Pracin Bharatiya Veshabhusha c4: भूमिका
Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c4
- Language
- Hindi
भूमिका
c4.1
कुछ वर्षों से भारतीय संस्कृति का नाम देश विदेशों में फैल रहा है और लोग उस संस्कृति के सब अंगों को जानने के लिए उत्सुक हैं। पर अभाग्यवश भारतीय संस्कृति का अर्थ अभी तक इस देश की गूढ़ विचारधाराओं और नाना मत-मतांतरों तक ही सीमित है। भारतीय दर्शनों और धर्मों के प्रति इस अनुराग का नतीजा यह हुआ है कि संस्कृति के दूसरे अंग अछूते ही छूट गये हैं। विद्वानों ने भारतीय कला का, जो हमारी प्राचीन संस्कृति का एक विशिष्ट अंग है, कुछ न कुछ अध्ययन किया है, पर उसके समझाने में कुछ विद्वानों द्वारा छायावादी विचारों का आश्रय लेने से, हम उस कला में केवल अपनी दार्शनिक मनोवृत्तियों का ही प्रतिबिम्ब देखने लगे हैं। कला के इस दार्शनिक रूप की विचारधारा इतने कठिन शब्दों में व्यक्त की जाती है कि बिना भारतीय दर्शन के ज्ञान के वह समझी तक नहीं जा सकती। कला के दार्शनिक सिद्धांतों पर इतना अधिक जोर देने का नतीजा यह हुआ है कि 'कला के लिए कला' के सिद्धान्त को ले कर हम भारतीय कला की समीक्षा करने में डरते हैं। दर्शन की पेचीदा विचारधाराओं में डूब कर कला अपना निजत्व खो बैठती है। कला की दार्शनिक पृष्ठिका भारतीय कला के उस महत् उद्देश्य की अवहेलना करती है, जिसके अनुसार लोक जनित कला सब के जीवन और भावनाओं का प्रतिबिम्ब है और जिसके द्वारा रसानुभूति करने का सब को अधिकार है।
c4.2
अब प्रश्न यह उठता है कि क्या असत के प्रति आध्यात्मिक विचार ही भारतीय संस्कृति है? कदापि नहीं। भारतीय दृष्टाओं के मतानुसार जीवन का परम ध्येय धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष हैं; इन चारों के संतुलित और सम्मिलित प्रयोग से ही हम पूर्णता और विकास के पथ पर अग्रसर होते हैं। अगर हम केवल धर्म और मोक्ष के साधन में ही लगे रहें, तो इसके माने होते हैं कि जीवन में अर्थ और काम की कोई महत्ता ही नहीं है। ऐसा करने से जीवन एकांगी बन जाता है और उस पूर्णता और गौरव तक नहीं पहुँच सकता, जो आदर्श जीवन के लक्ष्य हैं।
c4.3
इसमें संदेह नहीं कि दर्शन और धार्मिक तर्क भारतीय जीवन को बहुत प्रिय थे और जहां तक सूक्ष्म से सूक्ष्म आधिदैविक विचारधाराओं के सृजन और मनन का संबंध है, भारतीय संसार के बड़े से बड़े दर्शनों से टक्कर लेते हुए आगे निकल जाते हैं। पर साथ ही साथ भारतीय जीवन और उसके आधिभौतिक साधनों से भी प्रेम करते थे। सुसज्जित महल, करीनेदार नगर, अनेक जातियों और वर्गों वाले वास-वासियों से युक्त राज सभाएं, वादक और नर्तक, चमचमाते हुए गहने और अनेक तरह की वेश-भूषाएं और कपड़े, प्रसाधन के लिए अनेक भांति के गंध द्रव्य, ये सब भी तो भारतीय संस्कृति और जीवन के प्रतीक थे। दार्शनिकों को सभ्यता के इन बाह्य प्रतीकों में अस्थिरता भले ही देख पड़ती हो, लेकिन सांस रिकता में पड़े हुए एक साधारण जन के लिए तो सभ्यता के ये प्रतीक सत्य और सुन्दर देख पड़ते हैं। सभ्यता के इन बाह्य प्रतीकों से हम इतिहास की सूखी हड्डियों में जान डाल सकते हैं। रूखी घटनाओं के विवरण से यह संभव नहीं है।
c4.4
भारतीय संस्कृति की पूरी तस्वीर खींचने के लिए इस बात की बड़ी आवश्यकता है कि हम उसके भौतिक पहलुओं की अच्छी तरह से जांच-पड़ताल करें। इस जांच पड़ताल के लिए संस्कृत, प्राकृत, पालि और अपभ्रंश में काफी सामग्री है। इन से मिले विवरणों की सत्यता हम पुरातत्त्व, मूर्तियों और चित्रों से जांच
c4.5
सकते हैं। इस संबंध में हम यह कह देना उचित समझते हैं कि हमें साहित्य को सांस्कृतिक इतिहास में सब से ऊँचा स्थान नहीं देना चाहिए। एक लेखक चाहे वह कितना ही विद्वान् अथवा सूक्ष्म-दर्शक हो, एक वस्तु विशेष का विवरण हमारे सामने उतनी खूबी से नहीं रख सकता, जितनी सफाई या सुंदरता के साथ एक मूर्ति, स्तभ अथवा चित्रकार। साहित्यिक पुरातत्त्व का अपने क्षेत्र में महत्त्व है, लेकिन और अच्छे सबूतों के रहते हुए इसको प्रधानता न देना ही श्रेयस्कर है।
c4.6
इस पुस्तक का उद्देश्य प्राचीन भारत के सांस्कृतिक जीवन का एक पहलू अर्थात् वेश-भूषा का इतिहास लोगों के सामने रखना है। अभी तक विद्वानों ने भारतीय संस्कृति के इस पहलू पर ध्यान तक नहीं दिया है, क्योंकि उनकी राय में भारतीय वेश-भूषा में विकास क्रम नहीं है। आज धोती, चादर और पगड़ी पहनी जाती है, वही दो हजार बरस पहले भी पहनी जाती थी, फिर ऐसी रूढ़िगत वेश-भूषा का इतिहास ही क्या ? भारतीय वेश-भूषा के इतिहास की ओर विद्वानों का ध्यान न देने का एक कारण यह भी था कि लोगों का यह विश्वास था और अब भी है कि सिले कपड़े इस देश में १६ वीं शताब्दी में मुसलमान लाए। विद्वानों के भारतीय वेश भूषा के संबंध में दोनों विचार भ्रामक हैं। यह सही है कि अब तक भारतीय धोती, चादर, दुपट्टे और पगड़ी जो हमारे पहरावे में दो हजार बरस पहले प्रचलित थीं, पहनते हैं, लेकिन प्राचीन और आधुनिक वेश-भूषाओं की समानता यहीं खतम हो जाती है। कौन कह सकता है कि आज की धोती और दो हजार बरस पहले की धोती एक ही तरह से पहनी जाती थी अथवा आज की पगड़ी और तब की पगड़ी एक सी है? अब की साड़ी और तब की साड़ी में भी बहुत बड़ा अंतर है। ठीक बात तो यह है कि भारतीय इतिहास के प्रत्येक युग में कपड़े पहनने का ढंग बदल जाता है। सिले कपड़ों का भी यही हाल है। कम से कम वैदिक युग से लेकर ७ वीं सदी तक सिले कपड़ों के उल्लेख साहित्य में मिलते हैं और उनका अंकन भी बहुधा अर्धचित्रों और चित्रों में हुआ है। बात यह है कि इस उष्णता-प्रधान देश में धोती चादर ही आरामदेह और स्वास्थ्य वर्धक पहरावा था और उसे लोग चाव से पहनते थे, पर इसके यह माने नहीं कि सिले वस्त्र कभी पहने ही नहीं जाते थे। स्त्रियां तो अक्सर कंचुक या चोली पहनती थीं। विदेशी संपर्क से सिले कपड़ों का इस देश में और अधिक प्रचार बढ़ा, पर जन-साधारण अपनी धोती चादर को कभी न छोड़ सका। इस बात को मानने का भी पर्याप्त कारण है कि बहुत प्राचीन काल से गंधार और पंजाब में लोग ठंडक की वजह से सिले वस्त्र पहनते थे और इन सिले वस्त्रों में हम यूनानी, ईरानी और मध्य एशिया का काफी प्रभाव देखते हैं क्योंकि इन प्रान्तों उपरोक्त जातियों से बहुत प्राचीन काल से घनिष्ट संबंध रहा और ऐसी अवस्था में दोनों में सांस्कृतिक आदान-प्रदान का होना स्वाभाविक था।
c4.7
वेश भूषा के इतिहास में भारतीय वस्त्रों का भी इतिहास आ जाता है, क्योंकि प्राचीन पहरावों में हमारी दिलचस्पी और बढ़ जाती है जब हम ठीक-ठीक जान लेते हैं कि वे किन कपड़ों से बनते थे और बड़े सादे होते थे अथवा नक्काशीदार। भारत के प्राचीन वस्त्र-व्यवसाय के इतिहास के लिए भी ऐसी जांच-पड़ताल बहुत जरूरी है। उदाहरणार्थ अभी तक हम प्राचीन भारतीय वस्त्रों के इतिहास के लिए यूनानी लेखकों के ही आश्रित थे और उनसे भी हमें उन कपड़ों के भारतीय नाम नहीं मिलते। हमारा साहित्य इस कमी को बहुत कुछ दूर कर देता है। वैदिक, बौद्ध और जैन साहित्यों तथा आख्यायिकाओं और कोशों में वस्त्रों के ऐसे सैकड़ों नाम सुरक्षित हैं। इस बृहद् साहित्य में आयी तालिकाओं और उनकी टीकाओं से उन वस्त्रों के केवल नाम ही नहीं, उनके विवरण भी मिलते हैं। साहित्य से यह भी पता चलता है कि देश के किन-किन भागों और नगरों में अच्छे कपड़े बनते थे। इन तालिकाओं में सन और वल्कल के बने वस्त्रों के
