Pracin Bharatiya Veshabhusha c13.s30: जैन साधुओं के विहित वस्त्र
Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c13.s30
- Language
- Hindi
जैन साधुओं के विहित वस्त्र
c13.s30.1
बहुत प्राचीन प्रथा१४४ के अनुसार इस युग में भी जैन साधुओं को जंगिम, भंगिम, शाणक, और पोत्तक कपड़े पहनने की अनुमति थी। जंगिम ऊंट के बाल से बना कपड़ा था।
c13.s30.2
ऊनी कपड़ों का जिक्र करते हुए भाष्य भेड़ के ऊन से बने कपड़े को और्णिक, ऊंट के बाल से बने कपड़े को औष्ट्रिक और हिरन के रोएं से बने कपड़े को मृग रोम कहता है। कुतप को जीर्ण कहा गया है । किट्ट ऊन अथवा बाल से बनता था । किट्ट ऊन और बाल के उस बचे अंश को कहते थे जो अच्छे कपड़े बनाने के बाद बच जाता था१४५ । बृहत् कल्पसूत्र भाष्य१४६ की एक पाद टिप्पणी में संपादक ने उपरोक्त ऊनी कपड़ों के सम्बन्ध में दो चूर्णिकयों की राय दी है । एक चूर्णि के अनुसार मृग लोम की व्याख्या सलोममूसकलोमंवा की गयी है सलोम का अर्थ यहां समूर हो सकता है । मूसक लोम का अर्थ साधारणतः मूसे के बाल हैं । पर यहां मूसक से ठंडे प्रदेशों में रहने वाले उन बिलवासी पशुओं से जिनके समूर कपड़े बनाने के काम में आते थे प्रयोजन है। विशेष चूर्णि में मृगलोम की व्याख्या पब्बए यानं रोम याने बकरे का बटा हुआ रोआं हैं । कुतप भी बकरे के रोएं के किसी भाग से बनता था । इसका शायद यह तात्पर्य है कि कुतप तो बकरे के लंबे बाल से बनता था और पश्मीना पेट के नीचे के बालों से । किट्टिम चूर्णि के अनुसार बकरे के रोएं से बनता था । भांगिक यानी भंगेला, शाण यानी सण्टी और तिरीट की छाल के रेशे के कपड़े भी जैन साधु पहन सकते थे ।
c13.s30.3
१४५ वही, ४, ३६६१
c13.s30.4
१४६ वही, ४, पृ० १०१८, पा० टि० २
c13.s30.5
जैन साधु ठीक नाप वाले (प्रमाणवत्), सम तल (समं), मजबूत (स्थिर) और सुंदर (रुचिकारक)१४७ वस्त्र पहरते थे ।
c13.s30.6
१४७ वही, ३, २८३५
c13.s30.7
जैन साधुओं को शरीर स्पर्शी ऊनी कपड़े की इसलिए मनाही थी कि उनमें जू पैदा हो जाती थी और गर्द भी इकट्ठा हो जाती थी । लेकिन वे ऐसी ऊनी चादरें जिनके गंदे होने का भय नहीं था और जो शरीर को ठंडक से बचाती थीं पहन सकते थे१४८ । सूती धोती न मिलने पर जैन साधु तिरीट पट्ट और रेशम (कौशिकार) की बनी धोतियां पहन सकते थे । ऊनी चादर न मिलने पर छाल्टी की चादर ओढ़ने का आदेश है । उसके भी न मिलने पर रेशमी चादर और उसके भी न मिलने पर तिरीट पट्ट की चादर ओढ़ी जा सकती थी१४९ ।
c13.s30.8
१४८ वही, ४, ३६६७
c13.s30.9
उपरोक्त पांच तरह के विहित वस्त्रों में से जैन साधु एक साथ केवल दो तरह के वस्त्र ग्रहण कर सकते थे जैसे सूती और ऊनी एक साथ, अथवा तिरीट पट्ट और छाल्टी एक साथ१५० । ऐसा न करने वाला दोष का भागी होता था ।
c13.s30.10
१५० वही, ४, ३६७०
c13.s30.11
बृहत् कल्पसूत्र भाष्य में कपड़े की कटाई संबंधी अनेक शब्द आये हैं । बिना काट जोड़ वाले अनसिले कपड़े प्राकृतिक (यथाकृतं) कहलाते थे। जिस वस्त्र के केवल किनारे (दशिका) कटे होते थे अथवा जो वस्त्र दो कपड़े जोड़ कर बनाया जाता था अथवा जो वस्त्र सिला होता था (तुन्नं) उसे अल्पपरिकर्म यानी कम काम किया हुआ वस्त्र कहते थे। वस्त्र में अनेक काट और जोड़ अथवा उसके शरीर के नाप से बनने पर और उसमें काफी सिलाई होने पर उसे बहु परिकर्म अर्थात् बहुत काम वाला कपड़ा कहते थे१५१।
