Pracin Bharatiya Veshabhusha c13.s34: जैन साध्वियों की वेश भूषा
Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c13.s34
- Language
- Hindi
जैन साध्वियों की वेश भूषा
c13.s34.1
जैन साध्वियों की वेश-भूषा लंबी चौड़ी होतीथी । उनके पहरावे में इस बात का प्रयत्न रक्खा जाता था कि उससे उनका शरीर पूरी तरह से ढक जाय । बृहत् कल्पसूत्र भाष्य में उनके पहरावे के ग्यारह वस्त्र गिनाये गए हैं-यथा अवग्रह, पट्ट, अर्धोरुक, चलनिका । अभ्यंतरनिवसनी, बहिर्निवसनी, कंचुक, ओपकक्षिकी, वैकक्षिकी, संघाटी और स्कंधकारिणी१७५ ।
c13.s34.2
१७५ वही, ४, ४०८२-८३
c13.s34.3
(१) अवग्रह—शरीर के गुप्त भाग को ढाकने के लिए वस्त्र । यह बीच में चौड़ा और बगल में संकरा एक गजिभन बिना हुआ मुलायम कपड़ा होता था१७६ ।
c13.s34.4
१७६ वही, ४, ४०८४
c13.s34.5
(२) पट्ट—यह वस्त्र बंदों से कमरके बगल में बंधारहता था । इसकी चौड़ाई चार अंगुल होती थी और लंबाई साध्वी के कमर की नाप के अनुसार। यह वस्त्र अवग्रह के छोरों को ढकता था और इसका रूप जांघिया (मल्लककाबद्ध) सा होता था । यह मध्यकालीन नीवीबंध का ही एक प्राचीन रूप था१७७ ।
c13.s34.6
१७७ वही, ४, ४०८५
c13.s34.7
(३) अर्धोरुक—अवग्रह और पट्ट के ऊपर का यह वस्त्र पूरी कमर ढाकता था । इसका रूप तहमद (मल्लचलनाकृतिः) की तरह होता था, केवल फरक इतना था कि इसका चौड़ा सिरा दोनों जांघों के बीच कस कर बांध दिया जाता था (ऊरुद्वये च कसावबद्धः )१७८ ।
c13.s34.8
१७८ वही
c13.s34.9
(४) चलनिका—यह अर्धोरुक जैसा ही वस्त्र था केवल फरक इतना ही था कि यह आधी जांघों तक पहुंचता था । यह बेसिला वस्त्र होता था और इसके आकार की तुलना बांस पर नाचने वाले नट (लांखिक) की कछार्येदार धोती से की जा सकती थी१७९ ।
c13.s34.10
१७९ वही
c13.s34.11
(५) अंतर्निवसनी—कमर से ले कर यह वस्त्र आधी जांघों तक पहुंचता था । यह कपड़े पहनने के समय नंगा दीखने से बचने के लिए पहना जाता था१८० ।
c13.s34.12
१८० वही
c13.s34.13
(६) बहिर्निवसनी—कमर से ले कर यह वस्त्र एंड़ी तक पहुंचता था । यह कमर से डोरी से बंधा रहता था१८१ । यहां शायद साड़ी से अभिप्राय हैं । (७) कंचुक—साध्वियों का कंचुक साढ़े तीन हाथ लंबा और एक हाथ चौड़ा बेसिला वस्त्र जो कमर के दोनों ओर बांध लिया जाता था। इससे कठोर स्तन भी जिनका उभार कसे वस्त्रों के पहनने से हो उठता था ढक जाते थे[^१८२। यहां गृहस्थ स्त्रियों की तरह साध्वियों के लिए कंचुक न पहन सकने के कारण बेसिले कंचुक का विधान है।
c13.s34.14
१८१ वही
c13.s34.15
१८२ वही, ४, ४०८८
c13.s34.16
(८) ओपकक्षिकी—यह कंचुक के ही समान डेढ़ हाथ मुरब्बे का एक चौखूंटा वस्त्र था। यह छाती का एक भाग ढकते हुए दाहिने कंधे पर बांध दिया जाता था[^१८३।