c4.8
नाम आये हैं, जिन्हें बहुधा साधु अथवा बहुत ही साधारण लोग पहनते थे । इनमें बहुत से चमड़ों और समूरों के नाम भी आये हैं । कृष्णाजिन ऐसे चमड़े तो ऋषि मुनि पवित्रता के खयाल से पहनते थे, पर दूसरे चमड़े तो लगता है इस देश से बाहर भेजे जाते थे, क्योंकि इस गरम देश में समूर अथवा चमड़ों के बने वस्त्र पहनना असंभव था।
c4.9
यह कहना कठिन है कि आदिम युग में भारतीयों की वेश-भूषा क्या थी । हमें अभी तक की खोजों से यह पता नहीं लगा है कि वे कपड़े पहनते थे अथवा नहीं और अगर कपड़े पहनते थे, तो वे चमड़े के बने होते थे अथवा पत्तियों और छालों के । प्रागैतिहासिक गुफ़ा-चित्रों से तो यही पता चलता है कि उस युग के लोग प्रायः नग्न रहते थे और अचेलकत्व कोई बुरी बात नहीं मानी जाती थी । इस संबंध में हम कुछ प्राचीन संप्रदायों में अचेलकत्व का उल्लेख कर देना चाहते हैं। बौद्ध साहित्य में तो ऐसे अनेक नंगे साधुओं के संप्रदायों का उल्लेख आया है जिनमें मुख्य जैन थे । लगता है उनका नग्नत्व उस प्राचीन समाज के नग्नत्व की ओर इशारा करता है जब शरीर ढकने की भावना का उदय नहीं हुआ था । धीरे-धीरे जब सभ्यता ने आगे क़दम बढ़ाया, तब समाज तो वस्त्रों का आदी हो गया, पर उसके धार्मिक गुरु नग्नत्व की प्राचीनतम प्रथा अपनाये रहे, जो एक समय सर्वसाधारण का नियम था। वैदिक और बाद के साहित्यों में आये चर्म, वल्कल और तृणों के वस्त्र भी उसी आदि सभ्यता की ओर संकेत करते हैं । बात यह है कि पूरा समाज एक साथ ही उन्नति के पथ पर अग्रसर नहीं होता, उसका कुछ भाग हमेशा पीछे रह जाता है और प्राचीनता को निभाये चलता है । इन्हीं पिछड़े लोगों के विश्वासों और आदतों से हम बहुत प्राचीन काल की सभ्यता का चित्र खींच सकते हैं ।
c4.10
सब से पहले हमें भारतीय वेश-भूषा का पता सिंधु घाटी से मिली प्रागैतिहासिक सभ्यता से मिलता है। मोहेन जोदड़ो और हड़प्पा की यह सभ्यता ३५०० ई० पू० से लेकर १५०० ई० पू० तक फली-फूली और इसका संबंध मध्य पूर्व की सभ्यताओं से था । भौतिक सभ्यता के काफ़ी आगे बढ़ने पर भी लोग बहुत ही कम कपड़े पहनते थे । बहुधा लोग नंगे रहते थे और अगर कपड़े पहनते भी थे तो वह लंगोटी या धोती छोटी तहमत होती थी। कभी-कभी लोग चादर ओढ़ लेते थे और अपने बाल फ़ीते से बांधते थे। स्त्रियां कभी कभी पंखे के आकार का शिरोवस्त्र पहनतीं थीं।
c4.11
यह कहना कठिन है कि लोग सिले वस्त्र पहनते थे अथवा नहीं, गो कि एक मूर्ति कमीज़ जैसा वस्त्र पहिने दिखलायी गयी है । लगता है लोग कभी-कभी चिपको और नोकदार टोपियां भी पहनते थे ।
c4.12
स्त्रियां करधनी से बंधी लंगोटियां पहनतीं थीं। एक स्त्री एक धोती पहरे दिखलाई गयी है । शिरो-वस्त्र पंखाकार होते थे और लगता है फ्रेम पर चढ़े माड़ीदार कपड़े से बनते थे । इन शिरोवस्त्रों पर कभी कभी अलंकार भी बने होते थे । कभी-कभी शिरोवस्त्र तिपाई नुमा होते थे । स्त्रियां कभी कभी पगड़ी भी पहनतीं थीं।
c4.13
तकुओं की फिरकियों के मिलने से पता चलता है कि लोग सूत कातते थे । एक बरतन के टुकड़े के वैज्ञानिक अध्ययन से पता चलता है कि लोग कपास से अवगत थे । इससे इस बात की भी पुष्टि हो जाती है कि बाबुली भाषा का सिंधु और यूनानी भाषा का सिडोन शब्द सिंधु देश के बने कपास के कपड़े के लिए ही थे । इस तरह कपास से कपड़े बनाने का श्रेय सब से पहले इसी देश को मिलता है।
c4.14
मोहेन जोदड़ो के नष्ट होने (२५०० ई० पू०) और आर्यों के भारत आने (१५०० ई० पू०) के अंतर में भारतीय सभ्यता की क्या अवस्था थी, इसका हमें पता नहीं है। जब इस अंधकार युग का परदा उठता है, तब हमें वैदिक सभ्यता का दर्शन होता है। वैदिक युग की सभ्यता एक युग की न हो कर करीब
c4.15
हजार बरस में फैली हैं और उसमें भिन्न-भिन्न स्तर मिलते हैं। लेकिन जहां तक वस्त्र-भूषा का संबंध है, उसमें ८०० बरस तक कोई विशेष परिवर्तन नहीं हुआ। इस युग में विजेता आर्यों ने विजितों से बहुत से वस्त्र ग्रहण कर लिये, फिर भी अपने निजी वस्त्रों के प्रति उनका मोह बना रहा।
c4.16
कातना और बुनना आर्य सभ्यता के मुख्य अंग थे। ऊनी वस्त्र को आविक कहते थे। सिंधु की घाटी में अच्छे ऊनी कपड़े मिलते थे और रावी के प्रदेश के धुले और रंगीन ऊनी कपड़े प्रसिद्ध थे। कंबल और शामूल्य ऊनी वस्त्र थे। शामूल्य समूर हो सकता है।
c4.17
बहुत प्राचीन युग में आर्य गोचर्म पहनते थे, पर बाद में गायों की आर्थिक उपयोगिता देखते हुए यह प्रथा छोड़ दी गयी। कृष्णाजिन बहुत पवित्र माना जाता था और यज्ञादि के अवसरों पर पहना जाता था। बकरों की खालें भी ओढ़ी जाती थीं। इस देश की जंगली जातियां और व्रात्य भी चमड़ों के कपड़े पहनते थे।
c4.18
वैदिक साहित्य में कुछ ऐसे वस्त्रों के नाम आये हैं जिनकी ठीक ठीक पहचान नहीं हो सकती। बरासी शायद वरस नाम के वृक्ष की छाल के रेशे से बनता था। दूर्श शायद किसी किस्म का ऊनी वस्त्र था, क्षौम अलसी की छाल के रेशे से बना वस्त्र होता था जो कभी-कभी रंगीन भी होता था। पांड्वाविक ऊन का बना सफेद वस्त्र था। तार्प्य की ठीक ठीक पहचान नहीं हो सकती, शायद यह किसी तरह का रेशमी कपड़ा था। कपास का सब से पहला उल्लेख आश्वलायन श्रौतसूत्र में आया है, इसके कई कारण हो सकते हैं। (१) सिंधु सभ्यता का आर्यों को ज्ञान नहीं था। पूर्वी भारत में आने पर उन्होंने कपास के कातने बुनने से परिचय प्राप्त किया। (२) शायद अनार्य वस्त्र होने से आर्य इसके व्यवहार करने में हिचकिचाते हों, पर इसकी संभावना कम है।
c4.19
कपड़ा बुनने वाली स्त्रियों के लिए वयित्री और सिरी शब्दों का व्यवहार हुआ है। वैदिक साहित्य में बुनाई के बहुत से शब्द यथा ओतु (बाना), तंतु (सूत), तंत्र (ताना), वेमन (करघा), प्राचीनातान (आगे खिंचा ताना), वाय (बुनकर), मयूख (डरकी), आये हैं।
c4.20
वैदिक साहित्य में पहरावे के लिए साधारणतः वासस् और वसन शब्दों का प्रयोग हुआ है। सुवसन और सुवासस् से अच्छी तरह से कपड़े पहनने का बोध होता है। सुरभि के अर्थ ठीक तरह से बदन पर बँठने वाला कपड़ा है। अच्छे कपड़े पहनने वालों का समाज में आदर होता था, रंग-बिरंगे कपड़े भी पहने जाते थे।
c4.21
कपड़ों पर कभी कभी कारचोबी का काम होता था। कपड़ों में झालर (सिक) और अलंकृत किनारे (आरोक) भी होते थे। धुले और कोरे कपड़े पहने जाते थे। रंगीली स्त्रियां रंगीन और सुनहरे काम वाले कपड़े पहनतीं थीं। व्रात्य नीले कपड़ों के शौकीन थे।
c4.22
कसीदे के काम को पेशस् और कसीदे काढ़ने वालियों को पेशकारी कहते थे। कसीदे का काम वस्त्रों के ऊपर नीचे और मध्य में किया जाता था। कुछ अलंकार बुने जाते थे और कुछ काढ़े। खूब काम करने से सुईकार को पटुता बढ़ती थी।
c4.23
