी लिपि के लेख मिलते हैं, जिनसे पाया जाता है कि हख्वामनी वंश के ईरानी बादशाहों की राजकीय लिपि और भाषा अरमइक ही होनी चाहिये. व्यापार के लिये भी उसका उपयोग दूर दूर तक होना पाया जाता है४.

c9.43

४ ज. रॉ. ए. सो; ई. स. १६१५; पृ. ३४६-४७.

c9.44

हिंदुस्तान का ईरान के साथ प्राचीन काल से संबंध रहा और हख्वामनी वंश के बादशाह साइरस (ई. स. पूर्व ५५८-५३०) ने पूर्व में बढ़ कर गांधारदेश विजय किया और ई. स. पूर्व ३१६ के कुछ ही बाद दारा (प्रथम) ने सिंधु तक का हिंदुस्तान का प्रदेश अपने अधीन किया जो ई. स. पूर्व ३३१ तक, जब कि यूनान के बादशाह सिकंदर ने गॉगमेला५ की लड़ाई में ईरान के बादशाह दारा (तीसरे) को परास्त कर ईरानी राज्य पर नाम मात्र के लिये अपना अधिकार जमाया, किसी न किसी प्रकार बना रहा. अत एव संभव है कि ईरानियों के राजत्वकाल में उनके अधीन के हिंदुस्तान के इलाकों में उनकी राजकीय लिपि अरमइक का प्रवेश हुआ हो और उसीसे खरोष्ठी लिपि का उद्भव हुआ हो, जैसे कि मुसलमानों के राज्य समय फ़ारसी लिपि का, जो उनकी राजकीय लिपि थी, इस देश में प्रवेश हुआ और उसमें कुछ वर्ण बढ़ाने से उर्दू लिपि बनी.

c9.45

१ ज. रॉ. ए. सो; ई. स. १६१५, पृ. ३४० के सामने का प्लेट.

c9.46

३ ई. ऐं; जि. २४, पृ. २८७.

c9.47

५ गॉगमेला (अरबैला) तुर्की के एशियाई राज्य का एक नगर, जो मोसल और बगदाद के बीच में है.

c9.48

अरमइक लिपि में केवल २२ अक्षर होने तथा स्वरों की अपूर्णता और उनमें ह्रस्व दीर्घ का भेद न होने एवं स्वरों की मात्राओं का सर्वथा अभाव होने से वह यहां की भाषा के लिये सर्वथा उपयुक्त न थी तो भी राजकीय लिपि होने के कारण यहां वालों में से किसी ने ई. स. पूर्व की पांचवीं शताब्दी के आसपास उसके अक्षरों की संख्या बढ़ा कर, कितने एक को आवश्यकता के अनुसार बदल तथा स्वरों की मात्राओं की योजना कर उसपर से मामूली पढ़े लिखे लोगों, व्यापारियों तथा अहल्कारों के लिये काम चलाऊ खरोष्ठी लिपि बना दी हो. संभव है कि इसका निर्माता चीन वालों के लेखानुसार खरोष्ठ नामक आचार्य६ (ब्राह्मण) हो, जिसके नाम पर से इस लिपि का नाम खरोष्ठी हुआ, और यह भी संभव है कि तक्षशिला जैसे गांधार के किसी प्राचीन विद्यापीठ में इसका प्रादुर्भाव हुआ हो.

c9.49

२ मिसर से ई. स. पूर्व ५०० से लगा कर ई. स. पूर्व २०० तक के अरमइक लिपि के पॅपायरस् मिले हैं.

c9.50

६ खरोष्ठ के लिये देखो ऊपर, पृ. १८.

