Pracin Bharatiya Veshabhusha c13.s35.1
Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c13.s35.1
- Language
- Hindi
c13.s35.1
यह आश्चर्य की बात है कि आराम पसंद गुप्त कालीन समाज जिसमें सुसंस्कृत यौनाकर्षण को कला मानते थे नर्तक और नर्तकियां अपने शरीर को पूरी तरह ढक लेते थे । अजंटा के भित्ति चित्रों में आये नर्तकों ने लगता कंचुक और पाजामे पहनते हैं । बृहत् कल्पसूत्र भाष्य१८६ में कहा गया है कि अच्छी तरह से कपड़े पहने हुए नर्तकी को नृत्य में अपने पैर ऊपर उठाते हुए लज्जा का बोध नहीं होता । रंग मंच पर सैकड़ों तरह के खेल दिखलाती हुई नटी (लंखिका) को इसलिए लज्जा का बोध नहीं होता था कि वह पूरे कपड़े पहने होती थी । रायपसेणिय१८७ में नर्तक और नर्तकियों की वेश भूषा का पूरा वर्णन बच गया है। इस वेश भूषा का वर्णन हमें उस समय मिलता है जब सूर्याभदेव की आज्ञानुसार नर्तक और नर्तकियों ने भगवान महावीर के सामने बत्तीस तरह के नाच रंग मंच पर दिखलाये । इन युवा और सुन्दर नर्तकों ने दोनों ओर लटकते हुए उत्तरीय , कसे हुए नकाशीदार कपड़ों से बने कमरबंद (उप्पोलिय-चित्त-पट्ट-परियर), दुपट्टे१६१ और रंग बिरंगे वस्त्र (चित्त-चित्त-चिल्लगनियसणाम्) पहन रक्खे थे । वे एकावलियों और दूसरे आभूषणों से भी सुसज्जित थे उनके मस्तकों पर तिलक थे और जूडों में चेंखरक (तिलयआमेलगां) , उनके गले में तोकें थीं और उन्होंने कंचुक पहन रक्खे थे (पित्ठगेवज्जकंचुकीणं)१६२।