Pracin Bharatiya Veshabhusha c13: नवाँ अध्याय : तीसरी सदी से सातवीं सदी तक के साहित्य में भारतीय वेश-भूषा
Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c13
- Language
- Hindi
Contents
- c13.s1 राजदरबारों में सिले विदेशी वस्त्रों का प्रभाव — 2 parts
- c13.s2 विदेशी दासियां — 12 parts
- c13.s3 वेश-भूषा के इतिहास के साधन — 6 parts
- c13.s4 वस्त्रों के भेद — 4 parts
- c13.s5 रांकव — 3 parts
- c13.s6 जैन साहित्य में वस्त्रों के भेद — 11 parts
- c13.s7 कीमती कपड़े — 71 parts
- c13.s8 शाल और चादरें — 46 parts
- c13.s9 कपास के बने वस्त्र — 2 parts
- c13.s10 कपड़े बनाने की प्रक्रिया — 23 parts
- c13.s11 बंगाल के धोती दुपट्टे — 1 part
- c13.s12 गुजरात की बांधणी — 3 parts
- c13.s13 व्यवहारसूत्र में कपड़े बनने के प्रसिद्ध स्थल — 3 parts
- c13.s14 काशी के बने वस्त्र — 2 parts
- c13.s15 विवाह में कपड़े देने की प्रथा — 2 parts
- c13.s16 संस्कृत साहित्य में सिले और बेसिले कपड़े — 7 parts
- c13.s17 चोली — 3 parts
- c13.s18 लहँगा — 2 parts
- c13.s19 लबादा — 3 parts
- c13.s20 गुप्तयुग में स्त्रियों के वस्त्र पहनने के ढंग — 7 parts
- c13.s21 ऋतुओं के अनुसार स्त्रियों के कपड़े — 3 parts
- c13.s22 राजा का पहरावा — 6 parts
- c13.s23 उच्च वर्ण के लोगों के कपड़े — 2 parts
- c13.s24 पदाति और अश्वारोहियों के पहरावे — 12 parts
- c13.s25 राज कर्मचारी, दूत, लेखक इत्यादि की पोशाकें — 8 parts
- c13.s26 पगड़ियां — 7 parts
- c13.s27 कपड़े बदलने के समय — 2 parts
- c13.s28 कपड़े वासने की प्रथा — 2 parts
- c13.s29 कपड़े पर देवों का आवास — 2 parts
- c13.s30 जैन साधुओं के विहित वस्त्र — 28 parts
- c13.s31 विदेशों में उनकी प्रथा के अनुसार वस्त्र पहिनने की साधुओं को आजज्ञा — 17 parts
- c13.s32 साधुओं की वेश-भूषा — 4 parts
- c13.s33 चादरें — 13 parts
- c13.s34 जैन साध्वियों की वेश भूषा — 28 parts
- c13.s35 नर्तक और नर्तकियों के पहरावे — 4 parts
- c13.s36 जैन छेद सूत्रों में आए अनेक तरह के जूते — 46 parts
- c13.s37 युवानच्वांङ् द्वारा वर्णित भारतीयों की वेश-भूषा — 3 parts
- c13.s38 इत्सिंग द्वारा वर्णित बौद्ध भिक्षुओं का पहरावा — 2 parts
- c13.s39 रेशमी कपड़ों की अनुमति — 5 parts
- c13.s40 भिक्षुणियों के वस्त्र — 5 parts
- c13.s41 भिक्षुओं के वस्त्र रंगने के रंग — 2 parts
- c13.s42 नागरिकों के वस्त्र — 2 parts
- c13.s43 ठंडे प्रदेशों की वेश-भूषा — 3 parts
- c13.s44 बौद्ध भिक्षुओं के वस्त्रों के नाम — 5 parts
- c13.s45 कुरता — 2 parts
- c13.s46 जूते — 16 parts
नवाँ अध्याय : तीसरी सदी से सातवीं सदी तक के साहित्य में भारतीय वेश-भूषा
c13.1
तीसरी सदी से सातवीं सदी तक के साहित्य में भारतीय वेश-भूषा
c13.2
"मनुष्य-जीवन में सब से पहले भोजन और कपड़ों का स्थान है। मनुष्यों के लिए ये बेड़ियां हैं जो उन्हें पुनर्जन्म से बांधे रहती हैं।"
इत्सिंग
c13.3
प्राक् गुप्तयुग का इतिहास कुषाण साम्राज्य के छिन्न भिन्न होने पर आरंभ होता है। इस युग में राजपूताने और पूर्वी पंजाब में योधेयों की राज्य-सत्ता का आरंभ और दृढ़ीकरण तथा पवांय के नागों, कौशांबी के भारशिवों और मघों इत्यादि का उत्कर्ष देखते हैं। गुप्त वंश के उद्भव के पहले तक इन राज्यों का उत्तर भारत के अधिक हिस्से पर प्रभुत्व रहा। आधुनिक ऐतिहासिक अनुसंधानों से प्रायः यह निश्चित सा हो गया है कि इन राज्यों और गणतंत्रों ने कुषाणों की राज्य-सत्ता उखाड़ कर पुनः भारतीय आदर्शों पर स्थित राज्य-सत्ता चलाई।
c13.4
विश्रृंखलित राज्यतंत्र के इस युग में भारतीय वेश-भूषा के इतिहास की कम सामग्री मिलती है। इस युग में हमें सांची और अमरावती के से अर्धचित्र प्राप्त नहीं हैं जिनके बल पर हम तत्कालीन वेश-भूषा का सांगोपांग चित्र खड़ा कर सकें। मथुरा की तथाकथित कुषाणयुग की कुछ मूर्तियों का सहारा हम इस युग की वेश-भूषा के इतिहास के लिए ले सकते हैं। पर इसमें कठिनाई है कुषाण कला से तात्पर्य। कुषाण कला गोल तरह से दो सौ वर्षों तक जारी रही और अभी तक कला के इतिहासकारों ने इस कला में विकासक्रम का पता लगाने का प्रयत्न तक नहीं किया है। कुषाण कला के माने कुषाण युग के कला के सिद्धांतों पर आश्रित कला है चाहे वह पहली शताब्दी की हो या तीसरी। जैसा हमें मालूम है आरंभिक कुषाणयुग में सुंदर से सुंदर मूर्तियां काफी संख्या में बनी, लेकिन इसका कोई कारण नहीं मालूम पड़ता कि कुषाणों के पतन के और गुप्तों के अभ्युत्थान के अन्तर युग में भी यह कला जीवित नहीं रही। लेकिन इस प्रश्न के हर पहलू को ध्यान में रखते हुए तथा ऐतिहासिकता के कठोर मापदंडों को सामने रखते हुए हमने इस युग की अधिकतर मूर्तियों और अर्धचित्रों का उपयोग तीसरी शताब्दी की भारतीय वेश-भूषा के इतिहास के लिए नहीं किया है।
c13.5
इस युग की दक्षिणी वेश-भूषा के इतिहास के लिए आंध्र देश के गुंटूर जिले के पालनाड तालुक के गोल्ली नाम ग्राम से मिले तीसरी शताब्दी के उत्कीर्ण पट्ट बड़े काम के हैं। इन अर्धचित्रों से हमें तत्कालीन दक्षिण भारत की वेश-भूषा का काफी पता चलता है पर इस युग की वेश-भूषा अमरावती और नागार्जुनीकोंड के अर्धचित्रों में चित्रित दक्षिण
c13.6
भारत की वेश-भूषा से कोई भिन्न नहीं है। गोल्ली के अर्धचित्रों की यथार्थवादिता तमिलनाडु से मिले पल्लव अर्धचित्रों के आदर्शवाद से बिल्कुल विपरीत है। इसी कारण से हम पल्लव अर्धचित्रों और मूर्तियों का उपयोग वेश-भूषा के इतिहास के लिए नहीं कर सके। ग्वालियर रियासत के पवांय नामक स्थान से मिली हुई मूर्तियां और अर्धचित्र तीसरी सदी के हैं और इनसे बुंदेलखंड के वस्त्रों की स्थानिक विशेषताओं का पता चलता है।
c13.7
गुप्तयुग भारतीय वेश-भूषा के इतिहास में बड़ा महत्त्व रखता है। इस युग की वेश-भूषा के अध्ययन के लिए प्रचुर सामग्री हमें सारनाथ, देवगढ़ इत्यादि से मिली मूर्तियों और अजंटा की १७ नंबर की लेण से मिलती है। वास्तव में अजंटा की लेणें वाकाटकों की राज्य-सीमा में हैं और इसलिए शायद अजंटा की चित्रकला को गुप्त शैली की मानना ऐतिहासिक दृष्टि से असंगत हो। पर जैसा कि भारतीय कला के इतिहास से पता चलता है उत्तर भारत में परिवर्धित गुप्तकला का भारतवर्ष के कोने कोने में समावेश हुआ और उसकी सौंदर्य भावना और अंकन शैली का प्रभाव देश में सर्वत्र पड़ा फिर चाहे वह सिंध में मीरपुरखास से मिली मूर्तियां हों अथवा अजंटा के भित्तिचित्र । अगर यह दृष्टिकोण हम ध्यान में रक्खें तो इस युग की प्रादेशिक कलाओं को चाहे वह गुप्त साम्राज्य के बाहर ही क्यों न परिवर्धित हुई हों हम गुप्तकला के अन्तर्गत मान सकते हैं। जो भी हो इस युग की मिट्टी की मूर्तियों, सिक्कों और भित्तिचित्रों के आधार पर हम चौथी से सातवीं शताब्दी तक के भारतीय कपड़ों और पहरावे का जीता जागता चित्र खड़ा कर सकते हैं।