आर्य नीवि (लंगोटी), वासस् और अधिवास पहनते थे। नीवि शायद तहमतनुमा वस्त्र था। कोई-कोई इसकी व्युत्पत्ति तमिळ मइ से जिसका अर्थ बुनना है, करते हैं। नीवि से प्रघास अथवा पटका लटका होता था जो फूदनों से सजा होता था। स्त्रियां और पुरुष दोनों अपने शरीर को ढाकने के लिए उपवसन, पर्याणहन, द्रापि और अत्क पहनते थे। उपवसन और पर्याणहन चादर थे और प्रथिधि स्तन पट्ट। अत्क पूरे शरीर का लंबा चंगुल था और द्रापि कोई कोटनुमा वस्त्र। उष्णीष, जिसका उल्लेख सर्व
c4.24
प्रथम अथर्ववेद में आया है, राजे यज्ञादि अवसरों पर पहनते थे, कभी-कभी स्त्रियां भी पगड़ी पहनती थीं। व्रात्यों के उष्णीष में कई फंटे होते थे और वह एक तरफ झुका कर बांधा जाता था। जूतों का उल्लेख कम है, वटूरिणापाद शायद लड़ाई में पहनने का जूता था। उपानह यज्ञ के अवसर पर यजमान और व्रात्य पहनते थे ।
c4.25
यज्ञ के अवसर पर कुछ अनाहत वस्त्र पहने जाते थे। लोगों का विश्वास था कि बाने में अग्नि, ताने में वायु, मीचि में पितृ, प्रघात में नाग, सूत में विश्वेदेवा तथा आरोक में नक्षत्रों का अधिकार है। इस विश्वास से शायद यह मतलब हो कि वस्त्र की पवित्रता से उसमें भूत प्रेत नहीं घुस सकते थे न उस में जादू टोना लग सकता था।
c4.26
राजा धोती, चादर और पगड़ी पहनते थे। पगड़ी की जगह कभी-कभी पट्टियों से काम चल जाता था। यज्ञ के अवसर पर स्त्रियां रसना पहनती थीं। दीक्षित वस्त्र के ऊपर रेशमी चंडातक जो अधोरुक जैसा कोई वस्त्र था पहिनतीं थीं।
c4.27
व्रात्य उष्णीष, काली गांठवाले कपड़े और बकरों की खाल पहनते थे । अनुयायी व्रात्यों के कपड़ों के किनारे लाल होते थे और उनकी छींटें बटी हुई। सूत्रों के अनुसार व्रात्य लाल पगड़ी और कुरते पहनते थे, उनकी पगड़ी टेढ़ी बंधी होती थी । वे जूते भी पहनते थे ।
c4.28
महाजनपद युग, शैशु नागों और नंदों (६४२-३२० ई० पू०) में भारतीय सभ्यता और आगे बढ़ी। इस युग के इतिहास की सामग्री हमें जैन सूत्रों, बौद्ध पिटकों और ब्राह्मण सूत्र ग्रंथों में मिलती है । इस युग की आर्य सभ्यता ग्रामों से निकल कर नगरों में पहुँच चुकी थी और देश का कला-कौशल काफी आगे बढ़ चुका था। कपास, क्षोम, रेशम और ऊनी कपड़ों का काफी चलन था। जातकों में सुईकार (पेसकार), बेंत बिनने वालों (नलकार) और बुनकर (तंतुवाय) के व्यवसायों को नीचकर्म कहा है । उपरोक्त भाव बौद्धों के नहीं हो सकते, क्योंकि बुद्ध तो जात-पांत मानते ही न थे, लगता है कहानियों में जाति पांति की भावना वैदिक समाज की वर्ण-व्यवस्था की द्योतक है । जैन सूत्र तो दर्जियों, बुनकरों इत्यादि को शिल्पायों की श्रेणी में रखते हैं ।
c4.29
इस युग में कपास की खूब खेती होती थी और बनारस की कपास मशहूर थी। रूई धुनने, कातने और सूत की गड्डियां बनाने का भी वर्णन है। रेशमी कपड़े भी पहने जाते थे । बाहीक और चीन से भी रेशमी कपड़े आते थे । क्षोम के बने कपड़े बहुत महीन और सुन्दर होते थे । यह कपड़ा अलसी की छाल के रेशों से बनता था । उड्डीयान और गंधार के रक्त कंबल बहुत मशहूर थे । शिवि देश के घुस्सों की तो काफी कीमत होती थी । पंजाब और गंधार ऊनी कपड़ों के लिए प्रसिद्ध थे । पंजाब, उत्तरी सीमा प्रान्त, पूर्वी अफगानिस्तान से खालें कीमती शाल, समूर इत्यादि इस देश में आते थे। इस युग में पामीनों का बड़ा नाम था । आधुनिक पठानकोट में कोटंबर नाम के बहुत ही अच्छे ऊनी वस्त्र बनते थे। किखाव को हिरण्य वस्त्र कहते थे ।
c4.30
काशी में बहुत अच्छे कपड़े बनते थे । कहा जाता है कि बनारस के बने कपड़े में बुद्ध का मृत शरीर लपेटा गया था । ये कपड़े नीले, पीले, लाल और सफेद होते थे तथा इनका पोत मुलायम होता था। ये कपड़े सूती होते थे । बनारस अपनी अच्छी रूई और धोने के पानी के कारण सूती कपड़ों के लिए मशहूर था। बनारस में रेशमी और ऊनी वस्त्र भी बनते थे । बनारस की अठ्ठी की एक जगह बड़ी प्रशंसा की गयी है। बहुत मामूली दरजे के कपड़े सन, भंगेला, फल के रेशे, कुश, वल्कल तथा एरंडू, मोरगु और मन्जाक
c4.31
नाम के तृणों से भी बनते थे। तरह-तरह के चमड़ों का प्रयोग वस्त्र और बिछावन के लिए किया जाता था। मालूम तो यह पड़ता है उस समय चमड़े बहुत उपलब्ध थे और दक्षिणपथ में तो चमड़े पहनने का काफी रिवाज था ।
c4.32
चांदनी, मेजपोश, परदे इत्यादि भी सादे अथवा ऊनी होते थे । गोणक बकरे के बाल से बने आस्तरण होते थे । लगता है यह कपड़ा ईरान से आता था जहां इसे कौनकेस कहते थे । ईरान में बना कौनकेस बाबुल भी जाता था जहां इसे लोग अधोवस्त्र की तरह पहनते थे । चित्तक ऊनी पट्टियों को सींकर बना कालीन होता था । सफेद कालीन को पतिका कहते थे तथा फूलदार कालीन का नाम पटलिका था । रजाई को तूलिका कहते थे । सिंह, व्याघ्र इत्यादि के चित्रों से अलंकृत कालीन विकटिका थी। ऊद बिलाव की खालों से कंबल बनते थे । रूखे रोयें वाले कंबल एकंतलोमी कहे जाते थे । कट्टिस नाम के आस्तरण में जवाहर जड़े होते थे । कोसेय्य रेशमी कालीन को और कुत्तक बड़े भारी कालीन को कहते थे। हाथी, घोड़ों और रथों के लिए भी आस्तरण होते थे। मृगचर्म साट कर कंबल बनते थे। कदली मृग के समूरों से भी आस्तरण बनते थे । चिर्रिमिका चांदनी थी। बाहीतिक १६ हाथ लंबी और ८ हाथ चौड़ी ऊनी चादर थी। नमतक नमदा था और कोजव लंबे रोयें वाला कंबल।
c4.33
कपड़े सज्जी खार में धोये जाते थे । कपड़े नीले, हरे, पीले, लाल और मजीठिया रंगों में रंगे भी जाते थे । भिक्षुओं को पीत वर्ण छोड़ कर और किसी रंग के कपड़े पहनने की आज्ञा न थी।
c4.34
ब्राह्मण और श्रमण सन के बने कपड़े, कफ़न के कपड़े, घूर पर फेंके चिथड़ों के बने वस्त्र, तिरीट के रेशे से बने वस्त्र, मृग चर्म, कुश चीर, वल्कल, केस कंबल, बाल कंबल, उलूक पंख कंबल इत्यादि पहन सकते थे । उपरोक्त कपड़े हिंदू साधुओं के भिन्न-भिन्न वर्गों में प्रचलित थे ।
c4.35
बौद्ध भिक्षु और भिक्षुणियों के वस्त्र यथा संघाटी, अन्तरवासक और उत्तरासंग एक होते थे। इन तीनों के सिवाय, प्रत्यस्तरण, कंडूष प्रतिच्छ दन, आयोपपट्ट, कायबंध का भी वे उपयोग कर सकते थे। कायबंध के किनारों पर पट्टियां लगी होती थीं और सकरपारेदार तगानी का काम । वस्त्रों में भिक्षु तुक मेक लगा सकते थे । अलंकृत वस्त्रों के पहनने की आज्ञा उन्हें नहीं थी ।
c4.36
बौद्ध भिक्षु अपने कपड़े स्वयं बुन सकते थे । करघे को तंतक, ढरकी को वेमक, टट्टी को शलाका, और डोर को वट्ट कहते थे ।
c4.37
भिक्षुणियां अन्तरवासक और संघाटी के सिवाय कंचुक भी पहन सकती थीं। एकांत में उन्हें एक तिकोने लंगोट पहनने की भी आज्ञा थी ।
c4.38
जैन साधु केवल तीन वस्त्र रख सकते थे । इनमें दो क्षोम की धोतियां होती थीं और एक ऊनी चादर । कपड़े धोने और रंगने का उन्हें अधिकार न था।
c4.39
साधारण गृहस्थ अंतरवासक, उत्तरासंग और उष्णीष पहनते थे । स्त्रियां और पुरुष दोनों ही कंचुक पहन सकते थे । स्त्रियां मजबूत साड़ियां पहनती थीं । लोग अपने कपड़े बड़े संवार कर पहनते थे और अपने शरीर पर फबने वाले रंग के कपड़े ही उनको विशेष प्रिय थे । स्त्रियां तो अपने कपड़े बड़े ही सुरुचि से संभाल कर पहनती थीं। धोती हस्तिशौंडिक (हाथी के सूंड जैसी), मत्स्यवालक (मछली की पूंछ जैसी), चतुकर्णक (चौकोर), तालवृंतक (पंखे के आकार की), और शतवल्लिक (सौ चूनटों वाली) ढंग से पहनी जाती थी । कमरबंद या कायबंध कई तरह के होते थे यथा कलाबुक (रस्सी का बना) ढेड्डुभक (डेढ़े सांप की शक्ल का) मुरुज (ढोल के आकार का), और मद्दुवीन (अलंकार सहित) । स्त्रियां भी कमरबंद और पटके
