Pracin Bharatiya Veshabhusha c4.139
Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c4.139
- Language
- Hindi
c4.139
जैन छेदसूत्रों में कटाई और सिलाई के अनेक शब्द आये हैं । यथाकृत सादे कपड़े होते थे। कटे किनारे अथवा थोड़े काम वाले कपड़े को अल्पपरिकर्म और काफी काट वाले शरीर के नाप के बने कपड़े को बहुपरिकर्म कहते थे । उपरोक्त तीन तरह के वस्त्रों में जैन साधु केवल यथाकृत वस्त्र पहन सकते थे, लेकिन यात्रा और बीमारी के समय इस नियम का उल्लंघन क्षम्य था । जैन साधु साधारण नागरिकों की भांति कृत्स्न वस्त्र ग्रहण नहीं कर सकते थे । कृत्स्न वस्त्र छः श्रेणियों से अर्थात् नाम, स्थापना, द्रव्य, क्षेत्र काल और भाव के अनुसार बंटे थे । द्रव्यकृत्स्न वस्त्र के दो विभाग थे सकल और प्रमाण । सकल के अन्दर मस्स्रिन, चिकने, बिना छोर और किनारे वाले कपड़े होते थे । प्रमाणकृत्स्न वस्त्रों की नाप साधुओं के वस्त्रों के नाप से बढ़ कर या घट कर होती थी । क्षेत्रकृत्स्न वस्त्र अप्राप्य और बहुमूल्य वस्त्र होते थे । काल कृत्स्न वस्त्र साल के कुछ महीनों में बहुत महंगे पड़ते थे और मुश्किल से मिलते थे । भावकृत्स्न दो विभागों में यथा मूल्य के अनुसार (मूल्ययुत) और रंग के अनुसार (वर्णयुत) बंटे होते थे । साधु इन दोनों तरह के कपड़े नहीं पहन सकते थे । पर स्वुज देश में अथवा उन देशों में जहां चोरों का भय नहीं था और जहां अच्छे वस्त्र पहनना कौतुक का हेतु नहीं बनता था जैन साधु कीमती, कपड़े किनारे हटा कर पहन सकते थे, पर कुछ अवस्थाओं में किनारे रख भी सकते थे । उंकथत से पीड़ित साधु प्रमाणहीन वस्त्र भी पहन सकते थे । नैपाल, ताम्रलिप्ति और सिंधु-सौवीर में अच्छे कपड़े पहनने की प्रथा थी, इसलिए जैन साधु भी अच्छे कपड़े पहन सकते थे । कुछ ठंडे देशों में साधु कीमती कंबल भी ओढ़ सकते थे । जैन संघ में आने वाले राजकुमारों इत्यादि को उस समय तक कोमल वस्त्र पहनने की आज्ञा थी, जब तक वे खुरदरे कपड़ों के पहनने के अभ्यस्त नहीं हो जाते थे ।