c13.8
गुप्तवंश की नींव चन्द्रगुप्त प्रथम (३२०-३३५ ई० स०) ने डाली पर समुद्रगुप्त (३३५-३८५ ई० स०) ने जो भारतवर्ष के इस काल के शासकों में अपनी दूरदर्शिता, पराक्रम और कला-प्रेम के कारण एक विशेष स्थान रखते हैं, इस नींव को मजबूत किया। अनेक विजय यात्राओं के अलावा जिनका हमसे संबंध नहीं है, समुद्रगुप्त साहित्य-व्यसनी, कवि और संगीतज्ञ थे । उनके पुत्र और उत्तराधिकारी चंद्रगुप्त विक्रमादित्य (३८५-४१३ ई०) ने ३९५ और ४०० ई० के बीच में सौराष्ट्र के क्षत्रपों को जीत लिया । चन्द्रगुप्त अपनी कीर्ति और यश के बल पर आज तक भारत में विख्यात हैं। इन्हीं के राज्यकाल, में महाकवि कालिदास हुए । समुद्रगुप्त और चंद्रगुप्त के विजय-पराक्रमों से परिवर्धित गुप्त-साम्राज्य का, जैसा कि वसाढ़, भीटा और राजघाट से मिली मुद्राओं से पता चलता है, कार्य संचालन सुव्यवस्थित था। कुमारगुप्त (४१४-४५५ ई०) का राज्यकाल गुप्त-साम्राज्य की क्रमशः अवनति का है। स्कंदगुप्त (४५५-४७० ई०) के राज्यकाल में हूणों के भीषण आक्रमण से आक्रांत गुप्त-साम्राज्य छिन्न भिन्न हो गया, और इस तरह भारत के स्वर्ण-युग के इतिहास पर परदा पड़ गया । स्कंदगुप्त के पराक्रम का पता हमें भितरी के स्तंभोत्कीर्ण लेख से पता लगता है जिसमें कहा गया है कि जमीन पर अपने सिपाहियों के साथ सोकर मानो उन्होंने तप करते हुए अपनी विचलित कुललक्ष्मी की आराधना की । इस
c13.9
अवसर पर (करीब ४५५ ई०) तो हूण हारे, पर थोड़े ही समय के लिए । उनके आक्रमणों का तांता जारी ही रहा और स्कंदगुप्त की मृत्यु के उपरान्त गुप्त-साम्राज्य का अंत हो गया । स्कंदगुप्त के बाद भी कुछ गुप्त वंशज राजाओं का पता हमें सिक्कों और लेखों से लगता है पर इनका ऐतिहासिक दृष्टि से विशेष महत्त्व नहीं है । युवानच्वांग के कथनानुसार हूणों को जो थोड़े दिनों के लिए गुप्त-साम्राज्य के अधिकारी बन बैठे थे बालादित्य ने हराया । इस महान् पराक्रम का श्रेय यशोधर्मन् नाम का राजा भी ५३३-५३४ ई० के बीच के अपने एक अभिलेख में लेता है ।
c13.10
सांस्कृतिक दृष्टिकोण से गुप्तयुग भारतीय इतिहास का स्वर्णयुग माना जाता है इस युग में सब धर्मों को पूरी स्वतंत्रता थी । गुप्त राजे स्वयं परमभागवत थे पर इस युग में वैदिक धर्म की पुनर्जागृति हुई और यज्ञों को पुन: प्रधानता मिली । इतना होने पर भी बौद्ध-धर्म की ओर लोगों की उतनी ही आस्था रही ।
c13.11
श्री हर्ष के युग को भी हम गुप्तयुग के सांस्कृतिक इतिहास के साथ साथ ले सकते हैं । इस युग में बाण, युवानच्वांग और दूसरे लेखक भारत के कुछ ऐसे सांस्कृतिक पहलूओं पर भी प्रकाश डालते हैं, जिनका पता तक इस युग के सबसे बड़े कवि कालिदास के ग्रंथों में भी नहीं चलता ।
c13.12
गुप्तयुग केवल राजनीतिक, धार्मिक और कला के क्षेत्रों में ही भारतीय इतिहास का सर्वश्रेष्ठ युग नहीं था वरन् इस युग में भौतिक संस्कृति का धरातल भी यथेष्ट ऊंचा उठा । इस भौतिक संस्कृति की उन्नति का पता हमें कालिदास के ग्रंथों से, अजंटा के चित्रों से और दूसरे पुरातात्त्विक अवशेषों से लगता है । अजंटा के भित्तिचित्रों में राजमहलों के सजीव चित्रण हमें प्राचीन महलों की सजावट की छोटी से छोटी वस्तुओं का भी पता देते हैं । साफ, सुथरे और हलके कपड़े पहने हुए राजाओं की प्रशांत मूर्तियां, अंत:पुर के कठोर नियमों का पालन करती हुई चित्ताकर्षक दासियां और प्रसाधिकाएं, सिले कपड़े पहने हुए नर्तक, नर्तिकाएं और समाजी, सुसज्जित सैनिकों से युक्त जुलूस, राजा के जीवन के ये सब पहलू गुप्तयुग में भौतिक संस्कृति के विजय-चिन्ह के समान हैं । केश बन्धन की सुंदर विधियां तथा साफ सुथरे कपड़े और गहने गुप्तयुग की पहले की शताब्दियों के भड़कीलेपन से दूर हैं । इस युग में स्त्रियां अपने बालों की चोटियां नहीं करती थीं पर उन्हें खूब सजाती थीं । उनके केश-बंधन की अनेक विधियों में हम उस युग की कुशल प्रसाधिकाओं का हाथ देख सकते हैं । धोती और साड़ी पहनने में कलात्मक ढंग से चूननों और सिलवटों के प्रदर्शन से हमें पता लगता है कि उस युग के पुरुष और स्त्रियां वेश-विन्यास की कला से पूरी तरह अवगत थे । इस युग में ठीक तौर से कपड़े पहनने का इतना महत्त्व था कि संस्कृत साहित्य में इसके लिए पांच शब्द यथा, आकल्प, वेश, नेपथ्य, प्रतिकर्म और प्रसाधन आए हैं १।
c13.13
१ १—अमरकोश, २, ६, ६१
c13.14
साहित्यिक उद्धरणों और अजंता के चित्रों से यह साफ साफ पता चलता है कि गुप्तयुग में कपड़े की नक्काशियों में भी काफी उन्नति हुई।
c13.15
गुप्तयुग में भारतीय वेश-भूषा के अध्ययन के लिए मूर्तियों और अजंता की १७ नं० की लेण के भित्तिचित्रों के सिवाय बहुत से सिक्के भी हैं जिन पर गुप्त-राजाओं की प्रतिकृतियां अंकित हैं। इनकी वेश-भूषा से इस मार्के की बात का पता चलता है कि गुप्त राजे कुषाण राजाओं की तरह कंचुक, कोट और पायजामे पहनते थे तथा शुद्ध भारतीय पहरावा भी। इस सिले वस्त्रों के उपयोग से पता चलता है कि गुप्तों ने देशी और विदेशी दोनों पहरावे उसी तरह ग्रहण कर लिये थे जैसे आज दिन पश्चिमी शिक्षा पाये हुए नवयुवक सहूलियत के लिए आफिस जाने में अथवा सामाजिक उत्सवों में शामिल होने पर पश्चिमी पहरावा पहन लेते हैं लेकिन घर पर अपना जातीय पहरावा ही पहनते हैं। यह बात भारतीयों के लिए ही नहीं प्रत्युत यूरोपीय ढंग से रहने वाले प्रत्येक एशियावासी के लिए लागू है। सिले हुए कपड़ों में पहनने की सहूलियत और आकर्षक ढंग गुप्तों की रसात्मक पर कार्यात्मक वृत्ति को अवश्य रुची होगी। हमें गुप्तों की विवेचनात्मक बुद्धि का पता पहरावे में किए गए हेर-फेर से लगता है। उन्होंने कुषाणयुग के मोटे, ऊनी अथवा रुई भरे सूती कपड़ों की जगह पतले और पारदर्शी कपड़ों का व्यवहार शुरू किया जो जलवायु के दृष्टिकोण से इस देश के लिए सर्वथा उपयुक्त थे। कुषाण वस्त्रों के भारीपन और भद्दी काटों की जगह हम गुप्त-वेश-भूषा में तैयारी ओर सफाई देखते हैं जिनसे पहनने वालों की कलात्मक सुरुचि का पता लगता है। गुप्तयुग में सिले हुए विदेशी कपड़ों से धीरे धीरे उनका विदेशीपन निकाल कर उन्हें भारतीय ढांचे में ढाल दिया गया। उदाहरणार्थ मूर्तियों और सिक्कों में कुषाण राजे पूरे पैर का भारी बूट पहने दिखाये गए हैं। ये बूट देखने में तो अवश्य ही भद्दे मालूम पड़ते हैं पर मध्य एशिया के कठोर शीत में पैरों की रक्षा करते हैं और घुड़सवारी में तो इनकी बड़ी उपयोगिता सिद्ध होती है। लेकिन गुप्तयुग में इन बूटों का भद्दा और भारीपन निकल जाता है और उनकी शक्ल आधुनिक घुड़सवारी के बूट जैसी बन जाती है।