c13.s34.17
१८३ वही,
c13.s34.18
(९) वैकक्षिकी—यह वस्त्र ओपकक्षकी के प्रतिकूल बायीं ओर पहना जाता था। यह पट्ट, कंचुक और ओपकक्षी को ढक लेता था[^१८४।
c13.s34.19
१८४ वही, ४, ४०८६
c13.s34.20
(१०) संघाटी—संघाटियां चार होती थीं। एक दो हाथ चौड़ी, दो तीन हाथ और एक चार हाथ। लंबाई में ये चारों संघटियां साढ़े तीन हाथ से चार हाथ तक होती थीं। दो हाथ चौड़ी एक संघाटी साध्वियां आवसथ में पहनती थीं तीन हाथ चौड़ी दो संघटियों में से एक तो साध्वियां भिक्षा मांगने के अवसर पर पहनती थीं और दूसरी शौच जाने के समय । चार हाथ चौड़ी संघाटी धर्मोपदेश सुनते समय इसलिए पहनी जाती थी कि साध्वियों के सीधे खड़े होने पर उनका पूरा अंग ढक जाय[^१८५।
c13.s34.21
१८५ वही, ४, ४०८६-१०
c13.s34.22
(११) स्कंधकरणी—यह एक चार हाथ मुरब्बे का चौखूंटा कपड़ा होता था जो चार तह कर के कंधे पर तेज हवा से बचने के लिए रक्खा जाता था। इस वस्त्र का उपयोग ओपकक्षिकी और वैकक्षिकी से बांध कर सुंदर स्त्रियों साध्वियों को बौनी दिखलाने के लिए किया जाता था[^१८६। इसका मतलब यह था कि प्रसाधन के लिए साध्वियां वस्त्र न पहनें।
c13.s34.23
१८६ वही, ४, ४०६१
c13.s34.24
साड़ी—साड़ी पहनते समय साध्वियां उसका एक हिस्सा चुन कर आगे या पीछे जैसा गृहस्थ स्त्रियां करती थीं, नहीं खोंस सकती थीं। साड़ी की चूनन को उक्ख कहते थे। निशीथ में उसकी व्याख्या है, अधो वस्त्र के बीच का चुना हिस्सा नाभि के पास गोल उभार में दिखाना[^१८७।
c13.s34.25
१८७ वही, २, पृ० १०६७
c13.s34.26
कमरबंद—साधारण स्त्रियों की तरह साध्वियां कमरबंद (पर्यस्तक) नहीं पहन सकती थीं। बीमारी में वे ऐसा कर सकती थीं पर शर्त यह थी कि कमरबंद जालदार (अजालिक) न हो[^१८८। इससे यह पता चलता है कि इस युग की स्त्रियां जालीदार कमर-बंद पसंद करती थीं।
c13.s34.27
१८८ वही, ५, ५६६६
c13.s34.28
साध्वियों के वस्त्रों की तालिका से यह स्पष्ट है कि उसमें से सब नहीं तो अधिकतर वस्त्र गुप्त युग की स्त्रियां पहनती थीं । अजंटा और बाग के भित्ति चित्रों में अर्धोरुक, चलनिका, बहिनिवसनी, संघाटी और स्कंधकरणी जैसे वस्त्र आये हैं और इन सब का व्यवहार साधारण स्त्रियां करती दिखायी गयी हैं। ऐसा लगता है कि गुप्त युग में जैन साध्वियों का पहरावा साधारण स्त्रियों के पहरावे को ले कर बना । केवल उसमें कुछ और वस्त्र शरीर के नंगापन को, जो उस युग के पहिरावे में लज्जाजनक न मान कर प्रसाधन और सौंदर्य प्रकाशन का एक अंग माना था, दूर करने के लिए जोड़ दिये गये ।
Cites (1)
- Nisīha — Viśākhagaṇi, Ardhamāgadhī Prakrit