c9.51

जितने लेख अब तक इस लिपि के मिले७ हैं उनसे पाया जाता है कि इसमें स्वरों तथा उनकी मात्राओं में ह्रस्व दीर्घ का भेद न था. संयुक्ताक्षर केवल थोड़े ही मिलते हैं इतना ही नहीं, किंतु उनमें से कितने एक में संयुक्त व्यंजनों के अलग अलग रूप स्पष्ट नहीं पाये जाते परंतु एक विलक्षण ही रूप मिलता है जिससे कितने एक संयुक्ताक्षरों का पढ़ना अभी तक संशययुक्त ही है. बौद्धों के प्राकृत पुस्तक८, जिनमें स्वरों के ह्रस्व दीर्घ का विशेष भेद नहीं रहता था और जिनमें संयु- काक्षरों का प्रयोग विरला ही होता था, इसमें लिखे हुए मिले हैं, परंतु यह लिपि संस्कृत ग्रंथों१ के लिखने के योग्य नहीं थी. शुद्धता और संपूर्णता के विचार से देखा जावे तो इसमें और ब्राह्मी में उतना

c9.52

७ खरोष्ठी लिपि के शिलालेखादि के लिये देखो ऊपर पृ. ३२, टि. ७-६; और पृ. ३३, टि. १, २.

c9.53

८ हिड्डा के स्तूप (संख्या १३) से मिले हुए खरोष्ठी लेखवाले मिट्टी के पात्र के भीतर खरोष्ठी लिपि में लिखे हुए कितने एक भोजपत्र एक पत्थर पर लिपटे हुए मिले थे परंतु बहुत प्राचीन होने के कारण वे बच न सके (ऐरिज्शना पॅटिका, पृ. ५६-६०, ८४, ६४, १११, ११६). ये सब से पुराने हस्तलिखित भोजपत्र थे. ई. स. की तीसरी शताब्दी के आस पास की 'धम्मपद' की एक प्रति खोतान से मिली है जिसमें स्वरों की मात्राओं में कुछ सुधार किया हुआ पाया जाता है (जूं; ई. पे; पृ. १८-१६).