राजदरबारों में सिले विदेशी वस्त्रों का प्रभाव
c13.s1.1
कुषाणयुग में इस देश में सिले वस्त्र काफी संख्या में आए इसके पहले भी बहुत प्राचीन काल से इस देश में सिले वस्त्रों का ज्ञान था। उन लोगों की वेश-भूषा पर जिनका राज दरबार से निकट संबंध था इसका कुछ अंशों तक असर पड़ा। उनके सुंदर कारखाने कंचुक और जांघिये इस बात के द्योतक हैं कि तत्कालीन राजे अपने सेवकों की वरदी का पूरा ध्यान रखते थे। अक्सर लोगों का यह विश्वास है कि सिले कपड़े पहने हुए वे नौकर विदेशी थे जिन्होंने बाहर से आकर राजा की नौकरी स्वीकार कर ली थी। यह बात कुछ
c13.s1.2
नौकरों के लिए तो ठीक हो सकती है पर उनमें अधिकतर तो इसी देश के रहने वाले थे। सेवकों और सेविकाओं के जो वर्णन बाण भट्ट ने आए हैं और जिन्हें हमने आगे चल कर दिया है, उनसे हमारे मत की पुष्टि होती है।
विदेशी दासियां
c13.s2.1
विदेश से क्रीत दासियों के लाने की प्रथा इस देश में गुप्तकाल के बहुत पहले से थी। 'पेरिप्लस आफ दी एरीथ्रियनसी'२ में (पहली शताब्दी ई०) इस बात का उल्लेख है कि भरोच के बन्दरगाह में उतरने वाली बहुमूल्य वस्तुओं में जो राजा के व्यवहार के लिए होती थीं कीमती चांदी के बर्तन, गायक लड़के और अन्तःपुर के लिए सुन्दर दासियां होती थीं। विदेशों से दासियां लाने की प्रथा का जैन साहित्य में भी जो गुप्तकालीन अथवा उसके कुछ पहले का है वर्णन है। 'अंतगडदसाओं'३ में विदेशी दासियों की एक तालिका दी हुई है। कथा में इस बात का उल्लेख है कि बचपन में राजकुमार गौतम की सेवा अनेक जातियों की विदेशी दासियां करती थीं। बब्बर४ (बर्बर), पोसय (बौसी)५, यूनानी (जोणिय, यवनी), पल्हविय (पहलवी), इषिणय (इषिणी),६ घोणगिणिणि, लासिय, लूसिय, दामिली (तामिल), सिंहली, आरबी (अरब), पुलिंद, पक्कणी,७ बहली (बलख देश की), मुरुंडी (मुरुंडी)८ शबर और पारसी, (पारसीही) इन दासियों में मुख्य होती थीं। इन विदेशी दासियों के वस्त्र उनके देशों के अनुरूप होते थे (विदेस परिमण्डियाहि) और इनके कपड़ों
c13.s2.2
२ २—शाफ, पेरिप्लस आफ दी एरीथ्रियनसी, पृ० ४२
c13.s2.3
३ ३—एल० डी० बार्नेट द्वारा अनूदित, पृ० २८-२६, लंदन १६०७; नायाधम्म कहाओ, १, २०, में भी दासियों का यही ब्योरा दिया हुआ है।
c13.s2.4
४ ४—ऊपर की तालिका में सब देशों की पहचान करना आसान नहीं है। बम्बर देश से शायद उत्तरी अफ्रीका का मतलब है। 'पेरिप्लस' में आये बर्बर शायद लाल सागर और नील नदी के बीच में रहने वाले बेजा, ऊपरी नील एबीसीनिया और अदन की खाड़ी के दनकेल सुमाली और मल्ला लोगों के पूर्वज थे (शाफ, वही, पृ० ५-६) । 'पेरिप्लस' के अनुसार बर्बर देश से बहुधा दासियों का निर्यात होता था (वही, पृ० २४)
c13.s2.5
५ ५—पोसय या बौसय ऑक्सस नदी के तीर से आयी दासियां हो सकती हैं।
c13.s2.6
६ ६—ईषि ऋषिक शब्द का जो चीनी यू-ची का संस्कृत रूप है, प्राकृत स्वरूप है। जिस समय का यह अवतरण है शायद उस समय ऋषिक बदख्शां में रहते थे।
c13.s2.7
७ ७—पक्कण और पाणिनी में आये प्रकण्व (६, १, १५३) एक ही हैं। काशिका के अनुसार यह देश था। डा० वासुदेवशरण (जे० यू० पी० एच० एस० १६, भा० १, प्ले० २८) प्रकण्व की पहिचान हिरोडोटस के 'परिकानिआइ' से जो स्टेनकोनो के अनुसार (कार्पस ऑफ खरोष्ठी इंसक्रिप्शन्स पृ० १८) फरगना के निवासी थे करते हैं।
c13.s2.8
८ ८—हेमचंद्र के अनुसार 'लंपाकास्तु मुरुण्डाः स्युः' अर्थात लंपाक के रहने वाले मुरुंड थे अगर ठीक है तो ये दासियां अफगानिस्तानके लमगान प्रदेश से आती थीं।
c13.s2.9
की काट उनके देश के कपड़ों जैसी ही होती थी (सदेस नेवत्थ गहिय वेसाहि) । ये दासियां इस देश की भाषा नहीं समझ सकती थीं और वे केवल इशारों से दूसरों के विचारों और आज्ञाओं को समझ सकती थीं (इंगिय चितिय पत्थिय वियनियाहि) । विदेशी दासियों के उपरोक्त वर्णन से यह पता चलता है कि ईसा की आरंभिक शताब्दियों में भारतीय अंतःपुरों में उनका प्रवेश हो चुका था । गुप्तयुग में भी अंतःपुर में विदेशी दासियों के रखने की काफी प्रथा थी। कालिदास के नाटकों में, राजा की अंगरक्षिकाओं की तरह यवनियों का काफी उल्लेख आया है। इस युग में यवन शब्द का आरंभिक अर्थ जिसके अनुसार वह यूनानियों का द्योतक था लुप्त हो चुका था और यह शब्द शायद अधिकतर विदेशियों के लिए लागू होने लगा था।
c13.s2.10
इन विदेशी दासियों के वेश-भूषा का प्रभाव तत्कालीन भारतीय वेश-भूषा पर काफी पड़ा होगा, कम से कम अजंता के भित्तिचित्रों में आयी दास दासियों की आकृतियों से तो यही पता चलता है । लेकिन यह मान लेना भ्रमात्मक होगा कि इस देश में विदेशी वेश-भूषाओं का प्रवेश केवल दासियों द्वारा ही हुआ। यथार्थ में शकों और कुषाणों की चढ़ाइयां, विदेशों से व्यापारिक संबंध तथा बाहर के यात्री इन सब कारणों से भी यहां विदेशी वस्त्रों का कुछ कुछ प्रचार बढ़ा होगा । शक इस देश में कुलाह, तिकोने गले वाले कंचुक तथा पूरे पैर के बूट लाये । भारतीय वेश-भूषा के क्षेत्र में इस विदेशी धावे की कहानी हम अजंटा के भित्तिचित्रों में पढ़ सकते हैं और यह भी देख सकते हैं कि किस तरह से विदेशी पहरावे भारतीयता के रंग में ढल रहे थे । समन्वय की भावना गुप्त कला तक ही सीमित न रह कर वेश-भूषा के क्षेत्र में भी आयी।
c13.s2.11
गुप्तयुग में विदेशी वस्त्रों की ओर झुकाव की तुलना हम मुगलयुग में भारतीय पहरावे पर तुर्की प्रभाव से कर सकते हैं। मध्य एशिया के निवासी मुगल अपनी वेश-भूषा इस देश में लाये और यह वेश-भूषा समायांतर में भारतीयता के ढांचे में ढल कर जातीय पोशाक बन गयी और उसे राजकर्मचारियों और व्यापारियों ने अपना लिया । जामा, पगड़ी, पाजामा, कमरबंद और पटके जातिभेद और वर्णभेद छोड़ कर सभी के वस्त्र बन गये । कुषाणयुग में भी भारतीय वेश-भूषा में कुछ ऐसा ही परिवर्तन हुआ था गो कि उसका प्रभाव इतना व्यापक नहीं था जैसा मुगल युग में । भारतीय दृष्टि में शक तुषार बर्बर थे इसलिए उनकी वेश भूषा भी मान्य नहीं थी । जब गुप्त कुषाणयुग की संस्कृति के उत्तराधिकारी हुए तो उन्होंने कुषाणयुग की वेश-भूषा की उपयोगिता देखते हुए उसे थोड़े फेर-फार के साथ अपना लिया। लेकिन इस वेश-भूषा को जबर्दस्ती दूसरों पर लादने का प्रश्न ही नहीं उठता था और इसीलिए विदेशी पोशाक उन्हीं तक सीमित रही जिन्हें वह प्रिय थी और जिन्हें अपने दैनिक जीवन में उसकी उपयोगिता का ज्ञान था । हमारी अधिकतर जनता इस युग में भी अपने पुराने कपड़े जो इस देश के लिए उपयुक्त थे, पहनती रही।
c13.s2.12
