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Pracin Bharatiya Veshabhusha c10: छठां अध्याय : सातवाहन युग की वेश-भूषा (ई० पू० प्रथम शताब्दी)

Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c10

Language
Hindi

Contents

छठां अध्याय : सातवाहन युग की वेश-भूषा (ई० पू० प्रथम शताब्दी)

c10.1

सातवाहन युग की वेश-भूषा

c10.2

( ई० पू० प्रथम शताब्दी )

c10.3

सातवाहन युग (करीब ई० पू० पहली शताब्दी) की वेश-भूषा शुंग युग की वेश-भूषा से बहुत कुछ मिलती है, लेकिन उसमें अंतर भी आ जाता है। उदाहरणार्थ पुरुषों की वेश-भूषा ही लेलीजिए। वे घुटने तक की धोती तो पहनते हैं पर उनके पहरावे में भारी भरकम कमरबंद और पर्यस्तकों का अभाव सा है। सातवाहन युग में पगड़ियां भी सादे कपड़े की होती थीं और उन्हें लोग अनेक तरह से बांधते थे। दुपट्टे ओढ़ने की भी प्रथा थी। सैनिक, अनुचर और विदेशी सिले कपड़े भी कभी कभी पहनते थे। स्त्रियां साड़ी और ओढ़नी पहनती थीं। ओढ़नी सजाने के बहुत से तरीके थे। सांची के अर्धचित्रों में भारतीय वेश-भूषा के अध्ययन से यह पता लगता है कि भारी भरकम कपड़ों की ओर लोगों का सुझाव कम हो गया था पर साथ ही साथ लोग सादे कपड़े बड़े चाव से और अनेक ढंगों से सजा कर पहनते थे। इस युग में दक्षिणी वेश-भूषा कुछ टीमटामदार होती थी। साफे भारी भरकम और आभूषणों से सजे होते थे और धोतियां भी भारी फेंटे वाली होती थीं। सातवाहन युग की वेश-भूषा के इतिहास के लिए हमें प्रचुर सामग्री सांची भाजा के अर्धचित्रों और अजंता के ९-१० नंबर की गुफाओं के भित्ति चित्रों से मिलती है। मथुरा और कौशांबी से मिली मट्टी की मूर्तियों से भी तत्कालीन वेश-भूषा पर प्रकाश पड़ता है। मथुरा, कौशांबी, बसाढ़ और भीटा में इस युग की मट्टी की स्त्री मूर्तियां लंबे कंचुक और गहने पहने हुए मिलती हैं। इनकी वेश-भूषा में एक विदेशीपन झलकता है और यह संभव है कि उस पर शकों का प्रभाव पड़ा हो।

सांची के अर्धचित्रों में पुरुषों की वेश-भूषा

c10.s1.1

सांची के अर्धचित्रों में आदमी धोती पहने दिखाये गये हैं जो घुटनों के कुछ नीचे पहुंचती है और जिसमें लांग और पटका होते हैं (आ० ६४)१। कभी कभी धोती का एक हिस्सा कमर से लपेट लिया जाता था और दूसरा हिस्सा बायीं कुहनी पर होता हुआ नीचे लटका रहता था (आ० ६५)२। धोती कमरबंद से बंधी रहती थी। शरीर का ऊपरी भाग दुपट्टे के सिवा अनावृत होता था। दुपट्टा निम्नलिखित तरीकों से पहना जाता था: (१) कंधों से होता हुआ यह कांखों के तले से निकाल दिया जाता था (आ० ६४)३। (२) दुपट्टा

c10.s1.2

१ —फर्ग्युसन, ट्री एंड सर्पेंट वर्शिप, प्ले० २५३

c10.s1.3

२ —मोतीचन्द्र, भारतीय विद्या, नवम्बर, १६३६, आ० १३

c10.s1.4

३ —फर्ग्युसन, वही, २५, २

c10.s1.5

६३

c10.s1.6

६४

c10.s1.7

६५

c10.s1.8

६६

c10.s1.9

६७

c10.s1.10

६८

c10.s1.11

६९

c10.s1.12

७०

c10.s1.13

७१

c10.s1.14

पीछे ओढ़कर उसके सिरे बगल से निकाल कर पीछे फेंक दिये जाते थे४। (३) बदन को ढकता हुआ दुपट्टा बायें कंधे पर रख लिया जाता था५।

