Pracin Bharatiya Veshabhusha c10.3
Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c10.3
- Language
- Hindi
c10.3
सातवाहन युग (करीब ई० पू० पहली शताब्दी) की वेश-भूषा शुंग युग की वेश-भूषा से बहुत कुछ मिलती है, लेकिन उसमें अंतर भी आ जाता है। उदाहरणार्थ पुरुषों की वेश-भूषा ही लेलीजिए। वे घुटने तक की धोती तो पहनते हैं पर उनके पहरावे में भारी भरकम कमरबंद और पर्यस्तकों का अभाव सा है। सातवाहन युग में पगड़ियां भी सादे कपड़े की होती थीं और उन्हें लोग अनेक तरह से बांधते थे। दुपट्टे ओढ़ने की भी प्रथा थी। सैनिक, अनुचर और विदेशी सिले कपड़े भी कभी कभी पहनते थे। स्त्रियां साड़ी और ओढ़नी पहनती थीं। ओढ़नी सजाने के बहुत से तरीके थे। सांची के अर्धचित्रों में भारतीय वेश-भूषा के अध्ययन से यह पता लगता है कि भारी भरकम कपड़ों की ओर लोगों का सुझाव कम हो गया था पर साथ ही साथ लोग सादे कपड़े बड़े चाव से और अनेक ढंगों से सजा कर पहनते थे। इस युग में दक्षिणी वेश-भूषा कुछ टीमटामदार होती थी। साफे भारी भरकम और आभूषणों से सजे होते थे और धोतियां भी भारी फेंटे वाली होती थीं। सातवाहन युग की वेश-भूषा के इतिहास के लिए हमें प्रचुर सामग्री सांची भाजा के अर्धचित्रों और अजंता के ९-१० नंबर की गुफाओं के भित्ति चित्रों से मिलती है। मथुरा और कौशांबी से मिली मट्टी की मूर्तियों से भी तत्कालीन वेश-भूषा पर प्रकाश पड़ता है। मथुरा, कौशांबी, बसाढ़ और भीटा में इस युग की मट्टी की स्त्री मूर्तियां लंबे कंचुक और गहने पहने हुए मिलती हैं। इनकी वेश-भूषा में एक विदेशीपन झलकता है और यह संभव है कि उस पर शकों का प्रभाव पड़ा हो।