गुप्तयुग के सिपाहियों की वर्दी की ओर भी ध्यान देना आवश्यक है। अजंटा के भित्तिचित्रों में सैनिकों का एक भाग धोती पहनता है, लेकिन दूसरा भाग कंचुक, पायजामा अथवा जांघिया और पूरे बूट पहनता है ओर अपने बाल फीते अथवा रूमाल से बांधता है। वास्तव में देखा जाय तो उनकी वेश-भूषा पूर्व निश्चित वर्दी के रूप में है। गुप्तयुग के पहिले की शताब्दियों में, सिवाय कहीं कहीं शातवाहन युग को छोड़ कर, सिपाहियों की कोई पूर्व निश्चित वरदी नहीं थी ओर अधिकतर सिपाही धोती ही पहनते थे। गुप्तयुग में सिपाहियों की वर्दी सम्भवतः कुषाणकाल की वर्दी के आश्रय पर बनी। गुप्तराजे पराक्रमी योद्धा थे और उन्हें अपनी विजय-यात्राओं के लिए हमेशा एक सुशिक्षित, सुवेष्टित और सामानों से लंस सेना की आवश्यकता रहती थी। नयी वर्दी की उपादेयता गुप्तों की व्यापारिक बुद्धि को ठीक जंची होगी और उसी के फलस्वरूप एक राष्ट्रीय सेना का सृजन हुआ होगा। सेना में जिस तरह का हेर-फेर कुषाण सेना के संगठन को ले कर हुआ होगा। यह भी संभव है कि हूणों से लड़ाई लड़ते समय इस तरह के संगठन और वर्दी की उपयोगिता का ज्ञान गुप्तों में हुआ होगा। जो भी हो इस प्रश्न का निराकरण आसानी से नहीं हो सकता।
वेश-भूषा के इतिहास के साधन
c13.s3.1
पुनः इतिहास की कड़ी पकड़ते हुए हमें पता लगता है कि गुप्तों के समसामयिक दक्खिन के शासक वाकाटक थे। पांचवीं शताब्दी के पहले भाग में गुप्त-साम्राज्य ओर सुदूर दक्खिन के राज्यों के बीच में वाकाटक साम्राज्य दक्खिन में सब से मजबूत राज्य थे। अपने समय में वाकाटक साम्राज्य दक्खिनी ओर उत्तरी भारत के सांस्कृतिक आदान-प्रदान का साधन था। इस वंश का छठवीं शताब्दी के मध्य में अंत हो गया। अजंटा से मिले वाकाटक लेख भारतीय कला के इतिहास के काल क्रम को ठीक करने में अपना एक विशेष स्थान रखते हैं। दक्षिण में वेश-भूषा का इतिहास भी हमें अजंटा के भित्तिचित्रों से मिलता है। जब हम दक्षिण की वेश-भूषा की तुलना गुप्तयुग की वेश-भूषा से करते हैं तो हमें पता चलता है कि गुप्तकालीन पहिरावा दक्षिण तक चला गया था ओर थोड़े से स्थानिक भेदों को छोड़ कर सारे भारत में एक ही सा था।
c13.s3.2
उत्तर भारत में हूणों के पतन और गुप्तों के पुनः अपनी शक्ति को प्राप्त करने में असफल होने से बहुत से राज्यों का उदय हुआ जिनमें वलभी, चालुक्य, मौखरी, बाद के गुप्त तथा थानेश्वर के वर्धन जिन्होंने बाद के इतिहास में काफी स्थान पाया मुख्य थे। सातवीं शताब्दी के उत्कर्ष का युग श्री हर्ष का राज्यकाल (६०५-६४० ई०) था। श्री हर्ष एक कुशल शासक, कलाप्रेमी और साहित्यिक थे, इनके दरबार में इनके जीवनी लेखक बाण भट्ट हुए। हर्ष के समसामयिक दक्षिण के चालुक्य राजा पुलिकेशिन् हुए जिनके समय में
c13.s3.3
शायद अजंटा की १ और २ नंबर की लेणें बनीं । शायद इन्हीं के काल में अथवा इनके कुछ पहले बाघ के भित्तिचित्र बने जो तात्कालिक आचार विचार के जानने के साधन हैं ।
c13.s3.4
युवानच्वांग और इत्सिंग की भारत-यात्राएं इसी युग की संस्कृति धर्म और सामाजिक परिस्थिति पर अच्छा प्रकाश डालती हैं। इन चीनी यात्रियों के विवरणों और बाणभट्ट के ग्रंथों में आये संस्कृति अवतरणों के आधार पर हम सातवीं सदी की भारतीय वेश-भूषा का सुंदर चित्र खड़ा कर सके हैं । जैन छेदसूत्रों और चूर्णिकों में भी, जिनमें बृहद् कल्पसूत्रभाष्य और निशीथ चूर्णी मुख्य हैं, हम इस युग अथवा इसके पहले के युग का बहुत सा सांस्कृतिक मसाला पाते हैं । वस्त्रों और पहरावों का तो इनमें विशेष रूप से वर्णन है। इनमें दी हुई वस्त्र की तालिकाओं से यह बताना तो मुश्किल है कि कौन कौन से वस्त्र खास कर गुप्तयुग में ही होते थे, क्योंकि इनमें कुछ बहुत पुराने वस्त्रों के भी नाम आ गए हैं, पर साधारणतः तो यह कहा ही जा सकता है कि ये सब वस्त्र चाहे कितने ही पुराने क्यों न हों गुप्तकाल तक बनते थे । गुप्तयुग के बाद इनमें से बहुत से वस्त्रों की चलन कम हो गयी थी, इसीलिए दसवीं सदी के जैन टीकाकार उनके ठीक ठीक अर्थ नहीं कर पाये ।
c13.s3.5
सभ्य समाज का एक नियम सा है कि उसके अंतर्गत रहने वाले अच्छे कपड़े पहनें और इसके लिए इस बात की आवश्यकता होती है कि तरह तरह के रंगीन और नक्काशीदार कपड़े बनें। बढ़िया कपड़ों की इस देश में और बाहर काफी मांग थी। भारतीय समाज के स्त्री और पुरुष दोनों कपड़े के शौकीन थे । इस युग में छपाई की भी काफी उन्नति हुई और तत्कालीन नक्काशियां जैसे चारखाने, डोरिया, हंस मिथुन इत्यादि कालांतर में छीपियों के रूढ़िगत अलंकार बन गये ।
c13.s3.6
अभाग्यवश हमें इस युग के संस्कृत साहित्य में इतनी सामग्री नहीं मिलती जिसके द्वारा हम उस युग के रहन-सहन आमोद-प्रमोद और वेश-भूषा का पूरा पूरा चित्र खींच सकें । कालिदास के काव्यों में वस्त्रों के छिटपुट उल्लेख हुए हैं पर सातवीं सदी की वेश-भूषा पर बाणभट्ट की 'कादंबरी' और 'हर्षचरित' से काफी प्रकाश पड़ता है । बाण भट्ट की सजग आंखों से उस युग की छोटी से छोटी बात नहीं छिपी है । जैन छेद सूत्रों के रचयिता कवि या साहित्यिक नहीं थे और इसीलिए उनके वर्णनों में रस की मात्रा कम है। फिर भी उनके रूखे वर्णनों और तालिकाओं में ऐसी सामग्री सुरक्षित है जो अन्यत्र नहीं मिल सकती ।
वस्त्रों के भेद
c13.s4.1
अमरकोश के अनुसार वस्त्र चार प्रकार के होते थे यथा (१) वल्क, यानी छालों और रेशों से बने कपड़े जिनमें क्षौम भी आ जाता था, (२) फाल, अर्थात् फल के रेशों से
c13.s4.2
बने वस्त्र जिसमें कपास भी आ जाती थी, (३) कौशेय, अर्थात् रेशमी कपड़े, और (४) रांकव अर्थात् पश्मीने९। इसी तरह अनुयोगद्वार सूत्र१० के वस्त्रों को अंडज, बोंडज और कीडज इन तीन जातियों में बांटा गया है। अंडज की तो टीकाकार ने विचित्र कल्पना की है जिसके अनुसार ऐसे कपड़े हंस के अंडे से बनते थे, शायद उनका तात्पर्य यहां हंस दुकूल से है। सूती कपड़े को बोंडज कहते थे और रेशमी को कीडज।
c13.s4.3
९ अ० को०, २, ६, १११
c13.s4.4
१० अनुयोगद्वार, ३७
रांकव
c13.s5.1
रंकु संज्ञा से बना रांकव शब्द टीकाकारों के अनुसार रंकु पशु अथवा ऐसे ही किसी दूसरे पशु के रोएं से बने ऊनी कपड़े का द्योतक था। पर रंकु की पहचान उन्हें नहीं थी। रांकव का एक सीधा सादा अर्थ जो हमारे समझ में आता है वह यह है। पामीर के ऊंचे पठारों और मैदानों में एक किस्म के बकरे होते हैं जिन्हें वहां के रहने वाले रंग कहते हैं। शाल दुशाले बनाने के लिए अच्छा से अच्छा पश्म हमें इन बकरों से मिलता है११। पामीर का यह रंग ही शायद संस्कृत का रंकु है। अगर रंकु और रंग की समानता ठीक है तो रांकव के अर्थ होंगे पामीर के आसपास में बना पश्मीना। जैसा महाभारत से पता चलता है पश्म के नमदे (रांकव कट) भी बनते थे१२।
c13.s5.2
११ वुड, ए जर्नी टु आक्सस, लंदन, १८४१, यूल द्वारा इन्ट्रोडक्टरी एसे, पृ० ५७
c13.s5.3
१२ महाभारत, ३, २२५, ६
जैन साहित्य में वस्त्रों के भेद
c13.s6.1
