Pracin Bharatiya Veshabhusha c11.s8: चीनी और भारतीय कपड़े और समूर
Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c11.s8
- Language
- Hindi
चीनी और भारतीय कपड़े और समूर
c11.s8.1
इस युग में साधुओं को छोड़ कर और कोई चमड़े के बने वस्त्र नहीं पहनता था। लेकिन इस युग में भारतवर्ष और रोम में चमड़े और समूरों का काफी व्यापार होता था। पेरिप्लस का कहना है कि चीनी चमड़े और समूरों का निर्यात सिंध नदी पर स्थित बार्ब-रिकोन४८ बंदरगाह से होता था । प्लिनी के अनुसार रोम में बराबर४९ चीनी लोहा, सूत और चमड़े आते थे ।
c11.s8.2
४८ —शॉफ, वही, पृ० ३८
c11.s8.3
४९ —प्लिनी, ३४, ४१
c11.s8.8
वालदार खुरदरे चमड़े अथवा भारी ऊनी कोट उत्तर पश्चिमी भारत से पूर्वी अफ्रिका को भेजे जाते थे। कावेरी पट्टन में भी ऊनी कपड़े बिकते थे। लातीनी में इस तरह की वस्तुओं को सामूहिक रूप से ‘केपिली इंडिकी’५० कहते थे। जांच पड़ताल से पता लगता है कि प्लीनी कथित चीनी लोहा, सूत और चमड़े वास्तव में चीन की पैदावार नहीं थे ये सब वस्तुएं भारतवर्ष की थीं जो पेरिप्लस के अनुसार खंभात की खाड़ी से हो कर सुमाली समुद्र तट के बंदरगाहों को जाती थीं५१। वार्मिंगटन के अनुसार सिंध नदी के बार्बरिकन बंदरगाह से जिन समूरों का निर्यात होता था उसमें कुछ तो मध्य एशिया के कौशेय पथ के सार्थवाहों द्वारा चीनी रेशम के साथ बलख होते हुए सिंध की ओर आते थे और कुछ तिब्बती समूर होते थे५२।
c11.s8.9
५० वार्मिंगटन, वही, पृ० १५७
c11.s8.10
५१ शॉफ, वही, पृ० १७३
c11.s8.11
५२ वार्मिंगटन, वही, पृ० १५८
c11.s8.12
चीनी कपड़े मौर्य युग में चीनसि५३ नाम से विख्यात थे पर इस बात का अभी ऐतिहासिक प्रमाण नहीं मिला है कि इतने प्राचीन काल में भी भारतवर्ष और चीन में भी व्यापारिक संबंध था। हो सकता है कि ईसवी पूर्व के भारतीय साहित्य में शायद चीन से काफिरिस्तान, कोहिस्तान और दरद प्रदेशों से मतलब है जहां “शिना” बोली जाती है। भारत में समूर के आयात का पता हमें महाभारत५४ से भी लगता है।
c11.s8.13
५३ अर्थशास्त्र, पृ० ८१
c11.s8.14
५४ महाभारत, २, ५१, ८