c13.s30.12
१५१ वही, ४, ३६७१
c13.s30.13
उपरोक्त सब तरह के कपड़े नागरिक पहन सकते थे लेकिन जैन साधुओं को केवल यथाकृत वस्त्र ही विहित था, उसके न मिलने पर कुछ प्रायश्चित करने के बाद वे अल्प परिकर्म और बहु परिकर्म वस्त्र भी पहन सकते थे। लेकिन बीमारी अथवा यात्रा इस साधारण नियम के अपवाद थे१५२।
c13.s30.14
१५२ वही, ४, ३६७२
c13.s30.15
नागरिकों के वे वस्त्र जिन्हें पहनने का जैन साधुओं को अधिकार न था:—
c13.s30.16
नागरिकों द्वारा व्यवहार में लाये जाने वाले पूरे कृत्स्न कपड़े जैन साधु व्यवहार में नहीं ला सकते थे१५३। ये कृत्स्नवस्त्र, नाम, स्थापना, श्रेणी, द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव के अनुसार छ श्रेणियों में बंटे थे१५४।
c13.s30.17
१५३ वही, ४ पृ० १०६७
c13.s30.18
१५४ वही, ४, २८८०
c13.s30.19
द्रव्य वस्त्र दो विभाग में बंटे थे यथा सकल और प्रमाण। सकल वस्त्र गजिभन बिना हुआ (घनं तन्तुभिः सान्द्रं), चिकना (मसृणं), बिना छीर का (निरुपहत, अञ्जनखंजनादि दोषरहितं) और किनारदार होता था। गुण के अनुसार पुनः सकल वस्त्र जघन्य उत्तम और उत्कृष्ट श्रेणियों में बंट जाता था। भाष्य की टीका के अनुसार जघन्य वस्त्र मुंह पोछने का रुमाल इत्यादि (मुखपोतिकादि), उत्तम वस्त्र सुगंध लिप्त (पटलकादि) और उत्कृष्ट वस्त्र माड़ी किया हुआ (कल्पमादि, हिंदी कलफ) होता था। प्रमाण कृत्स्न वस्त्र की लंबाई चौड़ाई (विस्तारायाम) साधुओं के वस्त्रों से अधिक होती थी१५५।
c13.s30.20
१५५ वो, ४, ३८८१-८३
c13.s30.21
क्षेत्र कृत्स्न उन कपड़ों को कहते थे जो या तो देश के एक खास भाग में मिलते ही नहीं थे और अगर मिलते भी थे तो उनका दाम बहुत अधिक होता था। टीकाकार उदाहरण के लिए कहता है कि पूर्वी भारत के कपड़े लाट में बहुत महंगे पड़ते थे१५६।
c13.s30.22
१५६ वही, ४, ३८८४
c13.s30.23
काल कृत्स्न वस्त्र साल के कुछ महीनों में बहुत महंगे पड़ते थे और बहुत मुश्किल से मिलते थे। टीकाकार कहता है, जैसे गरमी में रक्त वस्त्र, जाड़े में चादरें (शिशिर प्रावरकादि) और वर्षा में केसरिया वस्त्र (वर्षासु कुंकुमखचितादि)१५७।
c13.s30.24
१५७ वही ४, ३८८५
c13.s30.25
भाव कुत्सन कपड़ों के दो भेद होते थे 'वर्णयुत' रंग के अनुसार और 'मूल्ययुत' मूल्य के अनुसार१५८। जघन्य, उत्तम और निकृष्ट श्रेणी के कपड़ों के अलग अलग मूल्य होते थे । जघन्य श्रेणी के कपड़े का दाम अट्ठारह कार्षापण होता था और उत्तम श्रेणी के कपड़े का मूल्य एक लाख । उत्तम श्रेणी के कपड़ों के दाम अट्ठारह और एक लाख कार्षापण के बीच में होते थे१५९। कीमती कपड़े पहनने वाले साधुओं के प्रायश्चित्त के संबंध में कपड़ों के दाम, १८, २०, ४९, ५००, ९९९, १००००, ५०००० और १००००० कार्षापण दिया है१६०। उक्त दामों से यह पता नहीं चलता कि यह दाम एक गज के लिए अथवा पूरे थान के लिए होता था । शायद यह पूरे थान का दाम था । यह भी पता नहीं चलता कि यहां तांबे के कार्षापण से मतलब है अथवा चांदी के । जो भी हो यह तो निश्चित है कि इस देश में गुप्त काल में काफी कीमत के कपड़े बनते थे ।
c13.s30.26
१५८ —वही, ३८८७
c13.s30.27
१५९ —वही, ४, ३८६०
c13.s30.28
१६० —वही, ४, ३८६३