जैसा हम पहले कह आये हैं जैन साहित्य में वस्त्रों की अनेक तालिकाएं आती हैं। इन तालिकाओं में बहुत से वस्त्रों के नाम आते हैं जिनके आधार पर हम इस युग के वस्त्र की निम्नलिखित तालिका तैयार कर सकते हैं—
c13.s6.2
१—जंगिय—जंगिय ऊनी कपड़े को कहते थे टीका में इसे जंगमोष्ट्राणूर्णा निष्पन्नं कहा गया है इससे पता लगता है कि यह वस्त्र ऊंट के बाल से बनता था१४।
c13.s6.3
२—भंगिय—भंगेला। अभी भी यह वस्त्र थोड़ा बहुत अलमोड़े में बनता है और इसका व्यवहार बहुत साधारण लोग करते हैं१५।
c13.s6.4
३—पोत्तग—ताड़ के पत्रों से बने कपड़े१६।
c13.s6.5
४—खोमिय—अलसी की छाल के रेशों से बना कपड़ा १७। निशीथ चूर्णि१८ में
c13.s6.6
१३ आचारांग सूत्र, २, ५, १, ३६४; ३६६; आचारांग सूत्र, १७०; निशीथ चूर्णि (लियो एडीशन,) भा० ७, पृ० ४६७
c13.s6.7
१४-१७ आचारांग, २, ५, १, १
c13.s6.8
१८ निशीथ, भा० ७, पृ० ४६७
c13.s6.9
क्षोम की व्याख्या है—पोण्डमया खोम्मा अण्णे भणंति रुक्खेहितो निग्गच्छन्ति तहा वडेहितो पादगा साहा। इस व्याख्या के अनुसार क्षौम रूई अथवा वट शाखाओं की छाल के रेशे से बनता था। टीका में जो दुविधा देख पड़ती है उससे पता चलता है कि ७वीं सदी में क्षोम का बनना कम हो गया था।
c13.s6.10
५—तूलकड—सेंमल के सूत से बने वस्त्र।
c13.s6.11
ये पाँचों तरह के कपड़े कीमती नहीं होते थे और इसलिए जैन साधु इनका व्यवहार कर सकते थे।
कीमती कपड़े
c13.s7.1
६—आइणगाणि—चमड़े से बने वस्त्र१९। निशीथ में२० इसकी व्याख्या है 'अजिनं चम्मं तम्मि जे किरंति', अर्थात् अजिन मृगचर्म से बने वस्त्र होते थे। गुप्तकाल में लगता है शीतप्रधान प्रान्तों में पोस्तीन जैसा कोई कपड़ा पहना जाता था।
c13.s7.2
१९ आचारांग, २, ५, १, ३
c13.s7.3
२० निशीथ, ७, पृ० ४६७
c13.s7.4
७—सहिणगाणि—महीन सूत के बने वस्त्र२१। निशीथ२२ में यह वस्त्र सूक्ष्म कहा गया है।
c13.s7.5
२१ आचारांग, २, ५, १, ३
c13.s7.6
२२ निशीथ, ७, पृ० ४६७
c13.s7.7
८—सहिणकल्लण—आचारांग की टीका में इस वस्त्र की व्याख्या 'वर्णछद्यादिभिश्च कल्याणानि, शोभनानि वा' अर्थात् रंग और अलंकारों से युक्त वस्त्र किया गया है२३। निशीथ२४ में इसकी व्याख्या इस तरह से है, 'कल्लाणं स्निग्धं लक्षणयुक्तं वा किञ्चि सहिणं कल्लणं चोभयो' अर्थात् कल्याण का अर्थ चिकना अथवा नकाशीदार कपड़ा होता है, कहीं कहीं वस्त्र में चिकनाई और नकाशी दोनों होती है।
c13.s7.8
२३ आचारांग, २, ५, १, ३
c13.s7.9
२४ निशीथ, ७, पृ० ४६७
c13.s7.10
९—आयाणि—बकरे के रोएं से बने वस्त्र। आचारांग२५ में इस कपड़े की व्याख्या है—'क्वचिद्देश विशेषेऽजाः सूक्ष्म रोमवत्यो भवन्ति, तत् पक्ष्मनिष्पन्नानि आजकानि भवन्ति' अर्थात् किसी देश विशेष में बकरियां कोमल रोएं वाली होती हैं, उनके पश्म से बने कपड़े आजक कहलाते हैं। यहां आजक से पश्मीने का मतलब है और लगता है कि रांकव और आजक एक ही वस्त्र के पर्यायवाची हैं। निशीथ२६ में इस वस्त्र की अजीब व्याख्या है—'आयें णाम तोसलि विसये सीयतलाए अयाणं खुरेस सेवालतरीया लग्गंति तथा
c13.s7.11
२५ आचारांग, २, ५, १, ३
c13.s7.12
२६ निशीथ, ७, पृ० ४६७
c13.s7.13
वत्थं कीरंति' अर्थात् तोसलिविषय में ऋषितडाग के पास बकरियों के खुरों में एक तरह की सेवार फंस जाती है उसी से आजक बनता है । मतलब यह है कि ओड़ीसा में एक ऐसी सेवार होती थी जिससे आजक बनता था । वास्तव में चूर्णिकार को आजक के ठीक अर्थ का पता नहीं था, पर अर्थ करना जरूरी था और इसीलिए उसने कोरी कल्पना कर दी ।
c13.s7.14
१०—कायाणि—नीली रुई के सूत से बना कपड़ा । आचारांग की टीका२७ में इसकी व्याख्या है—'तथा क्वचिद्देशे इन्द्रनीलवर्णः कर्पासो भवति तेन निष्पन्नानि' अर्थात् किसी देश में इंद्रनील वर्ण की कपास होती है, उससे बना वस्त्र । यहां कोकटी जैसी किसी कपास से मतलब है । निशीथ२८ में इसकी व्याख्या है 'काकविसए काकजंघस्स जही मणी पडितो तटागे तत्थ रत्तानि जाणि ताणि कार्य भणंति, द्रुते वा काए रत्तं ।' काक विषय में काकजंघ की मणि जिस तालाब में मिलती है उससे रंगा वस्त्र अथवा रक्त की द्रुति से रंगा वस्त्र । इस व्याख्या का ठीक ठीक अर्थ समझ में नहीं आता ।
c13.s7.15
२७ आचारांग, २, ५, १, ३
c13.s7.16
२८ आचारांग, २, ५, १, ३
c13.s7.17
११—दुगुल्लाणि—दुकूल की व्याख्या आचारांग की टीका२९ में है 'गौड विषय विशिष्ट कार्पासिकं', अर्थात् गौड देश (बंगाल) में उत्पन्न एक विशेष तरह की कपास से बना वस्त्र । लेकिन निशीथ३० में दुकूल की कुछ और ही व्याख्या है—'दुगुल्लो रुक्खो तस्स वागो घेत्तूं उदूखले कुट्टइञ्जति पाणिएण ताव जाव भूसी भूतो ताहे कंप्पति दुगुल्लो' अर्थात् दुकूल वृक्ष की छाल ले कर पानी के साथ तब तक ओखली में कूटते हैं जब तक उसके रेशे अलग नहीं हो जाते । बाद में वे रेशे कात लिए जाते हैं । निशीथ की यह व्याख्या ठीक मालूम पड़ती है । अमरकोश में दुकूल क्षोम का पर्यायवाची है३१ और उसके आवरणों को निवीत और प्रावृत कहते थे । ऐसा लगता है कि लोग जब दुकूल के अर्थ भूल गए तब सभी महीन घुले वस्त्रों को दुकूल कहा जाने लगा३२।
c13.s7.18
३० निशीथ, ७, पृ० ४६७
c13.s7.19
३१ अ० को०, २, ६, ११२
c13.s7.20
३२ देखिए रघुवंश पर मल्लिनाथ की टीका, १, ६५
c13.s7.21
हंस दुकूल गुप्तयुग के वस्त्र निर्माण कला का एक उत्कृष्ट नमूना था । आचारांग३३ में एक जगह कहा गया है कि शक्र ने महावीर को जो हंस दुकूल का जोड़ा पहनाया था वह इतना हलका था कि हवा का मामूली झटका उसे उड़ा ले जा सकता था । इसकी बनावट की तारीफ कारीगर भी करते थे । वह कलाबत्तू के तार से मिला कर बना था और उसमें हंस के अलंकार थे । नायाधम्म कहाओ३४ के अनुसार वह जोड़ा वर्ण स्पर्श से युक्त, स्फटिक के समान निर्मल और बहुत ही कोमल होता था । दहेज में और कीमती कपड़ों के साथ दुकूल के जोड़े भी दिये जाते थे३५ ।
c13.s7.22
३३ आचारांग, २, १५, ९०
c13.s7.23
३४ नायाधम्म, १, १३
c13.s7.24
३५ अंतगडदसाओ, पृ० ३२
c13.s7.25
१२—पट्ट—रेशमी कपड़ा—आचारांग की टीका३६ में इसकी व्याख्या है 'पट्टसूत्र निष्पन्नानि' अर्थात् पट्टसूत्र से बने वस्त्र । बृहद् कल्पसूत्र भाष्य की टीका में भी इसकी यही व्याख्या है ।
c13.s7.26
३६ आचारांग, २, ५, १, ३
c13.s7.27
कपड़ों के भेद में जैसा हम ऊपर देख आये हैं अनुयोग द्वार३७ में कौडय भी आया है। इसके निम्नलिखित भेद गिनाये गए हैं, (क) मलय, (ख) अंशुक, (ग) चीनांशुक, और (घ) कृमिराग । बृहत् कल्पसूत्र भाष्य३८ में उपरोक्त रेशमी कपड़ों के अतिरिक्त पट्ट और सुवर्ण नामक रेशमी वस्त्रों के और उल्लेख हैं।
c13.s7.28
३७ अनुयोगद्वार, सू० ३७
c13.s7.29
३८ बृ० क० भा० ३, ३६६१
c13.s7.30