c4.40
पहनती थीं, पर भिक्षुणियां केवल एक फेंटे वाले सादे कमरबंद पहन सकती थीं। पटके बांस के रेशे, चर्म पट्ट, ऊनी पट्टी, गुंथी हुई पट्टी और चोल मल्ल से बनते थे।
c4.41
जूते पहनने का काफी रवाज था। जूतों में एक से लेकर चार तल्ले तक होते थे और वे तरह-तरह के रंगीन चमड़ों से बनते थे; लेकिन ऐसे जूते केवल गृहस्थ ही पहन सकते थे। जूतों में निम्नलिखित प्रकार होते थे—पुटबद्ध (घुटने तक के जूते), पालिगुंठिम (पैर ढकने वाले जूते), सल्लकबद्ध (आधुनिक पेशावरी जूते जैसा), मेंडविषाण वद्धिक (जूते के नोक पर मेंड़ की सींग होती थी), अजविषाण वद्धिक (बकरे की सींग वाला), वृश्चिकालिक (जूरे पर बिच्छू की पूंछ जैसा अलंकार होता था), मोरपिंछपरिक्खित्त (तल्ले या बंदों में मोर पंख सिले होते थे), तूलपुष्णिक (रूंई से भरा जूता) और तितिर पट्टिक (तीतर के पंखों जैसी बनावट)। बौद्ध भिक्षु उपदेश सुनते समय जूते और चप्पल नहीं पहन सकते थे। उपरोक्त जूतों के अलावा बहुत से वन्यपशुओं के चमड़ों से भी जूते बनते थे। जूते पहनने का इस युग में इतना रवाज था कि चर्मकार के व्यवसाय का जातकों में कई बार उल्लेख आया है। जूतों के सिवाय गृहस्थ तृण, मूंज, तालपत्र, बांस और लकड़ी की बनी चपलें और पादुकाएं भी होती थीं। कुछ शौकीन लोग सोने चांदी और रत्नों से जड़ित पादुकाएं भी पहनते थे।
c4.42
इस युग के साहित्य में कभी-कभी विशेष तरह की वेश-भूषाओं के उल्लेख आ जाते हैं। प्रतियोगिता के समय एक धनुर्धारी एक सकच्छ लाल धोती, लाल कमरबंद, सुनहला कंचुक और उष्णीष पहने बतलाया गया है। राजे कभी-कभी दुकूल घूंघट पहनते थे, लेकिन यह पता नहीं लगता कि घूंघट कैसा वस्त्र था।
c4.43
इस युग में सिलाई की कला बहुत उन्नत हो चुकी थी और सिलाई संबंधी बहुत से शब्द बौद्ध साहित्य में मिलते हैं। तेज सूइयां सूची नालिका में रक्खी जाती थीं और उनको पार बचाने के लिए नालिकाओं में जौ का आटा, बालू, मोम इत्यादि भर दिये जाते थे। कुछ लोहारों के गांव अच्छी से अच्छी सूई बनाते थे और इस व्यवसाय में उनकी इतनी ख्याति थी कि लोग उन्हीं से सूइयां लेते थे। कपड़े काटने के लिए तरह तरह की मूठों वाली कैंचियां (सत्थक) भी होती थीं। सिलाई के समय सूई की नोक से अंगुलियां बचाने के लिए अंगुस्ताने (प्रतिग्रह) भी पहने जाते थे। एक तख्ते को जिस पर कपड़े बांध कर सिये जाते थे, कठिन कहते थे। कठिन के और भागों के भी नाम दिये हुए हैं। कपड़े ब्योंतने के लिए उनपर ताड़पत्र के अंक बना दिये जाते थे तथा सिलाई और कटाई के पहले लंगर (मोघ सुत्तक) डाल दिये जाते थे। दरजी की दूकान में जालमारियां (आवेसन वित्थक), और कठिन अर्थात् सीने के फ्रेम होते थे। इसमें खूंटियां और टाड़ें भी लगी होती थीं।
c4.44
काटने, सीने और रफू करने के भी बहुत से शब्द आये हैं, पर इनका ठीक-ठीक अर्थ समझना आसान नहीं है। कटाई के लिए कपड़े पर नख से बने निशान को उल्लिखित, लंगर से जुटे कपड़े के टुकड़ों को बंधन, संवान में मोड़ देकर लंगर की सिलाई को ओवट्टियकरण, बड़े टुकड़ों से छोटे कपड़ों को जोड़ने को कंडुसकरण, प्योंदा लगने अथवा फटन सीने के लिए दढ़िकरण, बटाईदार सिलाई को अनुवातकरण, बगल और पीछे की सिलाई को अनुवातकरण, कुछ जगहों की मोहरी सिलाई को ओवट्ठेयकरण, तिरछेवल की सिलाई को कुत्ति, आधी दूर तिरछे बल की सिलाई को अट्टकत्ति, पांच खंड से एक खंड की गोल सिलाई को मंडल, भीतरी मोड़ को विवट्ट, घुटने पर की सिलाई को जांघेयक, गले की सिलाई को गिवेय्यक और केहुनी पर लगे कपड़ों की सिलाई को बाहन्त कहते थे। सूत से ऊंचे रफू को सुत्तलूख, एक तरफे रफू को विकण्ण, रफू से ऊंचा नीचा हटाने की क्रिया को विकण्णं उद्धरितुं, छोर निकालने को ओकिरिति
c4.45
और किनारों पर छींट बांधने को अनुगतं परिवस्त्रं कहते थे । भीतरी गोंट को पला, किनारीदार झालर को अढ़पदार और कंधों पर लगी गोंट को अंतवद्ध कहते थे ।
c4.46
मौर्ययुग में भारतीय संस्कृति ने खूब उन्नति की । इस युग की वेश भूषा के इतिहास के लिए हमें साहित्य का ही सहारा लेना पड़ता है, क्योंकि इस युग की मिली मनुष्य मूर्तियां संख्या में बहुत ही कम हैं । इस युग की वेश-भूषा और कपड़ों के इतिहास के लिए महाभारंत सभारर्व और कौटिल्य के अर्थ-शास्त्र में काफी सामग्री है । इन ग्रंथों से यह भी पता चलता है कि भारत और मध्य एशिया से काफी व्यापारिक संबंध था और अफगानिस्तान, बल्ख और ताजिकिस्तान से यहां रेशमी और ऊनी कपड़े, शालें तथा समूर आते थे ।
c4.47
कौटिल्य अर्थशास्त्र में चमड़ों और समूरों की विशद व्याख्या है । कान्तानावक एक नीले रंग का चमड़ा होता था और प्रेयक सफेद और नीले रंग का मूंजली और पारोदार चमड़ा। इसब-नाम से बिसी, जो बालदार और चित्तीदार होता था तथा महाविसी जो सुरसुरा और सफेद होता था, आते थे । हिमालय प्रदेश के आरोह नामक स्थान से गुलदार श्यामिका, भूरे और फाख्ताई रंग की कालिका, काले भूरे और लाल रंग के कदली चर्म, गोल चित्तीदार चन्द्रोत्तरा और शाकुला नाम के चमड़े और समूर आते थे । बल्ख से काले समूर, चीन देश के समूर और गेहुएं रंग के सामुली आते थे । ऊद विलाव के चमड़ों में सातौना काले रंग का होता था, नलतुला हरे रंगका। डूबदुबका का रंग भूरी होता था और इसमें ऊद बिलाव की पूंछ भी होती थी । चिकने, मुलायम और मन्निभ्न रोम वाले समूर अच्छे माने जाते थे । गोह, चीते, सूंस, सिंह, व्याघ्र, हाथी, भैंसे, सुरागाय और गयाल के चमड़े भी काम में आते थे ।
c4.48
भेड़ के ऊन से बने आविक नाम के शाल, सफेद, शुद्ध रक्त और पक्व रक्त रंगों के होते थे । सुई कारी और बुनाई द्वारा शाल में अलंकार जोड़ना को खचित कहते थे, करघे पर ही जिस शाल में अलंकार बुने गये हों उसे वानचित्र और अनेक टुकड़ों को जोड़ कर बनाये गये शाल को खंड संघातय कहते थे । किनारे पर जालीदार शाल को तंतुविच्छिन्न कहते थे । आज दिन भी कश्मीर में उपरोक्त विधियों से ही शाल और जामेवार बुने जाते हैं ।
c4.49
कौटिल्य ने दस तरह के ऊनी कपड़ों का वर्णन दिया है जिनमें अधिकतर बिछाने के काम में आते थे । कंबल सब तरह के ऊनी कपड़ों के लिए एक साधारण शब्द है। शालों के कंबल को केवलक कहते थे, गजास्तरण को कुतभिसिका, वृषभास्तरण को सोमितिका, और अश्वास्तरण को तुरगास्तरण । रंगीन कंबल को वर्णक, पलंगपोश को तलिच्छक, खूब मोटे कंबल को बारवाण, हाथी के झूल को परिस्तोभ और हाथी के जांधों की रक्षा के लिए मोटे कंबल को समंतभद्रक कहते थे ।
c4.50
नैपाल देश से दो तरह के कंबल आते थे यथा भिंगिसी जो आठ टुकड़ों को जोड़ कर बनता था और बरसाती का काम देता था और अपसारक जो आधुनिक पट्टू की तरह कोई कपड़ा होता था ।
c4.51
जंगली जानवरों के बालों से भी कपड़े बनते थे । ऐसे ही कपड़े से संपुटिका अथवा पाजामा बनता था । चतुरसिका के कौनों पर अलंकार होते थे, संबंडिका एक तरह की चादर होती थी । मोटे सूत से बनी चादर को कटवारक कहते थे और किनारेदार चादर को प्रावरक ।