c10.s1.15

५ ५—वही

साफे और पगड़ियाँ

c10.s2.1

प्रायः सभी पुरुष पगड़ी पहनते थे। ऐसा लगता है कि पगड़ी के फेंटे लंबे केशों से लपेटे जाते थे। पगड़ी बांधने की अनेक विधियां थीं जिनसे पगड़ियों की अनेक आकृतियाँ बन जाती थीं। साधारणतः भरहुत की तरह पगड़ी के आगे एक लट्टू होता था। पगड़ी के एक छोर से वह ढंक जाता था ओर तीन चार लपेटों के बाद पगड़ी बंध कर तैयार हो जाती थी (आ० ६६)६। इस पगड़ी में निम्नलिखित भेद पाये जाते हैं।

c10.s2.2

१—पगड़ी की दो फेंटे कुछ नीची बंधी हैं (आ० ६७)७।

c10.s2.3

२—पगड़ी पतले कपड़े की है जिसके अंदर से बाल झलक रहे हैं। दाहिनी तरफ की निचली फेंट का कुछ हिस्सा चूननदार है (आ० ६८)८।

c10.s2.4

८ ८—वही, प्ले० ५, १६

c10.s2.5

३—पगड़ी मोती की लड़ों से सुशोभित है (आ० ६९)९।

c10.s2.6

६ ६—मोतीचंद्र, वही, प्ले० ४, १४

c10.s2.7

९ ९—वही, प्ले० ५, १७

c10.s2.8

४—पगड़ी का लट्टू लंबोतरा है और कपड़ा धारीदार है (आ० ७०)१०।

c10.s2.9

४ ४—फर्ग्युसन, ट्री ऐंड सर्पेंट वर्शिप, प्ले० २७, १

c10.s2.10

१० १०—वही, प्ले० ५, १८

c10.s2.11

एक दूसरी तरह की पगड़ी में कपड़े की तह गोल लपेट कर लट्टू के सीध में रख दी जाती थी। इसके बाद कई फेंटे बांध कर पगड़ी का छोर फेंटों के नीचे से निकालकर दूसरी तरफ खोंस दिया जाता था (आ० ७१)११। इसी पगड़ी के एक भेद में पगड़ी का कुछ गोलुवां हिस्सा सिर पर तिरछा पड़ता था और उसी के चारों ओर पगड़ी लपेट ली जाती थी (आ० ७२)१२। इसी पगड़ी से एक दूसरे भेद में आगे का लट्टू ढोल के आकार का होता था (आ० ७३)१३।

c10.s2.12

७ ७—वही, प्ले० ५, १५

c10.s2.13

११ ११—वही, प्ले० ५, १६

c10.s2.14

१२ १२—वही, प्ले० ५, २०

c10.s2.15

१३ १३—वही, प्ले० ५, २१

c10.s2.16

सांची के अर्धचित्रों में हमें एक तरह की पगड़ी मिलती है जिसे हम 'शंखाकार'

c10.s2.17

७२ ७३ ७४ ७५ ७६

c10.s2.18

७७ ७८ ७९ ८० ८१

c10.s2.19

८२ ८३ ८४ ८५ ८६

c10.s2.20

८७ ८८ ८९ ९० ९१

c10.s2.21

कह सकते हैं। मूल सर्वास्तिवादियों के विनय में इस तरह की पगड़ी को कंबु कहा गया है (गिलगिट टेक्स्ट्स्, भा० ३, २, पृ० ९५-९६) । एक में लट्टू शंख के आकार का है और उसके पीछे वृत्ताकार अलंकार है (आ० ७४) १४। दूसरे में शंखाकार लट्टू पर पगड़ी का एक छोर कई कई फेर लपटा है (आ० ७५) १५। एक तीसरी भांति में शंख का अग्रिम भाग पेचक के आकार का है (आ० ७६) १६। सांची के अर्धचित्रों में निम्नलिखित प्रकार की और भी पगड़ियां देख पड़ती हैं।