क—मलय—आचारांग३९ में इसकी टीका 'मलयज सूत्रो निष्पन्नानि' अर्थात् मलय सूत्र से बना वस्त्र किया गया है, लेकिन बृहत् कल्पसूत्रभाष्य के अनुसार यह रेशमी कपड़ा था । हो सकता है इस रेशम का नाम दक्षिण बिहार में जिसे मलय भी कहते थे पैदा होने से पड़ा ।
c13.s7.31
३९ आचारांग, ३, ५, १, ३
c13.s7.32
ख—अंशुक—बृहत् कल्पसूत्र भाष्य४० की टीका में इसे कोमल और चमकीला रेशमी कपड़ा कहा गया है । निशीथ४१ में इस शब्द की लंबी चौड़ी व्याख्या है—'अंसुयाणि कणगकंतानि, कणगखसियानि, कणगचित्ताणि, कणग विचित्ताणि' अर्थात् अंशुक में तारबाने का काम होता था, अलंकारों में जरदोजी (खचितानि) का काम तथा उसमें सोने के तार से चित्र विचित्र नकाशियां बनी होती थीं । उपरोक्त वर्णन से पता चलता है कि अंशुक किमखाव अथवा पोत जैसा कोई कपड़ा था । आचारांग में भी इसका उल्लेख है४२ ।
c13.s7.33
४० बृ० क० भा०, ४, ३६६१
c13.s7.34
४१ निशीथ, ४, पृ० ४६७
c13.s7.35
४२ आचारांग सूत्र, २, ५, १, ३
c13.s7.36
ग—चीनांशुक—बृहद् कल्पसूत्र भाष्य४३ में इसकी व्याख्या 'कोशिकाराख्यः कृमिः तस्माज्जातं' अथवा 'चीनानामजनपदः तत्र यः श्लक्ष्णतरपटः तस्माज्जातं'—अर्थात् कोशकार नामक कीड़े के रेशम से बना वस्त्र अथवा चीन जनपद के बहुत चिकने रेशम से बना कपड़ा है। निशीथ४४ में इसकी व्याख्या है 'सुहुमतरं चीर्णसुयं चीण विसए वा जातं
c13.s7.37
४३ बृहत् कल्पसूत्र, ४, ३६६१
c13.s7.38
४४ निशीथ, ७, पृ० ४६७
c13.s7.39
चीणांसुयम' अर्थात् बहुत पतले रेशमी कपड़े अथवा चीन के बने रेशमी कपड़े को चीनांशुक कहते हैं । उपरोक्त व्याख्याओं से पता चलता है कि बहुत पतले रेशमी कपड़े और चीन के रेशमी कपड़े दोनों को ही चीनांशुक कहते थे ।
c13.s7.40
घ—कृमिराग—किरिम दाना से बने गुलाबी रंग में रंगा हुआ रेशमी कपड़ा ।
c13.s7.41
ङ—सुवर्ण—बृहत्कल्पसूत्र भाष्य४५ की टीका में इसे सुनहरे रंग वाला रेशमी वस्त्र कहा गया है । यह रेशम के खास तरह के कीड़ों से बनाये कोशों से निकलता था । लगता है यहां आसाम के मूंगा रेशम से जिसका रंग सुनहला होता है तात्पर्य है ।
c13.s7.42
४५ —बृहत् क० सू० ४, ३६६१
c13.s7.43
१३—पत्रोर्ण—इसे आचारांग सूत्र४६ में पन्नुभ कहा गया है और यह छाल के रेशे से बना एक विशेष प्रकार का वस्त्र था । अमरकोश४७ में पत्रोर्ण एक तरह का रेशम कहा गया है । शायद यह किसी किस्म का जंगली रेशम रहा हो। अमरकोश के टीकाकार क्षीरस्वामी का कहना है इस रेशम को बड़ और लकुच की पत्तियां खाने वाले कीड़े पैदा करते थे ;
c13.s7.44
४६ —आचारांग, २, ५, १, ३
c13.s7.45
४७ —अमरकोश, डा० हरदत्त शर्मा द्वारा संपादित, पृ० १५७
c13.s7.46
उपरोक्त रेशमी कपड़ों में जो बेशकीमती होते थे उन्हें अमरकोश४८ ने महाधन की संज्ञा दी है ।
c13.s7.47
४८ —अमरकोश, २, ६, ११३
c13.s7.48
१४—देसराग—आचारांगसूत्र४९ में इसे केवल रंगीन कपड़ा कहा गया है पर निशीथ चूर्णि५० में इसका निम्नलिखित वर्णन है —'जत्थविसए या रंग विधितार देसा रत्ता देसराग', जरत् विषय में जो रंग विधि है उसके अनुसार रंगा हुआ वस्त्र। इससे यह पता लगता है कि जाटों के देश अर्थात् पूर्वी पंजाब तथा पश्चिमी युक्त प्रदेश में कपड़े रंगने की कोई ऐसी विशेष प्रथा थी जो सारे देश में मशहूर थी। हो सकता है देशराग का चुनरी रंगने से संबंध हो ।
c13.s7.49
४९ —आचारांग सूत्र, २, ५, १, ३
c13.s7.50
५० —निशीथ, ७, ४६७
c13.s7.51
१५—अमिला—आचारांगसूत्र५१ में तो इसे बकरे के चमड़े से बना कपड़ा कहा गया है पर यह अर्थ कोई संगत नहीं मालूम पड़ता। निशीथ चूर्णि५२ में इसका निम्नलिखित अर्थ दिया है, 'रोमेसुकता अमिला अथवा णिम्मला अमिला पट्टिणी सुघट्टिता ते परिभुज्ज माणा कडे कर्डेति', रोम से बना वस्त्र अमिला कहलाता है अथवा अमिला वह निर्मल वस्त्र
c13.s7.52
५१ —आचारांग, २, ५, १, ३—८
c13.s7.53
५२ —निशीथ, ७, ४६७
c13.s7.54
है जिस पर घोटे की कुंदी से कलफ आ गया है। उपरोक्त अर्थों को देखने से तो यही पता चलता है कि कुंदी किए हुए किसी विशेष तरह के वस्त्र से अमिल का तात्पर्य है ।
c13.s7.55
१६—गज्जफल—आचारांग५३ में इसे फड़फड़ाता कपड़ा कहा गया है । निशीथ चूर्णि में५४ इसी तरह का अर्थ है—‘समणं सद्दवं करेंति ते गज्जला’—सुनने में जो शब्द करे। लगता है कि वह लंकिलाट की तरह कोई कड़ा कपड़ा रहा होगा ।
c13.s7.56
५३ —आचारांग, २, ५, १, ३—८
c13.s7.57
५४ —निशीथ, ७, ४६७
c13.s7.58
१७—फालिय—आचारांग के५५ अनुसार यह स्फटिक के समान साफ और पारदर्शी कपड़ा था। निशीथ चूर्णि५६ में भी इसका यही अर्थ है और इसे फाडिग कहा है, ‘फडिगपहाणनिमा फडिंगा अच्छा’ इत्यर्थः’ स्फटिकशिलाके समान स्वच्छ । लगता है यह कोई बहुत ही महीन मलमल, जिसके लिए यह देश प्रसिद्ध था, रही होगी।
c13.s7.59
५५ —आचारांग, २, ५, १, ३—८
c13.s7.60
५६ —निशीथ, ७, ४६७
c13.s7.61
१८—काय—इस शब्द के अर्थ का पता नहीं है पर शायद यह काक विषय (पूर्वी मालवा) में बना कपड़ा हो५७ ।
c13.s7.62
५७ —आचारांग, २, ५, १, ३—८
c13.s7.63
१९—कोयवाणि—रोएंदार कंबल अथवा ऊनी वस्त्र५८ । निशीथ चूर्णि५९ इसे कोतव कहा गया है । आधुनिक थुल्मे की तरह यह कोई वस्त्र था ।
c13.s7.64
५८ —वही
c13.s7.65
५९ —निशीथ, ७, ४६७
c13.s7.66
१९—कंबलगानि—इसमें सभी तरह के ऊनी वस्त्रों, चादरों इत्यादि का समावेश हो जाता है६० ।
c13.s7.67
६० —आचारांग, २, ५, १, ३—८
c13.s7.68
२०—पावराणि६१—चादरें । यहां ओढ़ने और विछाने दोनों तरह की चादरों से मतलब है, पर निशीथ के अनुसार६२ यहां पांवर के अर्थ नील गाय के चमड़े से बनी चादर है ।
c13.s7.69
६१ —वही
c13.s7.70
६२ —निशीथ, ७, ४६७
c13.s7.71
उपरोक्त कपड़े कीमती होते थे इसीलिए जैन छेद सूत्रों में साधुओं के लिए इन्हें वर्ज्य माना है । जैन साधु निम्नलिखित खालें ओर लोइयां (आइण्णे पावराणि) भी बेशकीमत होने से नहीं खरीद सकते थे ।
शाल और चादरें
c13.s8.1
१—उद्गा—ऊदबिलाव के चमड़े के बने रुमाल। आचारांग६३ की टीका के अनुसार उद्ग 'सिंधुविषयमत्स्याः तत्सूक्ष्मचर्मनिष्पन्नानि' अर्थात् यह वस्त्र सिंध में ऊद बिलाव के चमड़े से बनता था। निशीथ में६४ इसकी व्याख्या है 'सुसुणागिती जलचरासत्ता तेसिं अजिणा उद्दा, अण्णे भणंति उददे चम्मं गोरमिगाणं अजिणा' अर्थात् जल में रहने वाली सुंस का चमड़ा, दूसरे कहते हैं कि उद्ग किसी सफेद पशु का चमड़ा होता था। समुद्री ऊद-बिलाव का चमड़ा तो बहुत महीन और पतला होता है। हो सकता है कि प्राचीन काल में इन समुद्री ऊदों के चमड़ों से ओढ़ने बनाये जाते रहे हों।
c13.s8.2
६३ आचारांग, २, ५, १, ३—८
c13.s8.3
६४ निशीथ, ७, ४६७
c13.s8.4