c4.52
दुकूल वस्त्र दुकूल वृक्ष की छाल के रेशे से बने वस्त्र को कहते थे । बंगाल का बना दुकूल सफेद और मुलायम होता था, पौंड्र का दुकूल नीला और चिकना तथा सुवर्णकुडया का दुकूल ललाई लिये होता था। मणिस्रिग्धोदकवान दुकूल घुटे सूत से बनते थे, चतुरस्त्रकवान में बुनाई बराबर होती थी और
c4.53
श्यामनिभप्रभ में रेशम मिला होता था या तरह तरह के रंगीन सूतों से यह बुनी जाती थी। ताने-बाने में एक, दो, तीन या चार तार लगते थे । कभी-कभी ताने में एक तार होता था और बाने में दो।
c4.54
काशी और पुंड्र क्षौम के लिए प्रसिद्ध थे । पत्रोर्ण से बने कपड़ों के नाम उन देशों पर पड़ते थे जहाँ वे बनते थे । इस नियम के अनुसार उसके नाम मागधिका, पौंड्र और सौवर्णकुड्यका पड़े । पत्रोर्ण नाग वृक्ष, लिकुच, बकुल और वट वृक्षों की छालों से निकले रेशों से बनता था, और उसका रंग गेहुंआ, सफेद और मक्खन का सा होता था ।
c4.55
रेशमी वस्त्रों में कौशेय और चीन पट्ट मुख्य थे। कौशेय कोशकार देश का बना रेशमी कपड़ा था और चीन पट्ट चीन देश का बना रेशमी कपड़ा।
c4.56
सूती कपड़ों के नाम भी उन देशों पर पड़ते थे जहां वे बनते थे । माथुर आधुनिक मथुरा में, अपरान्तक अपरांत में, कालिंगक कलिंग देश में और काशिक काशी जनपद में बने कपड़ों के नाम थे । अर्थ शास्त्र से यह सिद्ध हो जाता है कि प्राचीन काशी कपास और क्षौम वस्त्रों के लिए प्रसिद्ध थी, रेशमी वस्त्रों के लिए नहीं। पूर्वी बंगाल में बने सूती कपड़े को वांगक कहते थे, वत्स देश (आधुनिक प्रयाग के पास) के सूती कपड़े को वात्सक और महिष देश के कपड़े को माहिषक।
c4.57
कोष्ठाध्यक्ष को देश, काल और परिभोग के अनुसार कपड़ों की जानकारी आवश्यक थी । कीड़े मकोड़ों और चूहों से रक्षा करने का भी उसे प्रबन्ध करना पड़ता था।
c4.58
राज के निजी कपड़े बुनने के कारखाने सूत्राध्यक्ष के जिम्मे होते थे । इन कारखानों में विधवाएं, वृद्धा दासियां इत्यादि काम पर रक्खी जाती थीं और उन्हें ऊन, कर्च, क्षौम इत्यादि से सूत तैयार करना पड़ता था । कातिनों को उनके काम के अनुसार वेतन मिलता था । छुट्टियों में काम करने का भी पारिश्रमिक मिलता था, पर काम खराब करने वालों का वेतन काट लिया जाता था । अच्छे कारीगरों को विमल तर रखने के लिए तेल इत्यादि इनाम में दिये जाते थे। कारखानों के सिवाय ठीके पर भी कपड़े बुनवाये जाते थे । घर से बाहर न निकल सकने वाली स्त्रियों को घर पर ही काम देने का प्रबंध था। कारीगरों को बढ़ावा देने के लिए रेशमी, सूती और ऊनी वस्त्र इनाम में दिये जाते थे। वस्त्रों पर चुंगी भी लगती थी । कपड़े, किंशुक, कुसुंभ और कुंकुम के रंगों में रंगे जाते थे ।
c4.59
महाभारत में राजसूय यज्ञ के अवसर पर भारत के सीमा प्रान्त और बाहर से अनेक तरह के वस्त्रों के युधिष्ठिर के पास उपहार में आने का उल्लेख है । कंबोज (आधुनिक ताजिकिस्तान) से ऊनी कपड़े, समूर और सुनहले कपड़े, ऊनी चादरें, बेशकीमती दुशाले और कजली मृग की खालें आयीं । बलोचिस्तान या पारेसिंधु प्रदेश से बकरे और भेड़ों की खालें आयीं। चीन, हूण, शक, बाह्लीक और ओडू देशों से डोल माप के सुखरंगीन और मुलायम वस्त्र, भेड़ के ऊनी कपड़े, पश्मीने, रेशमी कपड़े, नमदे तथा समूर आये । वंग कलिंग, ताम्रलिप्ति और पुंड्र से दुकूल और पत्रोर्ण के बने कपड़े और चादरें आयीं। ऐसा लगता है कि उपरोक्त प्रदेशों से भारत का इस काल में घनिष्ठ व्यापारिक संबंध था।
c4.60
इस काल की भारतीय वेश-भूषा का उल्लेख यूनानी इतिहासकारों ने भी किया है । उनके अनुसार भारत के लोग आधे पैर तक की धोती और चादर पहनते थे। ये वस्त्र कभी-कभी सुवर्ण और रत्नखचित भी होते थे ।
c4.61
मौर्ययुग के अंतिम चरण और शुंगयुग की वेश-भूषा का पता हमें यक्ष याक्षिणियों की मूर्तियों और और भरहुत के अर्ध चित्रों से मिलती है । परधान का अंग आधे पैर की धोती, छाती पर सकरमुढी
c4.62
पड़ा दुपट्टा पहने हैं। धोती पैर तक भी पहुंचती थी और कमरबंद और वैकक्ष्य पहनने की प्रथा थी। एक जगह अटपटी पगड़ी भी आयो है। स्त्रियां एंड़ी तक पहुंचती साड़ी, कई लड़ों की करधनी, पटका और दुपट्टे पहनतीं थीं।
c4.63
भरहुत के अर्ध चित्रों में पुरुष सकच्छ धोती पहनते हैं जो कभी आधे पैरों तक और कभी पूरे पैरों तक पहुंचती थी। धोती के साथ-साथ, कमरबन्द, पटके, दुपट्टे, और पगड़ियां पहनने को भी चाल थी। इस युग में दक्षिण भारत के पहरावे में कुछ अंतर था। शुंगयुग में पगड़ियां अनेक तरह से बांधी जाती थीं। साधारण रीति से तो सिर पर बाल के झूट के चारों ओर पगड़ी के फेंटे बांध लिये जाते थे। लट्टूदार साफा, कामदार साफा, झालरदार साफा, पीछे उभरा साफा, अटपटी पगड़ी, हलका साफा, अटपटी लट्टूदार पाग तथा छोटे झालरदार साफा पहने जाते थे।
c4.64
भरहुत के अर्ध चित्रों में सिले वस्त्र केवल दो जगह आये हैं। एक जगह एक राजा का अनुचर कोट-नुमा वस्त्र पहने दिखलाया गया है और दूसरी जगह एक उत्तरापथ का आदमी बंददार कोट पहने है। इसके बाल एक फीते से बंधे हैं, कमर में धोती और पटका है और छाती पर परतला। कभी कभी शुंग-कालीन भट्टी की मूर्तियां भी कोट पहने दिखायी गयी हैं। सांची के नं० के स्तूप के अर्ध चित्रों में जो शुंगकालीन हैं आधे और पूरे बांह के कंचुक आये हैं।
c4.65
भरहुत के अर्धचित्रों में स्त्रियां घुटने तक की साड़ियां पहने दिखलायी गयी हैं। साड़ियों पर कमरबंद, करधने और पटके होते थे। स्त्रियां कभी-कभी चादर और पगड़ी भी पहनती थीं। यक्षिणी चंदा की वेश-भूषा से एक शुंगकालीन संभ्रांत नारी के पहरावे का पता चलता है। उसके कमर में घुटने तक की धोती, सत्तलड़ी करधनी और कामदार कमरबंद है। सिर एक कामदार ओढ़नी से ढंका है। एक दूसरी यक्षी पतली साड़ी, संकरमुष्ट्रीदार कामदार कमरबंद, करधनी और योगपट्ट पहने हैं। यक्षी चूलकोका का पटका मार्के का है
c4.66
साधु कोपीन पहनते थे और उनकी स्त्रियां साड़ी और चादर। स्त्रियां रूमाल से सिर ढांक लेतीं थीं अथवा कभी-कभी पगड़ी भी पहनती थीं। दक्षिण भारत की स्त्रियों की पोशाक भी प्रायः ऐसी ही होती थी, घुटनों तक की साड़ी बक्सुएदार कमरबंद और चारखाने की ओढ़नी पहनने की प्रथा थी।
c4.67
ई० पू० पहली शताब्दी की वेश-भूषा ई० पू० दूसरी शताब्दी को वेश-भूषा से मिलती; है पर उसमें थोड़ा अंतर भी आ जाता है। धोती सादी होती है और भारी कमरबंदों और पटकों का अभाव सा है; लेकिन लोग अपने कपड़े सजा कर पहनते थे। अनुचर वर्ग और सिपाही सिले कपड़े भी पहनते थे। स्त्रियां अपनी धोती और चादरें खूब सजा कर पहनती थीं। इस युग की दक्षिणी वेश-भूषा कुछ टीमटाम वाली होती थी। इस युग की वेश-भूषा के इतिहास की सामग्री हमें सांची और भाजा के अर्ध चित्रों से, अजंठा के ९-१० नं० की लेणों के भित्ति चित्रों से तथा मथुरा और कौशांबी से मिली मिट्टी को मूर्तियों से मिलती है।
c4.68