c10.s2.22

१४ वही, प्ले० ५, २२

c10.s2.23

१५ वही, प्ले० ५, २३

c10.s2.24

१६ वही, प्ले० ६, २४

c10.s2.25

१—इस पगड़ी में लट्टू चक्करदार है (आ० ७७) १७ और एक फेंटा कान ढकता हुआ जाता है ।

c10.s2.26

१७ वही, प्ले० ६, २५

c10.s2.27

२—इसमें लट्टू का आकार फिरहरी जैसा है (आ० ७८) १८।

c10.s2.28

१८ वही, प्ले० ६, २६

c10.s2.29

३—इसमें फेंटे ढीले हैं और लट्टू लंबोतरा है (आ० ७९) १९।

c10.s2.30

१९ वही, प्ले० ६, २७

c10.s2.31

४—इसमें लट्टू पंखे के आकार का है, दाहिनी ओर पगड़ी में एक खूंटी सी वस्तु खुंसी देख पड़ती है (आ० ८०) २०।

c10.s2.32

२० वही, प्ले० ६, २८

c10.s2.33

५—इसमें लट्टू बेलन के आकार का है (आ० ८१) २१।

c10.s2.34

२१ वही, प्ले० ६, २६

c10.s2.35

६—इसमें तीन लट्टुओं के योग से पगड़ी बंधी देख पड़ती है (आ० ८२) २२।

c10.s2.36

२२ वही, प्ले० ६, ३०

c10.s2.37

सांची के अर्धचित्रों में टोपियां भी आयी हैं। लगता है शकों द्वारा ऐसी टोपियां इस देश में आयीं। निम्नलिखित प्रकार की टोपियां देख पड़ती हैं—

c10.s2.38

१—शकों द्वारा स्तूप पूजा के दृश्य में कुलाहनुमा टोपी देख पड़ती है (आ० ८३) २३ ।

c10.s2.39

२३ वही, प्ले० ६, ३१

c10.s2.40

२—चौकस गोल किनारे वाली टोपी, आगे एक बड़ा फूंदना लगा है (आ० ८४) २४।

c10.s2.41

२४ वही, प्ले० ७, ३३

c10.s2.42

३—पेशानी के ठीक बीचोबीच कटी हुई टोपी, ऊपर पान के आकार का फूंदना जिसके चारों ओर सकरमुद्दी के आकार का मंडल है (आ० ८५) २५।

c10.s2.43

२५ वही, प्ले० ७, ३४

c10.s2.47

४—नीचे वारों वाली तुर्की टोपीनुमा टोपी; इसके छत पर फूंदना है और किनारों पर मनकों अथवा फंदनों की झालर (आ० ८६)२६।

c10.s2.48

२६ वही, प्ले० ७, ३५

c10.s2.49

२—कुलाहनुमा टोपी जो सामने और बगल में पंजकों से सजी है (आ० ८७)२७।

c10.s2.50

२७ वही, प्ले० ७, ३६

c10.s2.51

सांची के अर्धचित्रों में सारथी चोटीदार टोपी पहनते थे (आ० ८८)२८। विदेशी अक्सर अपना सिर पुछल्लेदार फीते से बांधते थे (आ० ८९)२९।

c10.s2.52

२८ वही, प्ले० ८, ३८

c10.s2.53

२९ वही, प्ले० ८, ३६

स्त्रियों की वेश-भूषा

c10.s3.1

सांची के अर्धचित्रों में स्त्रियां दो तरह की साड़ियां पहने दिखलायी गयी हैं। एक में साड़ी घुटनों तक पहुंचती थी और चूनन की लांग पीछे खोस ली जाती थी, फीतेदार पर्यस्तक दोलड़ी करधनी में खोंस दिया जाता था (आ० ९०)३०। दूसरी तरह की साड़ी में एक भाग तो कमर में लपेट लिया जाता था और चूनन की लांग पीछे खोंस ली जाती थी (आ० ९१)३१। साड़ी पहनने की यह रीति आधुनिक सकच्छ साड़ी पहनने की रीति से मिलती है और इसकी चलन मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र में है। एक तीसरी जगह चूनन बगल में खोंसी दिखलायी गयी है (आ० ९२)३२।

