Pracin Bharatiya Veshabhusha c12.s8.t2.59
Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c12.s8.t2.59
- Language
- Hindi
c12.s8.t2.59
मध्यकालीन उत्तर और पश्चिम भारत में स्त्रियां प्रायः लहंगा पहनती थीं और आज दिन भी पश्चिमी युक्त प्रान्त, राजपूताना, मालवा तथा गुजरात में यह प्रथा जारी है। जहां तक हमें पता चलता है सब से पहले लहंगा कुषाणयुग की मूर्तिकला में दीख पड़ता है। इस युग की मूर्तियों में आये वेश-विन्यास से यह प्रायः निश्चित हो जाता है कि लहंगा पहनने की प्रथा साधारण न हो कर अपवाद स्वरूप थी। ऐसा लगता है कि इस युग में ग्वालिनें और उन्हीं की श्रेणी की स्त्रियां लहंगा पहनती थीं। मथुरा में जमालपुर के पास से मिली एक स्त्री मूर्ति शायद ग्वालिन की है (आ० २१३)। वह दाहिने हाथ से बेंत की बनी गेंडुरी पर स्थिर सिर पर घड़ा पकड़े है। नाभि के जरा नीचे तक उसका शरीर अनावृत्त है पर उसके बाद लहंगा शुरू होता है यह लहंगा वैसा भारी भरकम नहीं है जैसा आज दिन भी मथुरा के आसपास पहना जाता है। इसमें उतनी कलियां भी नहीं हैं। लहंगा कमर पर सीधा है और निचले भाग में केवल एक घेर पड़ता है। लहंगे का बड़ा जोड़ ओर से छोर तक ठीक बीचोबीच हो कर जाता है।