Pracin Bharatiya Veshabhusha c12.s7.16
Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c12.s7.16
- Language
- Hindi
c12.s7.16
गंधार की मूर्तियों और अर्धचित्रों से पता चलता है कि उस युग की स्त्रियां साड़ियां दो तरह से पहनती थीं। प्रायः साड़ी का एक भाग कमर में लपेट लिया जाता था और दूसरा हिस्सा चुन कर पीछे खोंस लिया जाता था (आ० १६३)५९। साड़ी पहनने की दूसरी रीति में साड़ी का एक सिरा कमर में लपेट लिया जाता था और दूसरा सिरा बायें कंधे पर डाल दिया जाता था (आ० १६२)६०। कभी कभी साड़ी इतनी बड़ी होती थी कि वह पैरों और शरीर को ढक लेती थी और उसका खाली हिस्सा आगे (आ० १७०)६१ या पीछे (आ० १७१)६२ लटका रहता था। साड़ी पहनने की एक तीसरी रीति में (आ० १६१ ए० बी०)६३ साड़ी का छूटा भाग स्तन पर होता हुआ बायें कंधे पर कांटे से लगा दिया जाता था। साड़ी का छूटा छोर कभी कभी साड़ी पर तिरछा डाल दिया जाता था जिससे दाहिना स्तन खुला रह जाता था (आ० १७२)६४। साड़ी ढीली तरह से भी पहनी जाती थी। ऐसी साड़ी का एक छोर जांघों में ऐसे लपेट लिया जाता था कि कमर खुली रह जाती थी। साड़ी का दूसरा छोर बायें हाथ से लिपटा हुआ उसी ओर लटका रहता था। साड़ी पहनने की इस रीति में बायीं छाती और पीठ खुली रह जाती थी (आ० १६६)। इस बात के भी उदाहरण हैं जब साड़ी चादर की तरह बायां कंधा ढाकते हुए पहनी जाती थी (आ० १७३)६५। दुपट्टा अथवा चादर अक्सर कंधों पर डाल दिये जाते थे और उसका एक छोर कमर के पास फेंटे में खोंस लिया जाता था। एक विचित्र ध्यान देने योग्य बात यह है कि गंधार की स्त्रियां आधुनिक दक्षिणी स्त्रियों की तरह सकच्छ साड़ी पहनती थीं। स्त्रियां अक्सर अपने बाल शेखरक से सजाती थीं, पर यदा कदा वे भारी काम के मुकुट भी पहनती थ (आ० १७४)६६।