सांची के अर्ध चित्रों में धोती सकच्छ और कभी-कभी विकच्छ होती है। दुपट्टे कई तरह से ओढ़े जाते थे। लोग प्रायः साफे बांधते थे। साफे के फेंटे जूड़े के चारों ओर होते थे। साफे अलग-अलग ढंग के होते थे यथा नीची फेंट वाला साफा कुछ चुनन लिये, दाहिनी फेंट वाला साफा, मोती की लड़ी से सजा साफा, संबोतरे लट्टू वाला साफा, गद्दीदार साफा, तिरछा गोलुबेंदार साफा, ढोल के आकार का लट्टू वाला साफा, पांखाकार साफा, चक्करदार पगड़ी, फिरहरीदार पगड़ी, लंबोत्तरी लट्टू वाली पगड़ी, पंखाकार पगड़ी, बेलन के आकार की पगड़ी, तीन लट्टुओं वाली पगड़ी।
c4.69
टोपियां बहुधा विदेशी पहनते थे। निम्नलिखित प्रकार की टोपियां सांची के अर्ध चित्रों में देख पड़ती हैं—कुलाहनुमा टोपी, चौकस गोल किनारे वाली टोपी, बीच से कटी झालरदार टोपी, नीचे बार की तुर्कीटोपी नुमा टोपी, पंखों से सजा कुलाह, चोटीदार टोपी । सिर कभी-कभी फीते से बांधे जाते थे।
c4.70
स्त्रियां सकच्छ साड़ी और कमरबंद पहनतीं थीं। एक दूसरी तरह की साड़ी में एक भाग कमर में लपेट लिया जाता था। कभी-कभी चुनन बगल में खोंस ली जाती थी। ओढ़नी ओढ़ने के निम्न लिखित प्रकार थे—धोती के आकार की ओढ़नी, दोहरे किनारे की ओढ़नी, दोहरी ओढ़नी, पेंचोदार ओढ़नी, पंखाकार ओढ़नी, बढी ढकती हुई किनारेदार ओढ़नी। स्त्रियां कभी-कभी पगड़ी और टोपी पहनती थीं । एक जगह एक स्त्री खोर पहने दिखायी गयी है।
c4.71
मथुरा और कोसम से मिली मिट्टी की स्त्री मूर्तियां कंचुक और गहने पहनती हैं। इंडियन इंस्टिट्यूट म्यूजियम, आक्सफर्ड, में एक ऐसी ही मूर्ति गहनों के सिवाय बिना बांह का कंचुक, जो केवल बायां कंधा ढंकता है, और कमरपेटी पहनती है । दुपट्टे एक या उससे अधिक हैं।
c4.72
सांची के अर्ध चित्रों में सिपाही इत्यादि कंचुक पहनते हैं। धनुर्धारी पूरे बांह का कंचुक तहमतनुमा धोती, कमरबंद और साफा पहनते थे। पैदल सिपाही धनुर्धारियों की तरह वस्त्र अथवा कमरबंद से बंधी जांघिया पहनते थे । विदेशी शक पूरी बांह का कंचुक, तथा कमरबंद पहनते थे और अपना सिर रुमाल से बांधते थे । एक जगह एक विदेशी अधबहियां कंचुक, जांघिया और बूट पहने दिखाया गया है । विदेशी यूनानी चप्पल भी पहनते थे ।
c4.73
ब्राह्मणों का कौपीन घाघरेनुमा होता था और वे वैकक्ष्य पहनते थे। ऋषि पत्नियों का भी वैसा ही पहरावा था।
c4.74
उत्तर और दक्षिण भारत की वेश-भूषा में कुछ स्थानिक विशेषताएं थीं। अमरावती के इस युग के अर्ध चित्रों में सद्गृहस्थ लंबोतरा साफा, घुटनों तक की धोती और झब्बेदार कमरबंद बांधते थे। महाराष्ट्र में धोती छोटी होती थी और कमरबंद उमेठे दुपट्टे के होते थे । भाजा के अर्ध चित्रों में एक अंगरक्षक अटपटी पगड़ी और लहरियादार कंचुक पहने है। एक द्वारपाल लंबी धोती कमरबंद, पटका तथा गुंबददार पगड़ी पहनता है और एक सिपाही हल्की पगड़ी, वैकक्ष्य, सरकती धोती और कमरबंद पहनता है । एक जगह घुमावदार पगड़ी आयी है ।
c4.75
स्त्रियों के शिरोवस्त्र तरह-तरह के होते थे यथा सिर पेंच सहित ओढ़नी, कई तहों की भारी ओढ़नी, दांतेदार पगड़ी, गोल मूंगरीनुमा शिरोवस्त्र, फीतेदार जूड़ा और कान तक पहुंचती पगड़ी।
c4.76
अजंटा के ९-१० नं० की लेणों के भित्ति चित्रों में हल्की पगड़ी, अधबहियां कंचुक और अंगा आते हैं ।
c4.77
ईस्वी सन् के प्रथम तीन सौ वर्षों में भारतीय जीवन और संस्कृति में काफी उन्नति हुई। इस युग में बृहत्तर भारत और मध्य एशिया में भारतीय उपनिवेश बने और भारत और रोम में रत्नों, गंध द्रव्यों, स्फटिक के बरतनों और कपड़ों का कीमती व्यापार बढ़ा।
c4.78
इस युग में भारतीय वेश-भूषा के इतिहास की प्रचुर सामग्री हमें गंधार की मूर्तियों और अर्ध चित्रों
c4.79
से, मधुरा की मूर्तियों से और अमरावती और गोल्ली के अर्ध चित्रों से मिलती है। इस काल में उत्तर-पश्चिमी भारत में धोती, चादर, पगड़ी, साड़ी और ओढ़नी के सिवाय कंचुक, शलवार, टोपियां, जिरह-बख्तर और पूरे बूट प्रचलित थे, जैसे ईरानी और मध्य एशिया के पहरावे भी मिलते हैं। यहां हमें यूनानी वेश-भूषा के भी दर्शन मिलते हैं । शक राजाओं की पोशाकों का पता सिक्कों से चलता है। इस युग में दक्षिण भारत में स्त्रियों और पुरुषों की वेश-भूषा काफी सादी होती थी । दोनों ही मलमली कमरबन्द और धोतियां पहनते थे । पुरुष पगड़ी भी पहनते थे । सिपाही और द्वारपाल इत्यादि कंचुक पहनते थे और कभी-कभी उनके सिर पर कुलाहनुमा टोपी भी होती थी ।
c4.80
कुषाणयुग के साहित्य से कपड़ों और वेश-भूषा पर विशेष प्रकाश नहीं पड़ता । वस्त्रों के वर्णन छिटपुट से हैं और उनके माने समझने में भी कठिनाई पड़ती है । इस युग के कपड़ों का अच्छा वर्णन पेरिप्लस आफ दि एरीथ्रियन सी नामक ग्रंथ में आया है ।
c4.81
इस युग में कपास खूब होती थी । कपास बाजार से खरीद कर धुन ली जाती थी और उससे एक सा महीन सूत कात लिया जाता था । बुनकर चीर छोड़ कर कपड़े बिनते थे और उनकी स्त्रियां ताने पर माड़ी देती थीं ।
c4.82
कलिंग देश के नाग बुनकर बहुत अच्छी मलमल बिनते थे, जिसकी खपत यहां और विदेश दोनों में ही होती थी। रोम साम्राज्य में भारतीय मलमल की गहरी खपत थी। पेरिप्लस के अनुसार बढ़िया मलमल को मोनाचे और घटिया रुई के कपड़े को सगमतोघेने कहते थे । गुजरात के घटिया तरह के कपड़े को मोलोचीन कहते थे । यहां से कपड़े पूर्वी अफ्रिका के बंदरगाहों को, तथा अरब, मिस्र और सोकोतरा को भेजे जाते थे । त्रिचनापल्ली और तंजोर की मलमल को अर्गंरतिक कहते थे । मसलीपटम में भी मलमल बनती थी । पूर्वी भारत की मलमल को गेंजटिक कहते थे और यह शायद काशी और ढाका के पास बनती थी।
c4.83
इस युग में रेशमी कपड़े भी खूब चलते थे और इनके लिए पट्टांशुक, चीन, कौशेय और धौतपट्ट शब्दों का व्यवहार हुआ है । विचित्र पटोलक में तरह-तरह की नक्काशियां बनी होती थीं और इसकी तुलना गुजरात की आधुनिक पटोला साड़ी से की जा सकती है ।
c4.84
सिंध नदी के बारिकल बंदरगाह से रेशम और रेशमी कपड़ों का निर्यात होता था । इस युग में चीनी रेशमी कपड़े ब्रह्मपुत्र की घाटी, आसाम और पूर्वी बंगाल हो कर भी आते थे । मलाबार के बंदरगाहों में भी पूर्वी बंगाल से रेशमी कपड़े आते थे । कावेरीपट्टन में रेशम के व्यापारियों की दुकानें थीं। रोमन व्यापारी रेशमी कपड़े गंगा के मुहाने, खंभात की खाड़ी और त्रावनंकूर के बंदरगाहों से खरीदते थे, जहां चीनी व्यापारी आते थे ।
c4.85
ऊनी कपड़ों को साधारणतः कंबल कहते थे । दूष्य भी किसी तरह का ऊनी कपड़ा होता था । ऊन दुकूल मिलाकर भी अच्छे वस्त्र बनते थे । अच्छे पश्मीने भी बनते थे। इसी पश्मीने के बने एक लाल रंग के रूमाल को ईरान के एक बादशाह ने रोमन बादशाह आरेलियन को उपहार में भेजा । पश्म को शायद रोमन कानून के संग्रह में मारकोकोरम लाना कहा है । हुरमुज द्वितीय को काबुल की राज कन्या के साथ विवाह करने पर दहेज में पश्मीने के शाल मिले जिनकी सुन्दरता देख कर लोग चकित हो गये ।
c4.86
ऊनी और सूती कपड़ों के सिवाय, क्षौम, सन और सफेद दुकूल के कपड़े भी चलते थे । खालिस सुनहले कलाबत्तू से बने वस्त्र को हुरंणी अथवा हिरण्यवस्त्र कहते थे । बनारस के बने कपड़ों के लिए काशिक वस्त्र, काशी, काशिकांशु इत्यादि शब्दों का प्रयोग हुआ है । शायद काशिक वस्त्र का तात्पर्य रेशमी वस्त्रों से न हो
c4.87
