Pracin Bharatiya Veshabhusha c14.s5.5
Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c14.s5.5
- Language
- Hindi
c14.s5.5
गुप्त-युग की वेश-भूषा के जिन अंगों पर साहित्य से कम प्रकाश पड़ता है, उनका पुरातत्व से समाधान हो जाता है । इस युग की मूर्ति-कला अमरावती के अर्ध चित्रों की तरह हमें तात्कालिक सामाजिक जीवन के चित्र नहीं देती और इसका कारण इस युग की कला के उद्देश्य में परिवर्तन है, जिसमें अनुप्राणित हो कर वह अध्यात्मचिंतन की ओर उन्मुख हो जाती है । इससे उसमें वर्णनात्मकता की तो कमी हो जाती है, पर रसभावना कहीं अधिक बढ़ जाती है । पर भाग्यवश यह चिंतनशीलता मूर्तियों तक ही सीमित रही। इस युग के भारतीय चित्रकार तो अपने पुरानों की तरह चित्रों को तत्कालीन समाज और संस्कृति के प्रतिबिंब मानते रहे। अजंटा के भित्ति-चित्र गुप्त-युग के वस्त्रों के लिए कोश के समान हैं । नक्कांशियां इन वस्त्रों पर कम मिलती हैं । चित्रों में सादे और सिले वस्त्र दोनों आते हैं ।