c10.s3.2

३० वही, प्ले० ८, ४०

c10.s3.3

३१ वही, प्ले० ८, ४२

c10.s3.4

३२ वही, प्ले० ६, ४३

c10.s3.5

स्त्रियों के सिर किनारदार ओढ़नियों से ढंके रहते थे। ओढ़नियों में निम्नलिखित प्रकार देख पड़ते हैं:—

c10.s3.6

(१) सिर को ढकती दोहरे किनारे वाली ओढ़नी (आ० ९३)३३।

c10.s3.7

३३ वही, प्ले० ६, ४४

c10.s3.8

(२) सिर और चोटी को ढकती हुई घोघी के आकार की ओढ़नी (आ० ९४)३४।

c10.s3.9

३४ वही, प्ले० १, ४५

c10.s3.10

(३) बालों की सजावट को ढकती हुई दो तहों वाली ओढ़नी (आ० ९५)३५।

c10.s3.11

३५ वही, प्ले० ६, ४६

c10.s3.12

(४) सिर पर ओढ़नी दोलड़ी पेंची से बंधी है (आ० ९६)३६। (५) सिर पर पड़ी नुकीली ओढ़नी चोलड़ी पेंची से बंधी है (आ० ९७)३७। (६) कभी कभी ओढ़नी की चोटी पंखे के आकार की होती थी (आ० ९८)३८। (७) ओढ़नी में पंखे का आकार चोटी के पीछे दिखाया गया है (आ० ९९)३९। (८) पेशानी के चारों ओर टिकरेदार बद्धी है, बद्धी को ढकती हुई किनारेदार ओढ़नी है। ओढ़नी के ऊपर एक बोर अथवा चूडामणि है जिसमें पंखे के आकार में पर लगे हुए हैं (आ० १००)४०।

c10.s3.13

३६ वही, प्ले १०, ४७

c10.s3.14

३७ वही, प्ले० १०, ४८

c10.s3.15

३८ वही, प्ले० १०, ५०

c10.s3.16

३९ वही, प्ले० १०, ५१

c10.s3.17

४० वही, प्ले० १०, ५२

c10.s3.18

स्त्रियां विशेषकर साधुनियां कभी कभी पगड़ी भी पहनती थीं। एक जगह यह पगड़ी अटपटी पगड़ी का रूप ग्रहण करती है (आ० १०१)४१ और दूसरी जगह साफे का (आ० १०२)४२।

c10.s3.19

४१ वही, प्ले० ११, ५३

c10.s3.20

४२ वही, प्ले० ११, ५४

c10.s3.21

स्त्रियां कभी सिर से सटी गोल टोपी पहनती थीं (आ० १०३)४३। एक जगह इस टोपी में लटकनदार झालर लगी हुई है (आ० १०४)४४। एक जगह जुलूस में घोड़े पर सवार राजा के पीछे एक स्त्री शिरस्त्राण पहने हुए है (आ० १०५)४५। क्या यह यवनी है जो प्राचीन भारत में राजा के अंगरक्षक का काम करती थी ?

c10.s3.22

४३ वही, प्ले० ११, ५५

c10.s3.23

४४ वही, प्ले० ११, ५६

c10.s3.24

४५ वही, प्ले० ११, ५७

c10.s3.25

हम ऊपर कह आये हैं कि ई० पू० पहली शताब्दी में कुछ ऐसी मिट्टी की स्त्री मूर्तियां कौशांबी, मथुरा इत्यादि से मिली हैं जिनकी वेश-भूषा में कंचुक, भारी भरकम शिरोवस्त्र और भारी गहने हैं। स्त्रियों की यह पोशाक भरहुत और सांची के अर्धचित्रों में नहीं मिलती। ये मिट्टी की मूर्तियां शुंगकाल की कही जाती हैं पर ध्यान देने से पता चलता है कि यह ई० पू० पहली शताब्दी की है। लगता है इनके वेश पर शक प्रभाव पड़ा है पर गहने भारतीय हैं। कौशांबी से मिली हुई एक ऐसी ही अखंडित मूर्ति का जो अब इंडियन इंस्टिट्यूट म्यूजियम आक्सफर्ड४६ में है वर्णन नीचे दिया जाता है। श्री जांस्टम की राय में इस मूर्ति का