२—पेस—आचारांग६५ में पेस की व्याख्या है 'पेसाणीत्ति सिंधुविषय एवं सूक्ष्म चर्माणः पशवस्तच्चर्म निष्पन्नानीति', अर्थात् सिंधु देश के एक पशु विशेष महीन चमड़े से बना हुआ। निशीथ६६ में इसके अर्थ है 'पसवांतेसिं अइण्णं, अण्णे भणंति पेसा लेसा य मच्छाइयाए', अर्थात् पशु का चमड़ा, दूसरों के अनुसार पेसा मछलियों का चमड़ा था। इन व्याख्याओं से तो यह सिद्ध होता है कि पेस किसी पशु विशेष का चमड़ा था, लेकिन वैदिक और बौद्ध साहित्य में पेस सदा कसीदे के काम के लिए आया है। यहां पर भी सुंदर कसीदे के काम से बने शाल से ही मतलब है कि जिसका ज्ञान टीकाकारों को न था।
c13.s8.5
६५ आचारांग, २, ५, १, ३—८
c13.s8.6
६६ निशीथ, ७, ४६७
c13.s8.7
३—पेसलाणि—आचारांग में६७ इसका अर्थ है 'तच्चर्म-सूक्ष्म-पक्ष्म-निष्पन्नानि; उस चर्म के महीन पश्म से बनी चादर। हो सकता है यहां पक्ष्म से कसीदे वाली पश्मीने की चादर से मतलब हो।
c13.s8.8
६७ आचारांग, २, ५, १, ३—८
c13.s8.9
४—नीलमिगाईणग—नीलगाय के चमड़े से बनी चादर६८।
c13.s8.10
६८ वही
c13.s8.11
५—गोरमिगाईणग—सफेद जानवर के चमड़े से बनी चादर६९।
c13.s8.12
६९ वही
c13.s8.13
६—कणगाणि—सुनहरे काम की चादर७०। निशीथ में७१ इसके दो अर्थ दिये गए हैं, 'वरडगपारिगादिपावरगा ते सुवण्णे, सुवण्णे दुते सुत्तं रज्जति तेन जं वूतं कणगम्' अर्थात् वट इत्यादि की छाल के रेशे से बनी चादर सुवर्ण कहलाती थी, अथवा सुवर्ण की
c13.s8.14
७० वही
c13.s8.15
७१ निशीथ, ७, ४६७
c13.s8.16
द्रुति (घोल) में रंग कर जिस सूत से कपड़ा बुना जाय उसे सुवर्ण कहते हैं। सुवर्ण की आखीरी व्याख्या बड़े काम की है क्योंकि इसमें सोने के घोल में रंग कर कलाबत्तू बनाने की क्रिया की ओर संकेत है। जहां तक हमें पता है मुगल युग में विटाई से कलाबत्तू बनता था, अर्थात् चांदी सोना मिला कर तारकश तार खींचते थे । बेटरी की सहायता से कलाबत्तू रंगने की क्रिया तो फ्रांस से इस देश में हाल ही में आयी । लेकिन इस उल्लेख से तो यह सिद्ध होता है कि सोने के घोल में कलाबत्तू रंगने की प्रक्रिया गुप्त युग में भी लोग जानते थे । सोने की द्रुति बनाने की क्रिया वैद्यक शास्त्रों में दी हुई है पर अब वह काम में नहीं आती ।
c13.s8.17
७—कणगकंतिय—आचारांग७२ की टीका में इसे 'कनकस्येव कांतियेषा' अर्थात् सोने की कान्तिवाला कहा गया है लगता है इस दुशाले पर सोने का भरावदार काम होता था।
c13.s8.18
७२ आचारांग, २, ५, १, ३–८
c13.s8.19
८—कणग पट्ट—आचारांग७३ में इसे 'कृतकनकरसपट्टानि' कहा है जिसके अर्थ होते हैं तरल सुवर्ण से बना हुआ वस्त्र । लगता है यह कपड़ा अथवा चादर पूरी सुनहरे कलाबत्तू से बिनी जाती थी । निशीथ७४ में कनक पट्ट के दो अर्थ दिये गए हैं यथा 'कणगेण जस्स पट्टाकता, अहवा कणग-पट्टा मिगा' अर्थात् जिस वस्त्र का किनारा सुनहरे काम वाला होता था अथवा कनक पट्ट मृग की खाल से बना वस्त्र ।
c13.s8.20
७३ वही
c13.s8.21
७४ निशीथ, ७, ४६७
c13.s8.22
९—कणगखइयाणि—कनक खचित प्रावार की व्याख्या आचारांग७५ में है 'कनकरसस्तवकौचितानि' जिसके ठीक ठीक अर्थ समझ में नहीं आते पर यहां जरदोजी के काम से मतलब है ।
c13.s8.23
७५ आचारांग, २, ५, १, ३–८
c13.s8.24
१०—कणगफुसियाणि७६—यहां शायद हलके सुनहले काम वाली चादर से तात्पर्य है ।
c13.s8.25
७६ वही
c13.s8.26
११—कणगयक—निशीथ७७ में इसकी व्याख्या यों है 'अंता जस्स कणगेणकता' अर्थात् वह चादर जिसके किनारों पर सुनहरा काम हो ।
c13.s8.27
७७ निशीथ, ७, ४६७
c13.s8.28
१२—कणगफुल्लिय—निशीथ७८ में इस प्रावार का निम्नलिखित अर्थ दिया गया है, 'कणगसुत्तेन फुल्लिया जस्स फुल्लिताउ दिण्णाउ तं कणग फुल्लियं जहा कद्दमण उड्डेडिज्जति' कनक सूत्र अर्थात् कलाबत्तू से जो फूले फूल काढ़े गए हों । बाद का
c13.s8.29
७८ वही
c13.s8.30
अर्थ ठीक समझ में नहीं आता लेकिन उससे कलमदारी के काम की ओर संकेत मिलता है। कर्दम के अर्थ यहाँ मसाला या मोम से है जिसका कलमदारी में काफी काम पड़ता था।
c13.s8.31
१३-१५—उट्ठाणि, वग्घाणि, विवग्घाणि—ऊंट, बाघ और चीते के चमड़ों से बनी चादरें७९।
c13.s8.32
१६—आभरणानि—पत्ती जैसे एक अलंकार से सुसज्जित—'पत्रिकादि एकाभरणेन मंडिता'। आभरण—विचित्त८१ भरी नकाशीदार चादर थी जिसकी नकाशियों में पत्तियां चन्द्रलेखा, स्वस्तिक, घंटिका और मोती आते थे।
c13.s8.33
इन वस्त्रों और चादरों के सिवाय निशीथ और दूसरे जैन ग्रंथों में निम्नलिखित वस्त्रों के उल्लेख हैं:—
c13.s8.34
१—पवंगाणि८२—निश्चय ही इससे पश्मीने का उद्देश्य है।
c13.s8.35
८२ निशीथ, ७, ४६७
c13.s8.36
२—पाणालाणि८३—आवरण के लिए कपड़े।
c13.s8.37
३—तिरीड पट्ट—तिरीट वृक्ष (सिम्पलिकोस रेसीमोसा) की छाल के रेशों से बना कपड़ा। निशीथ८४ में इसकी चौड़ी व्याख्या की गयी है—'तिरीटस्वकस्स वागो, तस्सा तंतुपट्टवरिसो सो तिरीडपट्टो तम्मि कयाणि तिरीडपट्टाणि अहवा कीडयलाला मलय विसये मलयाणि पत्ताणि कोविज्जति तसु वालेसु पत्तुण्णाणि दुगुल्ललातो अभंतरहिरे जं जं उज्जति तं अंसुवम्' अर्थात् तिरीट वृक्ष की छाल की रेशों से बना पट्ट और उससे बना तिरीट पट्ट अथवा मलय देश में मलय वृक्ष के पत्तों पर कीड़े अपनी लार इकट्ठे करते हैं इसकी ऊपरी छाल से तो पत्रोर्ण और दुकूल बनते हैं और भीतरी हीर से अंशुक। निशीथ की यह दूसरी व्याख्या दंतकथा सी मालूम पड़ती है।
c13.s8.38
४—वडग—अंतगडदसाओ८५ में राजकुमार गौतम के विवाह पर दहेज में मिले वस्त्रों में वडग के भी आठ जोड़े थे। वडग का मतलब यहां टसर से है।
c13.s8.39
८५ अंतगडदसाओ, पृ० ३२
c13.s8.40
५—रल्लक—अमरकोश में इसे एक तरह का कंबल कहा गया है८६। युवान च्वांग ने भी होलाली अर्थात् रल्लक का उल्लेख किया है८७। उसके यात्रा विवरण के अनुसार यह ऊनी कपड़ा किसी जंगली जानवर के ऊन से बनता था। यह ऊन आसानी से कत सकता था और इससे बने कपड़े का काफी मूल्य होता था।
c13.s8.41
७९-८१ वही
c13.s8.42
८३-८४ वही
c13.s8.43
८६ अमरकोश, २, ६, ११६
c13.s8.44
८७ वाटर्स, युआन च्वान च्वांग्स ट्रेवल्स इन इंडिया भा० १, पृ० १४८, लंदन, १९०४
c13.s8.45
६—शाणक—एक जगह युवान च्वांग८८ का कहना है कि भिक्षु सन (शाणक) के बने गहरे लाल कपड़े पहनते थे । शायद किसान और मजदूर भी सन से बने सस्ते कपड़े पहनते थे ।
c13.s8.46
८८ वही, भा० १, पृ० १२०
कपास के बने वस्त्र
c13.s9.1
गुप्त युग में प्रायः जितनी तरह के कपड़े बनते थे उनके उल्लेख हमें संस्कृत और प्राकृत साहित्यों से मिलता है । पर आश्चर्य की बात है कि इस युग में सूती कपड़ों के बारे में हमें अधिक जानकारी नहीं मिलती । इसका कारण यही हो सकता है कि सूती कपड़े इतने प्रचलित थे कि उनके बारे में कुछ अधिक कहना उचित नहीं समझा गया । इसमें शक नहीं कि इस युग में बनारस, बंगाल तथा दक्षिण में अच्छे से अच्छे कपड़े बनते थे । लगता है आचारांग में आये गजंभ, स्फटिक इत्यादि सूती वस्त्र थे । बृहद् कल्पसूत्र भाष्य८९ में एक जगह रुई कातने की विधि दी हुई है । पहले 'सेड्डुग' नामक रुई से बिनौले निकाल लिए जाते थे और बाद में वह धुन ली (पिञ्जितम) जाती थी । अंत में इस साफ रुई की पूलियां (पेलु) कातने के लिए बना ली जाती थीं ।
