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Pracin Bharatiya Veshabhusha c12.s2: पगड़ियां

Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c12.s2

Language
Hindi

पगड़ियां

c12.s2.1

कभी कभी खुले सिर पर जूड़े मोती की लड़ों और रत्नों से सजे होते थे ८, लेकिन बहुधा लोग जूड़े के ऊपर पगड़ी पहनते थे (आ० १३१-१३३)६ । पगड़ियों के संबंध में एक उल्लेख- नीय बात यह है कि वे सिर पर टोपी की तरह पहनी जाती थीं१०। एक दृश्य में जहां सिद्धार्थ हामिनिष्क्रमण के लिए उद्यत हैं सारथि छंदक उनकी बंधी पगड़ी हाथ में लिए है११। यह पगड़ी किसी फूले कपड़ी की बनी है और उसका एक छोर पंखे के आकार में है। पगड़ी के फेंटों के अस्त व्यस्त न होने देने के लिए उस पर एक शीर्षपट्ट भी लगा हुआ है। आज दिन भी पंजाब और अफगानिस्तान में इस तरह की पगड़ी बांधी जाती है।

c12.s2.2

१ फूशे, ल' आर्त ग्रेकोबुधीक दु गंधार, भा० २, आ० ३६३, ४१७

c12.s2.3

३ फूशे, वही, आ० ४१५-१७

c12.s2.4

६ फूशे, वही, आ० ४१५

c12.s2.5

८ फूशे, वही, आ० ३६२, ३६५, ४१८ इत्यादि

c12.s2.6

१० फूशे, वही, भा० २, पृ० १८६

c12.s2.7

११ फूशे, वही, भा० १, आ० १७८ ए०, १८० बी; भा० २, आ० ४४७

c12.s2.8

शीर्षपट्ट बहुधा अलंकृत होते थे। कलकत्ता म्यूजियम में जलालाबाद के पास से मिले एक शीर्षपट्ट पर चूमते हुए मिथुन का चित्र है (आ० १३४)१२। शीर्षपट्ट कभी कभी सुपर्ण द्वारा अपहृत नाग के चित्र से भी अलंकृत होता था (आ० १३५)१३। कभी कभी इस पर बुद्ध मूर्ति भी खचित होती है (आ० १३६)१४। कभी कभी गोल शीर्षपट्ट सिंहमुख से अलंकृत होता है१५। कभी कभी इसके आकार से मोर के फैली पूंछ का बोध होता है। मोर की छाती और पीठ के उतार चढ़ाव का उपयोग सुनार सुंदर अलंकार बनाने के लिए करते थे (आ० १३३)१६। पंखे ऐसे फैले ऊपरी छोर के नीचे पगड़ी की फेंटें सजायी जाती थीं। कभी कभी इसके तीन फेंटें होते थे१७ और इसकी सजावट फेंटों के अंदर से बीचो-बीच जाते हुए एक सिकुड़े कपड़े से और अधिक बढ़ जाती थी। शीर्षपट्ट का मिथुन से सुसज्जित आधार पगड़ी के बीचोबीच लगा हुआ है। रत्नों और गरुड़ मूर्तियों से खचित एक पट्टी ललाट के चारों ओर है। ये पट्टियां और अलंकार दो बंधनों से जिनके छोर पीछे हवा में फड़फड़ा रहे हैं बंधे हैं (आ० १३१)१८।

c12.s2.9

१२ फूशे, वही, भा० १, पृ० १८१, नो० ३

c12.s2.10

१४ फूशे, वही, आ० ३६६, ४२६

c12.s2.11

१५ फूशे, वही, आ० ३०६, ४६५

c12.s2.12

१६ फूशे, वही, आ० ३६७

c12.s2.13

१७ फूशे, वही, भा० १, प्ले० १

c12.s2.14

१८ फूशे, वही, भा० २, आ० ३६३-६४