Pracin Bharatiya Veshabhusha c13.s31: विदेशों में उनकी प्रथा के अनुसार वस्त्र पहिनने की साधुओं को आजज्ञा
Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c13.s31
- Language
- Hindi
विदेशों में उनकी प्रथा के अनुसार वस्त्र पहिनने की साधुओं को आजज्ञा
c13.s31.1
जैन साधुओं द्वारा कीमती वस्त्र पहिनने पर प्रायश्चित्त का विधान था । कपड़े पहिनने में यह रोक टोक समझदारी की द्योतक थी, क्योंकि कीमती वस्त्र पहिन कर विहार यात्रा में जाने पर साधु को चोरों का डर था१६१। यही नहीं, कीमती कपड़े पहने हुए साधुओं को अक्सर चुंगी वाले भी गिरफ्तार कर लेते थे और इस संदेह पर कि कपड़े चोरी के होंगे, उन्हें दंड देते थे१६२। इस संबंध में एक जैन आचार्य की कथा दी है। एक समय किसी ने एक आचार्य को एक कीमती शाल (कंबल रत्न) भेंट में दिया । शाल ओढ़े आचार्य को किसी चोर ने रास्ते में देख लिया । आवास में पहुंच कर आचार्य ने शाल के दो टुकड़े कर डाले । रात में चोर आया और छुरी दिखला कर आचार्य से कम्बल मांगा । उन्होंने शाल के टुकड़े कर देने की बात कही पर चोर ने न माना, इस पर आचार्य ने उसे शाल के टुकड़े दिखला दिए । चोर क्रोधित हुआ पर टुकड़ों को जोड़ कर वह जैसे तैसे शाल को ले कर चम्पत हो गया१६३।
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१६१ —वही' ४, ३६६१, ३६००
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१६२ —वही, ४, ३६०१
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१६३ —वही, ४, ३६०३-४
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स्थूण देश में जैन साधुओं को कपड़े के बारे में कुछ स्वतंत्रता थी । इस देश में न तो चोरों का भय था न अच्छे कपड़े पहनने से किसी को कोई आश्चर्य ही होता था । ऐसी अवस्था में जैन साधुओं को कीमती कपड़ी के किनारे हटा कर पहिनने की आज्ञा
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थी१६४। पर कुछ अवस्थाओं में इन वस्त्रों के किनारे (दशिका) रखे जा सकते थे। कुछ कमजोर किनारों वाले वस्त्रों में छोरों पर इसलिए किनारे जोड़ दिये जाते थे कि वे अधिक टिकाऊ बन सकें। ऐसे वस्त्रों में साधु किनारे रख सकते थे। कुछ देशों में वस्त्रों के किनारे पतले होते थे इनको भी ज्यों की त्यों रखने की आज्ञा थी१६५। इस संबंध में टीकाकार सिंधु का दृष्टांत देता है।
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१६४ वही, ४, ३६०५
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१६५ वही, ४, ३६०६
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उकवत से पीड़ित जैन साधुओं को विहित नाप वाले वस्त्रों से बढ़ घट कर नाप वाले वस्त्रों को भी पहनने की आज्ञा थी१६६। वैद्य को दक्षिणा देने के लिए भी साधु किनारे वाले वस्त्र रख सकते थे।
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१६६ वही, ४, ३६०७
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नेपाल, ताम्रलिप्ति और सिंधु-सौवीर (सिंध सागर दोआब और सिंध) बहुत कीमती कपड़े बनाने के प्रसिद्ध केन्द्र थे। इन देशों में साधुओं सहित सब लोग कुत्स्न वस्त्र पहनते थे१६७। नेपाल इत्यादि देशों में न तो चोरों का डर था और न कीमती कपड़े पहनने में कोई विशेष मान था। सिंधु-सौवीर में गंदे और भद्दे कपड़े पहनना बुरा माना जाता था। इस अवस्था में जैन साधु भी कीमती कपड़े पहन सकते थे१६८
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१६७ वही, ४, ३६१२
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१६८ वही, ४, ३६१३
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कुछ देशों में (टीकाकार महाराष्ट्र का नाम देता है) नील कंबल की काफी कीमत होती थी। लेकिन जैन साधुओं को इसे सरदी में इसलिए ओढ़ना पड़ता था क्योंकि और कोई दूसरा वस्त्र इतनी गरमी नहीं देता था१६९।
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१६९ वही, ४, ३६१४
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ऐसा लगता है कि जैन संघ खास कर अपने मध्य कालीन इतिहास म साधु व्रत धारण करने वाले राजकुमारों इत्यादि के आराम का ध्यान रखता था। उन्हें तब तक कोमल वस्त्र पहनने की आज्ञा थी जब तक वे साधुओं के खुरदरे वस्त्र पहनने के आदी न हो जायं१७०।
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१७० वही, ४, ३६१४