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Pracin Bharatiya Veshabhusha c13.15

Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c13.15

Language
Hindi

c13.15

गुप्तयुग में भारतीय वेश-भूषा के अध्ययन के लिए मूर्तियों और अजंता की १७ नं० की लेण के भित्तिचित्रों के सिवाय बहुत से सिक्के भी हैं जिन पर गुप्त-राजाओं की प्रतिकृतियां अंकित हैं। इनकी वेश-भूषा से इस मार्के की बात का पता चलता है कि गुप्त राजे कुषाण राजाओं की तरह कंचुक, कोट और पायजामे पहनते थे तथा शुद्ध भारतीय पहरावा भी। इस सिले वस्त्रों के उपयोग से पता चलता है कि गुप्तों ने देशी और विदेशी दोनों पहरावे उसी तरह ग्रहण कर लिये थे जैसे आज दिन पश्चिमी शिक्षा पाये हुए नवयुवक सहूलियत के लिए आफिस जाने में अथवा सामाजिक उत्सवों में शामिल होने पर पश्चिमी पहरावा पहन लेते हैं लेकिन घर पर अपना जातीय पहरावा ही पहनते हैं। यह बात भारतीयों के लिए ही नहीं प्रत्युत यूरोपीय ढंग से रहने वाले प्रत्येक एशियावासी के लिए लागू है। सिले हुए कपड़ों में पहनने की सहूलियत और आकर्षक ढंग गुप्तों की रसात्मक पर कार्यात्मक वृत्ति को अवश्य रुची होगी। हमें गुप्तों की विवेचनात्मक बुद्धि का पता पहरावे में किए गए हेर-फेर से लगता है। उन्होंने कुषाणयुग के मोटे, ऊनी अथवा रुई भरे सूती कपड़ों की जगह पतले और पारदर्शी कपड़ों का व्यवहार शुरू किया जो जलवायु के दृष्टिकोण से इस देश के लिए सर्वथा उपयुक्त थे। कुषाण वस्त्रों के भारीपन और भद्दी काटों की जगह हम गुप्त-वेश-भूषा में तैयारी ओर सफाई देखते हैं जिनसे पहनने वालों की कलात्मक सुरुचि का पता लगता है। गुप्तयुग में सिले हुए विदेशी कपड़ों से धीरे धीरे उनका विदेशीपन निकाल कर उन्हें भारतीय ढांचे में ढाल दिया गया। उदाहरणार्थ मूर्तियों और सिक्कों में कुषाण राजे पूरे पैर का भारी बूट पहने दिखाये गए हैं। ये बूट देखने में तो अवश्य ही भद्दे मालूम पड़ते हैं पर मध्य एशिया के कठोर शीत में पैरों की रक्षा करते हैं और घुड़सवारी में तो इनकी बड़ी उपयोगिता सिद्ध होती है। लेकिन गुप्तयुग में इन बूटों का भद्दा और भारीपन निकल जाता है और उनकी शक्ल आधुनिक घुड़सवारी के बूट जैसी बन जाती है।