c10.s3.26

४६ ई० एच० जांस्टन, ए टेराकोटा फिगर एट आक्सफोर्ड, जे० आई० एस० ओ० ए०, १६४२, प्ठ० ६, पृ० ६४-१०२

c10.s3.27

समय ई० पू० २०० का है४७ और शायद मूर्ति मायादेवी की है४८। लेकिन डा० गॉर्डन का मत है कि ऐसी मूर्तियां ई० पू० दूसरी शताब्दी के अंत की और अधिकतर ई० पू० पहली शताब्दी की हैं४९।

c10.s3.28

४७ वही, पृ० ६२

c10.s3.29

४८ वही, पृ० १०१

c10.s3.30

४९ डी० एच० गॉर्डन, अर्ली इंडियन टेराकोटाज्, जे० आई० एस० ओ० ए०, १६४३, पृ० १५७

c10.s3.31

मूर्ति की (आ० १०६) पृष्ठिका जो खाली बच गयी है फुल्लों से सजी है। मूर्ति का शिरोवस्त्र खूब सजा हुआ है । बाल दो लट्टूदार जूड़ों में सिर के अगल बगल में हैं। बालों को हटने बढ़ने न देने के लिए ललाट पर चौलड़ी मोती की बढ़ी है; जिसके दोनों अंत के फूँदने साफ दिखलायी देते हैं। ललाट के दोनों कोनों में समानान्तर रेखाओं में पत्र भंग हैं और ललाट के बीचोबीच तिलक, दाहिनी ओर लट्टूदार जूड़े पर कामदार पतली पट्टी बँधी हुई है। बायीं ओर का जूड़ा एक चार टिकरों वाले शिखाजाल से बँधा है। और जूड़ा एक सिरे से दूसरे सिरे तक, निम्नलिखित आकार के टीकरों से सजा है यथा—सब से निचला अंकुश है, उसके बाद वाला त्रिरत्न, जिस पर कोई आवरण है, उसके बाद परशु है, उसके बाद फिर त्रिरत्न है जिसपर कुलाहनुमा कोई आवरण है और फिर है गंडासा । इन सब के सिरों से मोती की लड़ें लगी हुई हैं। जूड़ों के बीच फुल्लों से सुसज्जित ढालनुमा गोल टिकरा है जिसका मतलब शायद चूड़ामणि से हो । कानों में गोल तकियां हैं जिन पर सितारों और फुल्लों का काम बना हुआ है, इनके नीचे मनकों या मोती की कई लड़ें लटक रही हैं। शरीर एक बिना बांह वाले और पैर तक लटकते हुए कंचुक से ढका है । यह कंचुक कमर पर पेटी से बंधा हुआ है । गले के नीचे किनारेदार गोल कालर है। कंचुक में एक विशेषता यह है कि दाहिना कंधा तो खुला है और कंचुक का किनारा बायें स्तन के मध्य से होकर जाता है। कंचुक की चूननें समानान्तर रेखाओं द्वारा दिखायी गयी हैं। कमर से जरा नीचे खिसकी हुई एक तीन लड़वाली करधनी है । लड़ें खारदार और गोल मनकों से बनी हैं। निचली लड़ से दो फुंदनेदार झुमके लटक रहे हैं। इन झुमकों के ऊपरी लड़ों में दोनों ओर दो कुंभांडों की बैठी हुई मूर्तियां हैं। छाती पर दाहिने कंधे से लेकर कटि तक एक पट्टी है जिसमें चार जंतर यथा दो मछलियां, एक चिड़िया जिसका सिर टूट गया है, एक सोती हिरनी और मकर हैं। इन जंतरों से मनकों की लड़ें लटक रही हैं। मूर्ति एक या उससे अधिक दुपट्टे पहने है जो दायें और बायें बाहुओं और बायें कन्धे और स्तन पर होते हुए घुटनों पर खतम होते हैं। उनके ठीक ठीक घुमावों का पता नहीं चलता। हर कलाइयों पर चार चार कंकण हैं।