c9.54

१ कलकत्ता हाई कोर्ट के भूतपूर्व जज एफ़. ई. पार्जिटर नामक विद्वान् ने ‘दी पुराण टेक्स्ट ऑफ़ दी डाइनेस्टीज़ ऑफ़ दी कलि एज’ (कलियुग के राजवंशों के संबंध के पुराणों के मूल पाठ) नामक पुस्तक में यह बतलाने का यत्न किया है कि पुराणों के ये पाठ मूल में खरोष्ठी लिपि में और पीछे से उसपर से ब्राह्मी में लिखे गये होंगे. इसके प्रमाण में लिखा है कि ‘विष्णुपुराण में बहुधा अशोकवर्धन नाम मिलता है परंतु उसकी एक हस्तलिखित प्रति (k Vs) में अयोशोकवर्धन पाठ है. यहां पर लेखक ने ‘शो’ को ग़लती से ‘यो’ पढ़ कर वैसा ही लिखा. बाद उसने (या किसी दूसरे ने) यह ग़लती देखी और उस प्रति में ‘शो’ लिखा या बढ़ा दिया. परंतु ‘यो’ को काटा नहीं और अशुद्ध नाम अयोशोक बना रहा और जब वह प्रति (k Vs) लिखी गई तब तक वैसी ही नक़ल होती रही. हिंदुस्तान की केवल खरोष्ठी लिपि में ही ‘यो’ और ‘शो’ अक्सर एक से लिखे जाते हैं अत एव यह प्रायः निश्चित ही है कि विष्णुपुराण में यह अंश अवश्य मूल खरोष्ठी हस्तलिखित प्रति से लिया गया होगा’ (पृ. ८४). इसी तरह विष्णुपुराण की एक प्रति (cy Vs) में ‘कोशल’ के स्थान पर ‘कोयल’ और वायुपुराण की एक प्रति (c Va) में ‘शालिशूक’ के स्थान पर ‘शालियूक’ पाठ मिला. इन तीनों स्थानों में ‘श’ के स्थान पर ‘य’ लिखा है. इसी तरह मत्स्यपुराण की एक हस्तलिखित प्रति (dj Mt) में ‘काशेयाः’ के स्थान पर ‘कालेयाः’ और वायुपुराण में कहीं कहीं ‘शुंगभृत्य’ के स्थान पर ‘शुंगकृत्य’ पाठ मिला (पृ. ८५). इन थोड़े से लेखक दोषों पर से मि. पार्जिटर ने यह अनुमान कर लिया कि लेखक ने ‘श’ को ‘य’ वा ‘ल’ और ‘भ’ को ‘क’ पढ़ लिया और यह अशुद्धता खरोष्ठी से ब्राह्मी में नक़ल करने से ही हुई होगी. परंतु खरोष्ठी लिपि के जितने लेख अब तक मिले हैं उन सब में, सिवाय वर्डक के पात्र पर के लेख के, ‘श’ और ‘य’ में स्पष्ट भेद पाया जाता है (देखो लिपिपत्र ६५-७०). ‘श’ और ‘ल’ में, और ‘भ’ तथा ‘क’ में भ्रम होने की संभावना बहुत ही कम है क्योंकि उनमें स्पष्ट अंतर है. खरोष्ठी लिपि में वास्तव में भ्रम उत्पन्न कराने वाले अक्षरों में से ‘ण’ और ‘न,’ में विशेष भेद बहुधा नहीं मिलता, तथा ‘त,’ ‘न’ और ‘र’ इन तीन अक्षरों में परस्पर भेद मालूम करना मामूली लेखक के लिये कठिन है. इसी तरह स्वरों तथा उनकी मात्राओं में ह्रस्व दीर्घ का भेद न होने तथा विसर्ग और हलंत व्यंजनों का अभाव होने से दीर्घ स्वरों तथा उनकी मात्राओं एवं विसर्ग, हलंत व्यंजन तथा संयुक्त व्यंजनों की शुद्ध नक़ल होना सर्वथा असंभव है. इस लिय यदि पुराणों के ये अंश खरोष्ठी से ब्राह्मी में नक़ल किये गये होते तो उनमें ‘आ,’ ‘ई,’ ‘ऊ,’ ‘ऐ’ और ‘औ’ अक्षर तथा उनकी मात्राओं का तथा विसर्ग और हलंत व्यंजनों का सर्वथा अभाव होता और ‘न’ तथा ‘ण,’ एवं ‘त’ ‘न’ और ‘र’ अक्षरों वाले शब्दों में हज़ारहा गलतियां मिलतीं क्योंकि पुस्तकों की नक़ल करने वाले संस्कृत के विद्वान् नहीं किंतु मामूली पढ़े हुए लोग होते हैं और जैसा वे मूल प्रति में देखते हैं वैसा ही लिख डालते हैं (मक्षिकास्थाने मक्षिका). अत एव पुराणों के हस्तलिखित राजवंशवर्णन के अंश जिस स्थिति में हमें इस समय मिलते हैं उस स्थिति में सर्वथा न मिलते किंतु कातंत्र व्याकरण के प्रारंभ के संधियों तक के पांच चना करते समय उक्त कथन का विरोध किया है (इ. ऐं; जि. ४३, पृ. १६६). यह निश्चित है कि ब्राह्मणों ने खरोष्ठी लिपि को अपने धर्मग्रंथों में कभी स्थान नहीं दिया क्योंकि वह उनके लिखे जाने के योग्य ही न थी और जितने लेख अब तक उस लिपि के मिले हैं उनमें एक भी ऐसा नहीं है जो ब्राह्मणों के धर्म से संबंध रखता हो.

c9.55

ही अंतर पाया जाता है जितना कि इस समय छपी हुई नागरी की पुस्तकों तथा राजपूताने के अधिकतर रजवाड़ों के मामूली पढ़े हुए अहल्कारों की लिखावटों में.

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ई. स. की तीसरी शताब्दी के आस पास तक इस लिपि का कुछ प्रचार पंजाब में१ बना रहा, जिसके बाद यह इस देश में से सदा के लिये अस्त हो गई और इसका स्थान ब्राह्मी ने ले लिया, तो भी हिंदुकुश पर्वत से उत्तर के देशों तथा चीनी तुर्किस्तान आदि में, जहां बौद्ध धर्म और भारतीय सभ्यता दृढ़ हो रही थी, कई शताब्दी पीछे तक भी इस लिपि का प्रचार बना रहा. प्रसिद्ध पुरातत्ववेत्ता डॉ. सर ऑरल स्टाइन ने चीनी तुर्किस्तान आदि प्रदेशों से असाधारण श्रम कर जो प्राचीन वस्तुएं एकत्रित की हैं उनमें इस लिपि में लिखे हुए पुस्तक और लकड़ी की लिखित तख्तियां आदि बहुमूल्य सामग्री भी है.

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