Pracin Bharatiya Veshabhusha c13.12
Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c13.12
- Language
- Hindi
c13.12
गुप्तयुग केवल राजनीतिक, धार्मिक और कला के क्षेत्रों में ही भारतीय इतिहास का सर्वश्रेष्ठ युग नहीं था वरन् इस युग में भौतिक संस्कृति का धरातल भी यथेष्ट ऊंचा उठा । इस भौतिक संस्कृति की उन्नति का पता हमें कालिदास के ग्रंथों से, अजंटा के चित्रों से और दूसरे पुरातात्त्विक अवशेषों से लगता है । अजंटा के भित्तिचित्रों में राजमहलों के सजीव चित्रण हमें प्राचीन महलों की सजावट की छोटी से छोटी वस्तुओं का भी पता देते हैं । साफ, सुथरे और हलके कपड़े पहने हुए राजाओं की प्रशांत मूर्तियां, अंत:पुर के कठोर नियमों का पालन करती हुई चित्ताकर्षक दासियां और प्रसाधिकाएं, सिले कपड़े पहने हुए नर्तक, नर्तिकाएं और समाजी, सुसज्जित सैनिकों से युक्त जुलूस, राजा के जीवन के ये सब पहलू गुप्तयुग में भौतिक संस्कृति के विजय-चिन्ह के समान हैं । केश बन्धन की सुंदर विधियां तथा साफ सुथरे कपड़े और गहने गुप्तयुग की पहले की शताब्दियों के भड़कीलेपन से दूर हैं । इस युग में स्त्रियां अपने बालों की चोटियां नहीं करती थीं पर उन्हें खूब सजाती थीं । उनके केश-बंधन की अनेक विधियों में हम उस युग की कुशल प्रसाधिकाओं का हाथ देख सकते हैं । धोती और साड़ी पहनने में कलात्मक ढंग से चूननों और सिलवटों के प्रदर्शन से हमें पता लगता है कि उस युग के पुरुष और स्त्रियां वेश-विन्यास की कला से पूरी तरह अवगत थे । इस युग में ठीक तौर से कपड़े पहनने का इतना महत्त्व था कि संस्कृत साहित्य में इसके लिए पांच शब्द यथा, आकल्प, वेश, नेपथ्य, प्रतिकर्म और प्रसाधन आए हैं १।