सिले वस्त्र

c10.s4.1

सांची के अर्धचित्रों से तत्कालीन सिले वस्त्रों पर भी प्रकाश पड़ता है। इनमें सारथि५०, सिपाही५१, राजा के अंगरक्षक अथवा ध्वजवाहक५२, तथा स्तूप पूजा करते हुए विदेशी५३ कंचुक पहने दिखलाये गये हैं। सिपाही दो भागों में बांटे जा सकते हैं, धनुर्धारी और पदाति। धनुर्धारी पूरे बांह वाला कंचुक पहने दिखलायी पड़ते हैं (आ० १०७)५४ बाण छोड़ते समय केहुनियों तक बहोलियां उलट ली जाती थीं५५। इसके अलावा वे तहमतनुमा कपड़ा कमर पर बांधते थे जो कई फेंटों के कमरबंद से कमर पर मजबूती से बंधा होता था। छाती पर दोहरे परतले और सिर पर पगड़ी होती थी। पैदल सिपाही धनुर्धारियों की तरह ही कपड़े पहनते थे लेकिन वे दोहरे परतलों का व्यवहार नहीं करते थे। कुछ स्थानों में पैदल सिपाही (आ० १०८)५६ कमरबंद से बंधी जांघिया पहने दिखलाये गये हैं। कमरबंद से लटकता पटका भी वे पहनते थे। स्तूप की पूजा करते हुए विदेशियों की पोशाक भी ध्यान देने योग्य है (आ० १०९)५७ वे पूरी बांह का घुटनों के नीचे लटकता कंचुक, कमरबंद, पीछे फड़फड़ाता हुआ गले में बंधा रुमाल पहने हैं। कुछ अपने सिर फीतों से बांधते थे जो सिर के पीछे बंधा हुआ होता था, कुछ कुलाहनुमा टोपियां पहनते थे और कुछ नंगे सर रहते थे। सब के पैरों में पूरा बूट होता था। सांची के स्तूप नं० ३ में एक जगह५८ एक मकर पर चढ़ा हुआ विदेशी आधे बांह का कंचुक जांघिया और बूट पहने है।

c10.s4.2

५० फर्गुसन, वही, प्ले० ३३

c10.s4.3

५१ वही, प्ले० ३६, १, २; ३८, १

c10.s4.4

५२ वही, प्ले० ४०

c10.s4.5

५३ मोतीचंद्र, वही, प्ले० ७, ३२

c10.s4.6

५४ वही, प्ले० १२, ६०

c10.s4.7

५५ वही, प्ले० १२, ६१

c10.s4.8

५६ वही, प्ले० १२, ६२

c10.s4.9

५७ वही, प्ले० १२, ६३

c10.s4.10

५८ मार्शल, सांची, भा० ३, प्ले० १७

c10.s4.11

सांची के अर्धचित्रों में केवल विदेशी पूरा बूट पहने दिखलाये गये ह, कहीं कह. यह बूट यूनानी चप्पल का रूप ग्रहण करता है (आ० ११०)५९। इससे यह न समझ लेना चाहिए कि भारतीय जूते पहिनते ही नहीं थे क्योंकि तत्कालीन बौद्ध साहित्य में तरह तरह के जूतों का वर्णन हैं। भरहूत और सांची के अर्धचित्रों में जूते न पाये जाने से केवल यही माना जा सकता है कि भारतीय सभ्यता के अनुसार पूजा के स्थानों में जूते आज दिन की तरह वर्जित

c10.s4.12

५९ फर्गुसन, ट्री एंड सर्पेंट वर्शिप, प्ले० २८; मोतीचंद्र, वही, प्ले० १३, ६४

c10.s4.13

११२

c10.s4.14

११३

c10.s4.15

११४

c10.s4.16

११५

c10.s4.17

थे। इन अर्धचित्रों में या तो मनुष्य मूर्तियां पूजा करती दिखलायी गयी हैं अथवा वे पवित्र जातकों में पात्रों का काम करती हैं और इसीलिए उनके पैरों में जूते नहीं हैं

