Pramāṇa · Search · About · API

Pracin Bharatiya Veshabhusha c14.s28.2

Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c14.s28.2

Language
Hindi

c14.s28.2

हम इस पुस्तक के आरंभिक अध्यायों में इस बात पर जोर देते आये हैं कि वैदिक युग में भी सिले वस्त्रों का व्यवहार होता था, पर इस देश की गरम आबहवा के अनुकूल साधा-रणतः लोग धोती, दुपट्टे और साड़ी जैसे सादे वस्त्र पहनते थे । हम यह भी कह आये हैं कि किस तरह ईसा पूर्व तीसरी सदी से ले कर चौथी सदी तक सिले कपड़े विशेषकर नौकर, चाकर, सिपाही, शिकारी और विदेशी इत्यादि ही पहनते थे । ऐसा लगता है कि ईसा की पहली शताब्दी में कुषाण राज्य की स्थापना के बाद मध्य एशिया के सिले वस्त्रों का प्रभाव इस देश में विशेष तरह से पड़ा और 'यथा राजा तथा प्रजा' की रीति के अनुसार लोग विदेशी वस्त्रों को भी अपनी वेश-भूषा में स्थान देने लगे । हमारे इस मत का पोषण गुप्त सिक्कों पर आयी राजाओं की वेश-भूषा से होता है । लेकिन अजंटा के भित्ति-चित्रों से पता लगता है कि दक्षिण भारत में सिले कपड़े नौकर, चाकर, सिपाही और दासियों इत्यादि तक ही सीमित रहे । अजंटा के भित्ति-चित्रों में कुछ विदेशियों की वेश-भूषा भी आई हैं, जिसका हम यहां प्रसंगवश वर्णन कर देना आवश्यक समझते हैं।