Pracin Bharatiya Veshabhusha c13.s30.2
Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c13.s30.2
- Language
- Hindi
c13.s30.2
ऊनी कपड़ों का जिक्र करते हुए भाष्य भेड़ के ऊन से बने कपड़े को और्णिक, ऊंट के बाल से बने कपड़े को औष्ट्रिक और हिरन के रोएं से बने कपड़े को मृग रोम कहता है। कुतप को जीर्ण कहा गया है । किट्ट ऊन अथवा बाल से बनता था । किट्ट ऊन और बाल के उस बचे अंश को कहते थे जो अच्छे कपड़े बनाने के बाद बच जाता था१४५ । बृहत् कल्पसूत्र भाष्य१४६ की एक पाद टिप्पणी में संपादक ने उपरोक्त ऊनी कपड़ों के सम्बन्ध में दो चूर्णिकयों की राय दी है । एक चूर्णि के अनुसार मृग लोम की व्याख्या सलोममूसकलोमंवा की गयी है सलोम का अर्थ यहां समूर हो सकता है । मूसक लोम का अर्थ साधारणतः मूसे के बाल हैं । पर यहां मूसक से ठंडे प्रदेशों में रहने वाले उन बिलवासी पशुओं से जिनके समूर कपड़े बनाने के काम में आते थे प्रयोजन है। विशेष चूर्णि में मृगलोम की व्याख्या पब्बए यानं रोम याने बकरे का बटा हुआ रोआं हैं । कुतप भी बकरे के रोएं के किसी भाग से बनता था । इसका शायद यह तात्पर्य है कि कुतप तो बकरे के लंबे बाल से बनता था और पश्मीना पेट के नीचे के बालों से । किट्टिम चूर्णि के अनुसार बकरे के रोएं से बनता था । भांगिक यानी भंगेला, शाण यानी सण्टी और तिरीट की छाल के रेशे के कपड़े भी जैन साधु पहन सकते थे ।