ब्राह्मणों के वस्त्र

c10.s5.1

ब्राह्मण और साधु कोपीन पहनते हैं पर जैसा अर्धचित्रों से पता चलता है यह अनसिला वस्त्र तहमदनुमा न होकर घाघरेनुमा होता था६०। वे चादरनुमा वैकक्ष्य भी पहनते थे जो बायां कंधा और छाती ढांकता हुआ दाहिनी छाती खुला छोड़ देता था । ऋषि-पत्नियां लहंगेनुमा (आ० १११)६१ एक कपड़ा और वैकक्ष्य पहनती थीं। उनके और ऋषियों के वैकक्ष्यों में अंतर केवल इतना होता था कि ऋषियों का वैकक्ष्य केवल कंधा ढंकता था लेकिन स्त्रियों का वैकक्ष्य बाहु का भी कुछ भाग ढक लेता था।

c10.s5.2

६० मोतीचंद्र, वही, प्ले० ११, ५८

c10.s5.3

६१ वही, प्ले० १२, ५६

दक्षिणी वेश-भूषा

c10.s6.1

अर्धचित्रों और भित्तिचित्रों क आधार पर यह कहा जा सकता है कि उत्तर और दक्षिण भारत की वेश-भूषा में अधिक अंतर नहीं था फिर भी दोनों में कुछ स्थानिक अंतर तो था ही। दक्षिण भारत की वेश-भूषा के अध्ययन के लिए पर्याप्त साधन हमें अमरावती के प्रथम युग के अर्धचित्रों, कार्ले और भाजा के लेणों के अर्धचित्रों में और अजंटा की नं० ९ और १० लेणों के भित्तिचित्रों से मिलते हैं। अमरावती में एक सद्गृहस्थ की वेश-भूषा करीब करीब वैसी ही है जैसे सांची के अर्धचित्रों में एक सद्गृहस्थ की। वे कुछ लंबोतरा साफा बांधते थे, धोती घुटनों तक पहुंचती थी और कई लड़ रस्सियों से बने कमरबंद के अंत में एक फब्वा लटका करता था (आ० ११२)६२। कार्ले की लेण के अर्धचित्रों में धोती जरा फटी दिखलायी गयी है और उमेठे कपड़े का बना कमरबंद बगल में लटकता दिखलाया गया है६३। कार्ले में पगड़ी छोटी और कसकर बंधी दिखलायी गयी है।

c10.s6.2

६२ शिवराममूर्ति, अमरावती स्कल्पचर्स इन दि मद्रास गवर्नमेंट म्युजियम, प्ले० १८,१

c10.s6.3

६३ बर्जेस, रिपोर्ट आन दि बुद्धिस्ट केव टेंपल्स, प्ले० २५, २

c10.s6.4

भाजा के के अर्धचित्रों से दक्षिण की वेश-भूषा पर काफी प्रकाश पड़ता है और उनमें दक्षिणी झलक भी साफ़ देख पड़ती है। भाजा की वेश-भूषा के आकार प्रिंस आफ वेल्स म्यूजियम में भाजा अर्धचित्रों के प्लास्टर की प्रतिकृतियों से लिये गये हैं।

हाथी पर बैठे राजा और ध्वजवाहक की वेश-भूषा

c10.s6.t1.1

राजा के शीश पर गुंबददार पगड़ी बंधी है जो मोती या मनकों की लड़ों स सजी है। हाथों में मनकों की लड़ी से भर बांह के कंगन और गले में मनकों की बनी छलड़ी माला है।