कर सूती वस्त्रों से है । काशी की मलमल बड़ी महीन होती थी और उससे पहनने के कीमती कपड़े बनते थे । फलक नाम का वस्त्र शायद फाल के रेशों से बनता था। अपरांत में बने वस्त्र को अपरांतक कहते थे । फुट्टक वस्त्र से शायद छींट का मतलब है । पुष्पपट्ट से किखाब का तात्पर्य है ।
c4.88
भिक्षुक तथा श्रमण-ब्राह्मण वृक्षों की छालों के रेशों, घास इत्यादि के बने कपड़े और ऊंट, बकरों इत्यादि के बालों के बने कंबल और जानवरों की खालें पहनते थे । इस युग में भारत और रोम के बीच चमड़े और समूरों का अच्छा व्यापार था। समूर चीन, तिब्बत इत्यादि देशों से भारत में आते थे । कुछ मामूली दरजे के चमड़े अथवा कंबल भी खंभात की खाड़ी हो कर पूर्वी अफ्रिका जाते थे ।
c4.89
इस युग में कपड़े का इतना गहरा व्यापार था कि बहुत से व्यापारी केवल एक ही किस्म के कपड़े रखते थे । सोपारा में काशी के वस्त्रों की दूकान और छींट की दूकान का उल्लेख है । मथुरा में बजाजे का जिक्र है । कावेरीपट्टन में कपड़े के बल्लालों का भी उल्लेख है ।
c4.90
इस युग के साहित्य में वेश-भूषा का कम उल्लेख है । साधारणतः लोग धोती दुपट्टा पहनते थे । काशी के धोती दुपट्टे प्रसिद्ध थे और कभी कभी इनके बड़े ऊंचे दाम होते थे । राजे चौड़े किनारे वाले नये वस्त्र पहनते थे । मामूली किसान सन की धोती और लंगोटी पहनते थे । पगड़ी पहनने की भी प्रथा थी । राजे कभी-कभी कंचुक भी पहनते थे । अंग रक्षक और सिपाही तो अक्सर कंचुक और जिरह-बख्तर पहनते थे। दक्षिणी राजे जड़ाऊ टोपी और धोती पहनते थे । उच्च वर्ग के तामिल धोती पहनते थे और एक टुकड़े कपड़े से अपने सिर ढंक लेते थे । अंग रक्षक कोट पहनते थे । यवन अंग रक्षक युद्ध क्षेत्र में कंचुक पहन कर पहरा देते थे ।
c4.91
तामिल स्त्रियां पैर तक पहुंचती साड़ियां पहनती थीं । वारवनितानों की साड़ी आधी जांघ तक पहुंचती थी। जंगली स्त्रियां पत्तों की घंघरिया पहनने थीं।
c4.92
गंधार की मूर्तियों और अर्ध चित्रों में आयी वेश-भूषा में हम भारतीय ईरानी, और यूनानी वेश-भूषाओं का सम्मिश्रण पाते हैं । राजे और सामंत पैर तक पहुंचती सिलवटदार धोती तथा चादर पहनते थे । चादर अनेक तरह से पहनी जाती थी ।
c4.93
डोरी से बने कमरबंद झब्बेदार होते थे । चट्टी या खड़ाऊं पहनने की भी प्रथा थी । बाल अक्सर मोती की लड़ों और रत्नों से सजे होते थे, पर पगड़ी भी पहिनी जाती थी ।
c4.94
ये पगड़ियां बंधी बंधाई पहिनी जाती थीं। शीर्षपट्ट बहुधा अलंकृत होते थे। एक शीर्षपट्ट पर मिथुन का आकार है, दूसरे पर सुवर्ण और नाग, तीसरे पर बुद्ध मूर्ति और चौथे पर मोर । पगड़ी का ऊपरी सिरा पंखे जैसा होता था, और फेंटे खूब सजी हुई। एक पगड़ी में गरुड़ मूर्तियों से सज्जित एक पट्टी है जिसके बंद हवा में पीछे फड़फड़ाते दिखाये गये हैं ।
c4.95
पगड़ियों के निम्न लिखित रूप हैं—तश्करदार पगड़ी, हलकी पगड़ी, त्रिकोण अलंकार से सज्जित हलकी पगड़ी, चपटाकार हलकी पगड़ी, शीर्षपट्ट युक्त भारी पगड़ी ।
c4.96
श्रेष्ठि गण धोती उत्तरीय और चादर पहनते थे । सरदी में कंचुक पहनने की प्रथा थी। कभी-कभी इसमें तुक मेक के लिए पट्टी होती थी। एक दाता कंचुक, बेकक्ष्य और फुंदनेदार टोपी पहने है। समूरो अस्तर वाला चुगा भी कभी-कभी पहिना जाता था ।
c4.97
गंधार की मूर्तियों में सिपाही दो तरह के कपड़े पहनते थे। एक तरह के सिपाही धोती, पेटी और बेकक्ष्य पहनते थे । उनके बाल खुले अथवा पगड़ी से ढंके होते थे। दूसरी तरह के सिपाही लोह बख्तर पगड़ियां कमरबन्द और परतले पहनते थे । कभी-कभी सिपाही जांघिया भी पहनते थे ।
c4.98
शिकारी केवल धोती पहने दिखाये गये हैं। खेतिहर एक छोटी धोती और मजदूर लंगोट पहनते थे। पहलवान लंगोट अथवा जांघिया पहनते थे । ब्राह्मण धोती और चादर पहनते थे ।
c4.99
विदेशियों की टोपियां निम्न लिखित प्रकार की होती थीं—गोटदार कुलाहनुमा टोपी, अर्धचंद्र से अलंकृत फूंदनेदार टोपी, सफर मुट्ठी के रूप की चोटी सहित टोपी, कटे किनारे वाली टोपी या खाँच ।
c4.100
स्त्रियों की वेश-भूषा में तीन कपड़े, यथा कंचुक, साड़ी और दुपट्टा चादर, होते थे। कभी-कभी चादर का कोना कमर में खोंस लिया जाता था । स्त्रियों के कंचुक प्रायः घुटने तक पहुंचते थे। कभी-कभी वे आगे खुले भी रहते थे और तब यह कोटनमा दिखते थे । एक दूसरी तरह का कोट नाभि को ढंकता दिखलाया गया है । कंचुक साड़ी के नीचे अथवा ऊपर पहने जाते थे । कसे कंचुक पर प्रायः सिलवटें पड़ती थीं। स्त्रियां कभी कभी स्तन पट्ट भी पहनतीं थीं ।
c4.101
साड़ियां दो प्रकार से पहनी जाती थीं। एक में एक हिस्सा कमर में लपेट लिया जाता था और दूसरा पीछे खोंस लिया जाता था, दूसरी में साड़ी का एक सिरा कंधे पर डाल लिया जाता था । कभी कभी साड़ी काफी बड़ी होती थी और उसका छुट्टा भाग आगे अथवा पीछे लटका रहता था । कभी-कभी साड़ी का छुट्टा सिरा बायें कंधे पर योजक से बांध दिया जाता था, कभी-कभी साड़ी का छुट्टा सिरा दाहिने स्तन को अनावृत रखते हुए कंधे पर डाल दिया जाता था, ढीली तौर से साड़ी पहनने में बांयीं छाती खुली रह जाती थी, दुपट्टा या चादर का एक छोर कमरबंद में खोंस लिया जाता था। स्त्रियां अक्सर अपने जूड़े झेबर्रों से सजाती थीं, पर कभी कभी मुकुट भी पहनतीं थीं ।
c4.102
यवनियां भारतीय और यूनानी दोनों तरह की पोशाकें पहनतीं थीं। यूनानी पोशाक में कंचुक, घाघरा और कमरबंद होते हैं। सिर पर टोपियां होती हैं । भारतीय अंगरक्षिकाएं साड़ी, कमरबंद और चादर पहनती हैं ।
c4.103
मथुरा की मूर्तियों से हमें विदेशियों तथा मध्य देश के निवासियों की वेश-भूषाओं का पता चलता है। भारतीय प्रायः सकच्छ लंबी धोती, दोनों कंधों पर पड़ा दुपट्टा और पगड़ियां और पटके पहनते थे । कभी-कभी कमरबंद भी वेश-भूषा का अंग होता था । कभी-कभी कमरबंद रस्सी की तरह बटा होता था । दुपट्टों और कमरबंदों के पहनने के और भी बहुत से ढंग बतलाये गये हैं । घुड़सवार कई फेंटों से बंधी जांघिया पहनते थे ।
c4.104
पगड़ी प्रायः सादे कपड़े की बनी होती थी और जूड़े के चारों ओर लपेट ली जाती थी । रईस शीर्षपट्ट युक्त कामदार पगड़ियां पहनते थे। कभी कभी शीर्षपट्ट थपकनदार होता था और कभी-कभी धातु की एक पट्टी से युक्त । कभी-कभी शीर्षपट्ट में कलंगी लगती थी ।
c4.105
विदेशी राजे और सिपाही कंचुक, शलवार, टोपी और जूते पहनते थे । कनिष्क की बेसिर वाली मूर्ति घुटने के नीचे तक पहुंचता कंचुक, चुगा और तस्मेदार बूट पहने है । एक शक राज की मूर्ति अलंकृत वस्त्र का बना गोटदार कंचुक और पूरे बूट पहने हैं । एक तीसरी मूर्ति गोटदार कंचुक और कमरपेटी पहने दिखायी गयी है। सूर्य की एक मूर्ति गोटदार चुस्त कंचुक, कमरबंद और कारचोबी टोपी पहने है। एक ईरानी की मूर्ति खूब कामदार कंचुक, पीठ पर लहराता रुमाल और चंद्र सूर्य के आकारों से अलंकृत कुलाहनुमा टोपी पहने है ।
c4.106
ईरानी और शक टोपियां पहनते थे । टोपियां निम्न लिखित तरहों की होती थीं—दो टुकड़े नमदों से बनी कुलाहनुमा टोपी, बल खायी हुई कुलाहनुमा टोपी, अर्धचंद्र युक्त टोपी, ढिल्लीवाल पगड़ी नुमा टोपी, चपटी छत वाली सजी हुई टोपी ।
c4.107
