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Pracin Bharatiya Veshabhusha c10.s2: साफे और पगड़ियाँ

Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c10.s2

Language
Hindi

साफे और पगड़ियाँ

c10.s2.1

प्रायः सभी पुरुष पगड़ी पहनते थे। ऐसा लगता है कि पगड़ी के फेंटे लंबे केशों से लपेटे जाते थे। पगड़ी बांधने की अनेक विधियां थीं जिनसे पगड़ियों की अनेक आकृतियाँ बन जाती थीं। साधारणतः भरहुत की तरह पगड़ी के आगे एक लट्टू होता था। पगड़ी के एक छोर से वह ढंक जाता था ओर तीन चार लपेटों के बाद पगड़ी बंध कर तैयार हो जाती थी (आ० ६६)६। इस पगड़ी में निम्नलिखित भेद पाये जाते हैं।

c10.s2.2

१—पगड़ी की दो फेंटे कुछ नीची बंधी हैं (आ० ६७)७।

c10.s2.3

२—पगड़ी पतले कपड़े की है जिसके अंदर से बाल झलक रहे हैं। दाहिनी तरफ की निचली फेंट का कुछ हिस्सा चूननदार है (आ० ६८)८।

c10.s2.4

८ ८—वही, प्ले० ५, १६

c10.s2.5

३—पगड़ी मोती की लड़ों से सुशोभित है (आ० ६९)९।

c10.s2.6

६ ६—मोतीचंद्र, वही, प्ले० ४, १४

c10.s2.7

९ ९—वही, प्ले० ५, १७

c10.s2.8

४—पगड़ी का लट्टू लंबोतरा है और कपड़ा धारीदार है (आ० ७०)१०।

c10.s2.9

४ ४—फर्ग्युसन, ट्री ऐंड सर्पेंट वर्शिप, प्ले० २७, १

c10.s2.10

१० १०—वही, प्ले० ५, १८

c10.s2.11

एक दूसरी तरह की पगड़ी में कपड़े की तह गोल लपेट कर लट्टू के सीध में रख दी जाती थी। इसके बाद कई फेंटे बांध कर पगड़ी का छोर फेंटों के नीचे से निकालकर दूसरी तरफ खोंस दिया जाता था (आ० ७१)११। इसी पगड़ी के एक भेद में पगड़ी का कुछ गोलुवां हिस्सा सिर पर तिरछा पड़ता था और उसी के चारों ओर पगड़ी लपेट ली जाती थी (आ० ७२)१२। इसी पगड़ी से एक दूसरे भेद में आगे का लट्टू ढोल के आकार का होता था (आ० ७३)१३।

c10.s2.12

७ ७—वही, प्ले० ५, १५

c10.s2.13

११ ११—वही, प्ले० ५, १६

c10.s2.14

१२ १२—वही, प्ले० ५, २०

c10.s2.15

१३ १३—वही, प्ले० ५, २१

c10.s2.16

सांची के अर्धचित्रों में हमें एक तरह की पगड़ी मिलती है जिसे हम 'शंखाकार'

c10.s2.17

७२ ७३ ७४ ७५ ७६

c10.s2.18

७७ ७८ ७९ ८० ८१

c10.s2.19

८२ ८३ ८४ ८५ ८६

c10.s2.20

८७ ८८ ८९ ९० ९१

c10.s2.21

कह सकते हैं। मूल सर्वास्तिवादियों के विनय में इस तरह की पगड़ी को कंबु कहा गया है (गिलगिट टेक्स्ट्स्, भा० ३, २, पृ० ९५-९६) । एक में लट्टू शंख के आकार का है और उसके पीछे वृत्ताकार अलंकार है (आ० ७४) १४। दूसरे में शंखाकार लट्टू पर पगड़ी का एक छोर कई कई फेर लपटा है (आ० ७५) १५। एक तीसरी भांति में शंख का अग्रिम भाग पेचक के आकार का है (आ० ७६) १६। सांची के अर्धचित्रों में निम्नलिखित प्रकार की और भी पगड़ियां देख पड़ती हैं।

c10.s2.22

१४ वही, प्ले० ५, २२

c10.s2.23

१५ वही, प्ले० ५, २३

c10.s2.24

१६ वही, प्ले० ६, २४

c10.s2.25

१—इस पगड़ी में लट्टू चक्करदार है (आ० ७७) १७ और एक फेंटा कान ढकता हुआ जाता है ।

c10.s2.26

१७ वही, प्ले० ६, २५

c10.s2.27

२—इसमें लट्टू का आकार फिरहरी जैसा है (आ० ७८) १८।

c10.s2.28

१८ वही, प्ले० ६, २६

c10.s2.29

३—इसमें फेंटे ढीले हैं और लट्टू लंबोतरा है (आ० ७९) १९।

c10.s2.30

१९ वही, प्ले० ६, २७

c10.s2.31

४—इसमें लट्टू पंखे के आकार का है, दाहिनी ओर पगड़ी में एक खूंटी सी वस्तु खुंसी देख पड़ती है (आ० ८०) २०।

c10.s2.32

२० वही, प्ले० ६, २८

c10.s2.33

५—इसमें लट्टू बेलन के आकार का है (आ० ८१) २१।

c10.s2.34

२१ वही, प्ले० ६, २६

c10.s2.35

६—इसमें तीन लट्टुओं के योग से पगड़ी बंधी देख पड़ती है (आ० ८२) २२।

c10.s2.36

२२ वही, प्ले० ६, ३०

c10.s2.37

सांची के अर्धचित्रों में टोपियां भी आयी हैं। लगता है शकों द्वारा ऐसी टोपियां इस देश में आयीं। निम्नलिखित प्रकार की टोपियां देख पड़ती हैं—

c10.s2.38

१—शकों द्वारा स्तूप पूजा के दृश्य में कुलाहनुमा टोपी देख पड़ती है (आ० ८३) २३ ।

c10.s2.39

२३ वही, प्ले० ६, ३१

c10.s2.40

२—चौकस गोल किनारे वाली टोपी, आगे एक बड़ा फूंदना लगा है (आ० ८४) २४।

c10.s2.41

२४ वही, प्ले० ७, ३३

c10.s2.42

३—पेशानी के ठीक बीचोबीच कटी हुई टोपी, ऊपर पान के आकार का फूंदना जिसके चारों ओर सकरमुद्दी के आकार का मंडल है (आ० ८५) २५।

c10.s2.43

२५ वही, प्ले० ७, ३४

c10.s2.47

४—नीचे वारों वाली तुर्की टोपीनुमा टोपी; इसके छत पर फूंदना है और किनारों पर मनकों अथवा फंदनों की झालर (आ० ८६)२६।

c10.s2.48

२६ वही, प्ले० ७, ३५

c10.s2.49

२—कुलाहनुमा टोपी जो सामने और बगल में पंजकों से सजी है (आ० ८७)२७।

c10.s2.50

२७ वही, प्ले० ७, ३६

c10.s2.51

सांची के अर्धचित्रों में सारथी चोटीदार टोपी पहनते थे (आ० ८८)२८। विदेशी अक्सर अपना सिर पुछल्लेदार फीते से बांधते थे (आ० ८९)२९।

c10.s2.52

२८ वही, प्ले० ८, ३८

c10.s2.53

२९ वही, प्ले० ८, ३६

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