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राजा के कमर में एक सिला हुआ लहंगा‌नुमा वस्त्र है जिसकी चूंदनेँ साफ साफ देख पड़ती हैं। राजा के पीछे बैठे हुए ध्वजवाहक के सिर पर एक अटपटी सी बंधी पगड़ी है जिससे तीन फेरे निकलते दिखलाये गये हैं। पगड़ी का एक छोर गालों को घेरता हुआ और ठुड्डी के नीचे से होकर दूसरी तरफ पगड़ी में खोंस दिया गया है। वह एक पूरे बांह का कंचुक भी पहने है जिसका दामन लहरिये के आकार में कटा हुआ है।

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द्वारपाल (आ० ११४) सिर पर मोती या मनकों की लड़ों से सजी हुई गुंबददार पगड़ी है, गले में खारदार और चपटे मनकों के कंठे हैं। दाहिने कंधे से होता हुआ एक परतला है जिसके छोर से कृपाण लटक रही है। धोती के एड़ी के कुछ ऊपर पहुंचती है और कमरबंद कमर में लपेट लिया गया है। कमरबंद से पटका लटक रहा है।

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सिपाही (आ० ११५) हल्की एक लट्टू वाली पगड़ी जिसके बाहर कुछ बाल की लटें निकली हैं बायें कंधे से होता हुआ दुपट्टा, कछाड़ेदार धोती और कमरबंद।

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पगड़ी पगड़ी (आ० ११६) अनेक पेंचो वाली घुमावदार पगड़ी (उष्णीषरत्न) जिसमें तीन पर जैसे निकले हैं।

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स्त्रियों के शिरोवस्त्र (१) ओढ़नी के ऊपर सिरपेंच जैसा आभरण, सिरपेंच की नीचे की लड़ियां फुल्लेदार गोल तख्तियों से बनी हैं (आ० ११७)। (२) भारी भरकम ओढ़नी जिसकी कई तहें सिर पर पड़ती है, सीसमांग और बद्धी बेना, सिर के मध्य में एक पहियानुमा टिकरा, ललाट पर एक गोल टीका (आ० ११८)। (३) शीश पर पगड़ी जैसा कोई आच्छादन जिसके बायें ओर कुछ दाने से निकले हैं। गले में खारदार, डोलकनुमा और चपटे मनकों के कंठे (आ० ११९)। (४) सिर पर मूंगरी के आकार का गोलियाया वस्त्र (आ० १२०) जिसका एक छोर गोले के ऊपर होता हुआ दूसरी ओर खोंस दिया गया है। (५) मस्तक पर जूट बंधी वेणी (आ० १२१) जिसमें शायद फीते लगे हैं। (६) पगड़ी नीचे के फेंटे कान तक आ जाते हैं (आ० १२२)।

अर्जंटा लेण ९-१० के भित्तिचित्रों में आयी वेश-भूषा की कुछ विशेषताएं

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सांची अथवा भाजा के अर्धचित्रों में हम पगड़ियों के बहुत से भेद देख चुके हैं।

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अजंटा के १० नं० की लेण के भित्तिचित्रों में पगड़ी भारी भरकम नहीं होती। पहले सिर के ऊपर बालों का जूड़ बाँध दिया जाता था, फिर एक कटे छोर वाली पतली छीर बालों के ऊपर लपेट ली जाती थी (आ० १२३)६४।

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६४ स्टेला क्रामरिश, ए सर्वे आफ पेंटिंग इन दि डकेन, प्ले० १

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दस नंबर की लेण के भित्तिचित्रों में कुछ सिले वस्त्रों के नमूने आये हैं। षड्दंत जातक के चित्र में शिकारी सोनुत्तर और उसका साथी कंचुक पहने हैं। अपने कंधे पर बहँगी लिये सोनुत्तर का साथी एक चोबाई बाहों वाला, त्रिकोणाकार कटे हुए गले वाला धारीदार कंचुक पहने है जो कमरबंद से बँधा है। सोनुत्तर का कंचुक बुंदकीदार छींट का बना मालूम पड़ता है। इसका गला गोल है और सामने तुकमेक लगाने की पट्टी है (आ० १२३-१२४)

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