Pracin Bharatiya Veshabhusha c13.s2.9
Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c13.s2.9
- Language
- Hindi
c13.s2.9
की काट उनके देश के कपड़ों जैसी ही होती थी (सदेस नेवत्थ गहिय वेसाहि) । ये दासियां इस देश की भाषा नहीं समझ सकती थीं और वे केवल इशारों से दूसरों के विचारों और आज्ञाओं को समझ सकती थीं (इंगिय चितिय पत्थिय वियनियाहि) । विदेशी दासियों के उपरोक्त वर्णन से यह पता चलता है कि ईसा की आरंभिक शताब्दियों में भारतीय अंतःपुरों में उनका प्रवेश हो चुका था । गुप्तयुग में भी अंतःपुर में विदेशी दासियों के रखने की काफी प्रथा थी। कालिदास के नाटकों में, राजा की अंगरक्षिकाओं की तरह यवनियों का काफी उल्लेख आया है। इस युग में यवन शब्द का आरंभिक अर्थ जिसके अनुसार वह यूनानियों का द्योतक था लुप्त हो चुका था और यह शब्द शायद अधिकतर विदेशियों के लिए लागू होने लगा था।