c13.s9.2
८९ बृहद्, ३, २६६६
कपड़े बनाने की प्रक्रिया
c13.s10.1
अमरकोश में कपड़े बिनने में करघे पर से लेकर माड़ी देने और कुंदी करने तक की क्रियाओं का वर्णन है । करघे पर से तुरन्त कपड़े को अनाहत (बिना कुंदी किया हुआ), निष्प्रवाणि (तुरन्त करघे से उतरा) या तंत्रक (करघे पर बुना) कहते थे९० ।
c13.s10.2
९० अ० को०, २, ६, ११२
c13.s10.3
कपड़ों के नाम—कपड़े के छोरों को दशा या बसति, लंबाई को दैर्घ्य, आयाम और आरोह और चौड़ाई को परिणाह या विशालता कहते थे९१ ।
c13.s10.4
९१ अ० को०, २, ६, ११४
c13.s10.5
कपड़ों के भिन्न भिन्न नाम और दाम—कपड़ों के छ पर्यांयवाची यथा वस्त्र, आच्छादन, वास, चेल, वसन और अंशुक थे९२ । कीमती वस्त्रों के लिए सुचेलक और पट शब्द आए हैं और मामूली कपड़ों के लिए वरासि और स्थूल शाटक९३ । यहाँ यह बात गौर करने की है कि हल्के और नकली कलाबत्तू की बनी साड़ी को आज दिन भी बनारस में रासी माल कहते हैं जो संस्कृत वरासि का का रूपांतर मात्र है । लेकिन वैदिक साहित्य में वरासि के अर्थ वरस की छाल के रेशे से बना एक घटिया कपड़ा होता है९४ ।
c13.s10.6
९२ अ० को०, २, ६, ११५
c13.s10.7
९३ अ० को०, २, ६, ११५
c13.s10.8
९४ भारतीय विद्या, १, १, पृ० ३४
c13.s10.9
चादरें—अमरकोश में ओढ़ने बिछाने की चादरोंके भी कई नाम कहे गए हैं। ओढ़ने की चादर को निचोल और प्रच्छदपट और कालीन के लिए रल्लक और कंबल शब्द आए हैं९५।
c13.s10.10
९५ अ० को०, २।६।११६
c13.s10.11
कपड़े की धुलाई—नायाधम्म९६ के अनुसार कपड़े पहले सज्जी के घोल में डाल दिये जाते थे। फिर इन्हें उबाल लिया जाता था और बाद में साफ पानी से धो लिया जाता था। आज दिन भी धोबी अक्सर कपड़े इसी तरह धोते हैं।
c13.s10.12
९६ नायधम्म, ३, ६०
c13.s10.13
कपड़े बनाने के प्रसिद्ध स्थान
c13.s10.14
मधुरा की डोरिया—युवान च्वांड् का कहना है कि उसके समय में मधुरा की डोरिया प्रसिद्ध थी९७। इस संबंध में यह ध्यान देने योग्य बात है कि अजंटा के भित्तिचित्रों में स्त्री-पुरुष दोनों धारीदार कपड़े पहनते हैं।
c13.s10.15
९७ वाटर्स, वही, भा० १, पृ० ३०१
c13.s10.16
मंदसोर के रेशमी बुनकर—कुमारगुप्त के काल के मंदसोर से मिले एक शिलालेख से पता चलता है कि लाट अर्थात् गुजरात से कुछ रेशमी कपड़े बुनने वाले मंदसोर में आ कर बस गए थे। इनमें से कुछ तो दूसरे व्यवसायों में लग गए पर बाकी ने एक अपनी अलग श्रेणी बना ली। इस श्रेणी ने स० ४३७-३८ में एक सूर्य का मन्दिर बनवाया जिसकी मरम्मत ४७३-७४ ई० में हुई और इसी अवसर पर उपरोक्त शिलालेख प्रस्तुत किया गया९८। इस लेख में कारीगरों ने अपने व्यवसाय और कारीगरी के प्रति अपना स्वाभाविक अभिमान प्रकट किया है। वे कहते हैं कि तारुण्य और कांति से युक्त होने पर भी, सुवर्णहार तांबूल और फूलों से सजे होने पर भी तब तक स्त्रियां प्रिय नहीं बनतीं जब तक वे रेशमी वस्त्र न पहनें। ये वस्त्र छूने में कोमल (स्पर्शवता) तथा वर्णान्तर विभाग से अलंकृत होते थे९९।
c13.s10.17
९८ इंडि० एंटि०, १५, पृ० १७६
c13.s10.18
९९ वही, पृ० १७७
c13.s10.19
ऊपर के वर्णन से पता चलता है कि गुप्तयुग में मंदसोर के बने रेशमी जोड़े स्त्रियों को बहुत प्रिय थे। ये वस्त्र छूने में कोमल होते थे और इनमें रंगों का अपूर्व समतुलन होता था। वर्णन से ऐसा मालूम पड़ता है कि यहां पटोले से प्रयोजन है।
c13.s10.20
आसाम के रेशमी कपड़े
c13.s10.21
आसाम की अंडी और मूंगा आज दिन भी अपनी मजबूती के लिए प्रसिद्ध हैं। गुप्त-युग में आसाम में नकाशीदार रेशमी कपड़े बनते थे। आसाम के राजा ने श्री हर्ष के पास जो उपायन भेजे१०० उनमें भोजपत्र जैसी कोमल जातीपट्टिका और कोमल चित्रपट के टुकड़े
c13.s10.22
१०० हर्षचरित, पृ० २१४, (कावेल का अनुवाद)
c13.s10.23
भी थे। कावेल ने जाती पट्टिका का अर्थ यहां धोती अथवा साड़ी किया है पर यह ठीक नहीं है। वास्तव में इसके शाब्दिक अर्थ के अनुसार इसका अर्थ होता है रेशमी वस्त्र के लंबे थान जिनमें चमेली के फूलों की नकाशी बनी हो (जाती = चमेली, पट्टिका = पट्टियां)। भोजपत्र से इसकी तुलना से पता लगता है की जातीपट्ट किसी तरह का मूंगा था क्योंकि आज दिन भी इसका रंग भोजपत्र जैसा ही होता है। चित्रपट में लगता है भरी नकाशी होती थी।
बंगाल के धोती दुपट्टे
c13.s11.1
गुप्तयुग में भी बंगाल अपने कपड़ों के लिए प्रसिद्ध था। हर्षचरित में पौंड्र (उत्तरी बंगाल) के बने धोती दुपट्टे की तारीफ की गयी है।
गुजरात की बांधणी
c13.s12.1
गुजरात और राजपूताने की बांधणी या चुनरी आज दिन भी प्रसिद्ध है १०१। हर्षचरित में १०२ इसे पुलकबंध कहा गया है और इससे कभी कभी स्त्रियों के कंचुक बनते थे।
c13.s12.2
१०१ वही, पृ० ७२
c13.s12.3
१०२ वही, पृ० २६१
व्यवहारसूत्र में कपड़े बनने के प्रसिद्ध स्थल
c13.s13.1
व्यवहारसूत्र भाष्य में १०३ एक जगह उन जगहों की सूची दी हुई है जहां कपड़े बनते थे। समुद्र पार (पारावतर्दि) विदेशों से भी लगता है कपड़े आते थे। टीकाकार के अनुसार यहां आदि से पौंड्र का मतलब है। व्यवहारसूत्र के भाष्य में जो शायद गुप्तयुग में लिखा गया था कोटंब, ताम्रलिप्ति और सिंधु कपड़े बनाने के बड़े केन्द्र थे। टीकाकार ने कोटंब की व्याख्या गौड़ देश के अर्थात् बंगाली कपड़े से की है पर शायद यह ठीक नहीं है। जैसा बौद्ध साहित्य से पता चलता है कोटुंबर १०४ औदुंबर देश (पठान कोट) में बनता था। ऐसा पता चलता है कि ग्यारहवीं सदी में जब व्यवहार भाष्य की टीका लिखी गयी कोटुंबर की याद इतनी हलकी पड़ गयी थी कि टीकाकार ने उसे पंजाब से उठा कर बंगाल में रख दिया। ताम्रलिप्ति अर्थात् कलकत्ते के पास आधुनिक तामलुक भी उस युग में कपड़े बनाने का प्रसिद्ध केन्द्र था। सिंधु प्रदेश भी कपड़ों के लिए प्रसिद्ध था।
First 200 of 504 passages. Read on
Linked texts (20)
- Nāyādhammakahāo — Sudharman, Ardhamāgadhī Prakrit
- Ṛtusaṃhāra — Kālidāsa, Sanskrit
- Aṣṭādhyāyī — Pāṇini, Sanskrit
- Āyāraṃga — Sudharman, Ardhamāgadhī Prakrit
- Mahābhārata — Vyāsa, Sanskrit
- Raghuvaṃśa — Kālidāsa, Sanskrit
- Nisīha — Viśākhagaṇi, Ardhamāgadhī Prakrit
- Aṇuogaddārāiṃ — Āryarakṣita, Ardhamāgadhī Prakrit
- Harṣacarita — Bāṇabhaṭṭa, Sanskrit
- Tibetan translation ('Chi med mdzod) — Classical Tibetan
- Kādambarī — Bāṇabhaṭṭa, Sanskrit
- Aṃtagaḍadasāo — Sudharman, Ardhamāgadhī Prakrit
- Sārnāth
- Nāgārjunakoṇḍa
- Bhitari
- Mirpur Khas
- Basarh
- Bhita
- Ajanta
- Mudyanur plates of Saka 261 of the Bana king Malladeva-Nandivarman (ed. Rice 1886) — Sanskrit