Pracin Bharatiya Veshabhusha c12.s7: स्त्रियों की वेश-भूषा
Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c12.s7
- Language
- Hindi
स्त्रियों की वेश-भूषा
c12.s7.1
गंधार की कला में स्त्रियों की वेश-भूषा के तीन कपड़े स्पष्ट हैं—यथा आस्तीन वाले कंचुक, साड़ी जो सारे शरीर को ढंक लेती थी, और एक चादर अथवा दुपट्टा जो कंधों को ढांकता हुआ बाहुओं पर गिरता था (आ० १६०-१६१ ए० बी०)४९। कभी कभी चादर का एक छोर कमर में खोंस लिया जाता था (आ० १६२-१६३)५०। झुल्ला प्रायः घुटनों तक पहुँचता था (आ० १६४-१६५)५१ और अपवाद स्वरूप कभी कभी वह आगे खुला भी रहता था (आ० १६६)५२। इस पूरी बाहों वाले और कमर के जरा नीचे पहुंचते हुए खुले कोट की काट ऐसी होती थी जिससे नाभि खुली रह जाय। ऐसा लगता है कि यह कोट बीच में लगे एक बटन से बंद होता था । कभी कभी यह कोट एक चौथाई बांहों वाला होता था और नाभि तक पहुँचता था५३। एक दूसरी तरह का पूरी बाहों वाला कोट नाभि को ढक लेता था (आ० १६६)५४। कंचुक साड़ी के ऊपर या नीचे पहना जाता था५५। कभी कभी साड़ी पहनने के दोनों तरीके साथ साथ देख पड़ते हैं (आ० १६७-१६८)५६। स्त्रियों के कंचुक लंबे और कसे होते
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४९ फूशे, भा० २, आ० ३३५, ३७८
c12.s7.3
५० फूशे, वही, भा० २, आ० ३१८, ३१६
c12.s7.4
५१ फूशे, वही, भा० १, आ० १०६; भा० २, आ० ३१६, ३३६
c12.s7.5
५२ फूशे, वही, भा० २, आ० ३३५
c12.s7.6
५३ ए० एस० आई०, एन० रि०, १६१६-२०, प्ले० ६
c12.s7.7
५४ वही, १६२५-२६, प्ले० ६६
c12.s7.8
५५ फूशे, भा० १, आ० १३६-१४०, २४४-४५; भा०, २, आ० ३१८-१६
c12.s7.9
५६ वही, भा० १, आ० १३३ बी
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थे और उन पर सिलवटें पड़ती हैं (आ० १६९)५७। कभी कभी स्त्रियां स्तनपट्ट भी पहनती थीं५८।
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५७ वही, भा० २, आ० ३१८, ३७४
c12.s7.15
५८ फूर्शे, वही, भा० २, आ० ३१६
c12.s7.16
गंधार की मूर्तियों और अर्धचित्रों से पता चलता है कि उस युग की स्त्रियां साड़ियां दो तरह से पहनती थीं। प्रायः साड़ी का एक भाग कमर में लपेट लिया जाता था और दूसरा हिस्सा चुन कर पीछे खोंस लिया जाता था (आ० १६३)५९। साड़ी पहनने की दूसरी रीति में साड़ी का एक सिरा कमर में लपेट लिया जाता था और दूसरा सिरा बायें कंधे पर डाल दिया जाता था (आ० १६२)६०। कभी कभी साड़ी इतनी बड़ी होती थी कि वह पैरों और शरीर को ढक लेती थी और उसका खाली हिस्सा आगे (आ० १७०)६१ या पीछे (आ० १७१)६२ लटका रहता था। साड़ी पहनने की एक तीसरी रीति में (आ० १६१ ए० बी०)६३ साड़ी का छूटा भाग स्तन पर होता हुआ बायें कंधे पर कांटे से लगा दिया जाता था। साड़ी का छूटा छोर कभी कभी साड़ी पर तिरछा डाल दिया जाता था जिससे दाहिना स्तन खुला रह जाता था (आ० १७२)६४। साड़ी ढीली तरह से भी पहनी जाती थी। ऐसी साड़ी का एक छोर जांघों में ऐसे लपेट लिया जाता था कि कमर खुली रह जाती थी। साड़ी का दूसरा छोर बायें हाथ से लिपटा हुआ उसी ओर लटका रहता था। साड़ी पहनने की इस रीति में बायीं छाती और पीठ खुली रह जाती थी (आ० १६६)। इस बात के भी उदाहरण हैं जब साड़ी चादर की तरह बायां कंधा ढाकते हुए पहनी जाती थी (आ० १७३)६५। दुपट्टा अथवा चादर अक्सर कंधों पर डाल दिये जाते थे और उसका एक छोर कमर के पास फेंटे में खोंस लिया जाता था। एक विचित्र ध्यान देने योग्य बात यह है कि गंधार की स्त्रियां आधुनिक दक्षिणी स्त्रियों की तरह सकच्छ साड़ी पहनती थीं। स्त्रियां अक्सर अपने बाल शेखरक से सजाती थीं, पर यदा कदा वे भारी काम के मुकुट भी पहनती थ (आ० १७४)६६।
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५९ वही, आ० ३१८-३१६
c12.s7.18
६० फूर्शे, वही, भा० १, आ० १५२
c12.s7.19
६१ फूर्शे, वही, भा० १, आ० २६१
c12.s7.20
६२ फूर्शे, वही, भा० २, आ० ३७८
c12.s7.21
६३ फूर्शे, वही, भा० २, आ० ३७५
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६४ फूर्शे, वही, भा० २, आ० ३७७
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६६ ए० एस० आई०, एन० रि० १६११-१२, प्ले० ४१, १६
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१५७
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१५९
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१६०
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१६१ ए
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१६१ बी
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यवनी अथवा विदेशी स्त्रियाँ राजा के अंगरक्षिका का काम करती थीं६७। गंधार की कला में उनका चित्रण हुआ है। इनकी वेश-भूषा दो तरह की होती है यथा यूनानी अथवा भारतीय। यूनानी पोशाक में यवनियाँ घुटनों के कुछ ऊपर तक पहुँचता कंचुक तथा कमरबंद युक्त चुन्नटदार घाघरा पहनती हैं। कंधों पर पड़े दुपट्टे के दोनों सिरे कंचुक में लगी कड़ियों से निकलते हैं और स्तनों को ढाकते हुए कमरबंद में खुंस जाते हैं। वे कुलाहदार टोपियां भी पहनती हैं (आ० १७५)६८। दूसरी तरह की अंगरक्षिकाएं साड़ी पहनती है जिसका एक हिस्सा तो कमर से और दूसरा छुट्टा हिस्सा तिरछे बल छाती पर होता हुआ बायें स्तन को ढाकता है। वे शिखाकार बँधा हुआ एक ढीला कमरबंद और एक भारी चादर अथवा दुपट्टा भी पहनती हैं (आ० १७६)६९।
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६७ मेगस्थनीज, फे० २३; स्त्राबो, १५।१।५५, सिलवांलेवी, ल थियेत्र आंदियां, २६, १२६, २४६; अर्थशास्त्र, १, २१; जातकमाला, पृ० १८५
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६८ फूर्शे, वही, भा० २, आ० ३४२
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६९ फूर्शे, वही, भा० २, आ० ३४३