स्त्रियां करधनी से युक्त साड़ी और तहदार दुपट्टे पहनतीं थीं, कमरबंद में दोनों ओर फांदे पड़ते थे। कभी-कभी कमरबंद का लम्बेदार सिरा आगे लटकता हुआ छोड़ दिया जाता था, कभी-कभी दोहरे कमरबंद का निचला भाग साड़ी में खोस लिया जाता था, कहीं-कहीं कमरबंद का एक सिरा हाथ में ले लिया जाता था । पटके भी पहने जाते थे।
c4.108
कभी-कभी लंहगा भी पहना जाता था, पर कुषाणयुग की वेश-भूषा म यह अपवाद स्वरूप है। मथुरा की मूर्तियों में एक ग्वालिन की मूर्ति लंहगा पहने है । लंहगा कमर पर सीधा है और निचले भाग में केवल एक घेर पड़ता है ।
c4.109
विदेशी स्त्रियां कंचुक पहनती थीं । कंचुक का निचला भाग चूननदार होता था । कुछ स्त्रियां कंचुक के ऊपर साड़ी भी पहिनतीं थीं। कभी कभी ईरानी स्त्रियां खूब कामदार कंचुक पहनतीं थीं।
c4.110
स्त्रियां प्रायः सिर नहीं ढकतीं थीं, पर कभी-कभी ओढ़नी ओढ़ी जाती थी । कभी-कभी स्त्रियां लीलावश अपने शिरोवस्त्र पगड़ी की तरह बांध लेतीं थीं ।
c4.111
इस युग में दक्षिण भारत के लोग, जैसा कि अमरावती इत्यादि के अर्ध चित्रों से पता चलता है । सकच्छ लंबी धोती पहनते थे। धोती कभी-कभी घुटनों तक और लांग सहित होती थी । कमरबंद बांधने की अनेक कलात्मक रीतियां थीं । नाचते समय कमरबंद की मोर मुरक से नर्तक के सादे पहरावे में एक गति आ जाती थी ।
c4.112
उत्तरीय पहनने की अनेक रीतियां थीं । कभी-कभी छाती पर दुपट्टा परतले की तरह पहना जाता था। और कभी-कभी वह कंधों पर डाल लिया जाता था ।
c4.113
शीर्षपट्ट युक्त पगड़ियां दो तीन सादे फेंटोंमें बांध ली जाती थीं। पगड़ियों के निम्न लिखित बहुत से प्रकार मिलते हैं, यथा अटपटी पगड़ी, मोरपंख युक्त चक्करदार पगड़ी, कुंडेदार शीर्षानूषन युक्त पगड़ी, छल्लेदार पगड़ी, सरपेंच युक्त छोटी गोल पगड़ी, तीन कुच्चेवाली पगड़ी, दोहरी पट्टी वाले आभूषण से सज्जित नीची पगड़ी, शीर्षपट्ट युक्त तीन फेंटे की पगड़ी, चौरीदार अटपटी पगड़ी, फिरकीनूमा आभूषण युक्त अटपटी पगड़ी, अनेक लट्टुओं वाली पगड़ी, गोल पेंचदार पगड़ी, दिल्लीवाल पगड़ी जैसी पगड़ी और चक्करदार ऊंची पगड़ी, इत्यादि ।
c4.114
दक्षिण भारत में झब्बेदार धातु निर्मित टोपियां भी पहनी जाती थीं । टोपियों के निम्नलिखित प्रकार मिलते हैं यथा मोरपंख और पत्राकार आभूषण से सजी टोपी, चायदानी के ढक्कन के शकल की टोपी, चपकी टोपी जिसका छज्जा ऊपर मुड़ा है, लहरियेदार छज्जे वाली टोपी, कंटोप और शीर्षपट्ट युक्त टोपी। कोई-कोई अपने सिर और कान रूमाल से ढाकते थे।
c4.115
साधारणः इस युग में दक्षिणी सिले वस्त्र नहीं पहनते थे; पर सेवक, गायक, वादक, और विदेशी इस नियम के अपवाद थे । कंचुक के साथ कंटोप और धोती पहनो अथवा पगड़ी, दुपट्टा और धोती पहनी जाती थी। शरीर के साथ कंचुक कमरबंद से बांध दिया जाता था। कभी-कभी ढीले बांह का कंचुक टोपी और चूड़ीदार पाजामें के साथ पहना जाता था। पालकी उठाने वाले कहार बांहदार या बिना बांह के कंचुक पहनते थे । एक साईस अंग्रेजी टेल कोट नुमा कंचुक पहने है । ग्वाले जांघिया पहनते थे ।
c4.116
दक्षिणी स्त्रियां पैर तक पहुंचती करधनी और कमरबंद से युक्त साड़ियां पहनती थीं। कभी-कभी साड़ी पर करधनी, कमरबंद और पटका होता था और सिर पर पगड़ीनुमा वस्त्र । कभी-कभी स्त्रियां दुपट्टा या चांवर हाथ में ले लेतीं थीं। स्त्रियां कभी-कभी पगड़ी और मुकुट भी पहन लेतीं थीं। पगड़ियां और मुकुट निम्न लिखित प्रकार के होते थे, झालरदार शीर्षपट्ट से युक्त चक्करदार पगड़ी, सोंगनुमा केशवेश के ऊपर बंधी पगड़ी, मकराकृत मुकुट, पूरे मकर की आकृति वाला मुकुट, कलंगी युक्त चक्करदार मुकुट, छोटा मुकुट और लहरियादार मुकुट । ओढ़नी ओढ़े केवल एक स्त्री दिखलायी गयी है।
c4.117
ब्राह्मण साधु पटकेदार कोपीन और दुपट्टा पहनते थे। बौद्ध भिक्षु कभी-कभी पांसु दुकूल पहनते थे।
c4.118
सिपाही कंचुक, कमरबंद और धोती पहनते थे।
c4.119
बच्चे जांघिया और कमरबंद पहनते थे । कभी-कभी वे छन्नवीर और पेट पर कस कर बंधा रूमाल पहनते थे।
c4.120
प्राक् गुप्तयुग में हमें भारतीय वेश-भूषा का कम मसाला मिलता है । मथुरा से मिली इस युग की कुछ मूर्तियां तथा पर्वाय के अर्ध चित्रों के बल पर हम उत्तर भारत की वेश-भूषा का पता पाते हैं। दक्षिण भारत की वेश-भूषा का गोल्ली के अर्ध चित्रों में अच्छा प्रदर्शन है। खास गुप्त युग की वेश-भूषा के इतिहास की सामग्री हमें सारनाथ, देवगढ़, मंदोर इत्यादि से मिली मूर्तियों और अजंटा के १७ नं० की लेण के भित्ति चित्रों में मिलती है । अजंटा की लेणें गुप्त-साम्राज्य में नहीं थीं, पर गुप्तयुग की कला स्थानिक न होकर देश के कोने-कोने में फैल चुकी थी और इस दृष्टि से अजंठा की कला को गुप्त कला के अन्तरगत मानना ठीक ही है । गुप्त सिक्कों पर अंकित प्रतिकृतियों से भी तत्कालीन वेश-भूषा पर काफी प्रकाश पड़ता है। इनसे पता लगता है कि गुप्तयुग के आरंभ में राजां की वेश-भूषा शकों जैसी थी, गो कि वे कभी-कभी भारतीय वस्त्र भी पहनते थे, लेकिन इस युग के अंत में उनका पहिरावा पूर्ण भारतीय बन गया। रानियां कंचुक और साड़ियां पहनतीं थीं। सिक्कों पर आये वस्त्रों के सूक्ष्म अध्ययन से यह भी पता लगता है कि गुप्त-युग में भद्दे शक वस्त्रों में आकर्षण लाकर उन्हें भारतीय बाना दे दिया गया ।
c4.121
समुद्रगुप्त (३३५-३८५ ई० पू०), चंद्रगुप्त द्वितीय (३८५-४१५) और कुमारगुप्त (४१४-४५५) में साम्राज्य के बढ़ने के साथ ही कला और साहित्य की अभूतपूर्व उन्नति हुई । गुप्तयुग सांस्कृतिक दृष्टिकोण से भारतीय इतिहास का स्वर्णयुग माना जाता है । महाकवि कालिदास ने इसी युग में अमर काव्यों और नाटकों की रचना की। भौतिक संस्कृति भी किसी से पीछे न रही। अजंटा के भित्ति चित्रों और पुरातत्व के अवशेषों से हम उस युग की संस्कृति का पूरा खांका खींच सकते हैं। कपड़े पहनने का लोगों को इतना शौक था कि प्रसाधन के लिए संस्कृत साहित्य में अनेक शब्द आये हैं।
c4.122
गुप्तयुग में प्रायः नौकर-चाकर सिले वस्त्र पहने दिखलाये गये हैं। इससे यह न समझ लेना चाहिए कि वे सब विदेशी थे । लगता है कुषाणयुग में राज दरबार की प्रथा के अनुसार दास-दासियां भी सिले कपड़े पहनने लगे और वही प्रथा गुप्तकाल में भी प्रचलित रही। इस युग में विदेशों से भी दास-दासियों के आने का जैन साहित्य में उल्लेख है जिससे पता लगता है कि अफ्रिका, अरब, ईरान, यूनान, मध्य एशिया इत्यादि से दासियां इस देश में आती थीं और वे अपने जातीय पहरावे पहनतीं थीं। लगता है राजमहल के अंदर रहने वाली दासियों के पहरावे का प्रभाव दूसरों पर भी पड़ा होगा। पर गुप्तयुग में विदेशी व्यापा- स्त्रियों और सिपाहियों के सिले वस्त्रों का प्रभाव भी पड़ा । समन्वय के इस युग की एक विशेषता है कि विदेशी वस्त्रों के ग्रहण करते हुए भी उन्हें भारतीयता के सांचे में ढाला गया ।
c4.123
इस युग में सिपाहियों की वर्दी भी दो तरह की थी। एक वर्दी में तो सिपाही धोती दुपट्टा पहनते थे और दूसरी में कंचुक ओर जांघिया । लगता है कि दूसरी वर्दी की लड़ाई में उपयोगिता देख कर गुप्तों ने उसे शकों और हूणों से ग्रहण किया ।
c4.124
गुप्तयुग में बहुत तरह के महीन, छपे हुए और नक्काशीदार कपड़े बनते थे जिनमें चारखाने, डोरिये, हंस मिथुन इत्यादि मुख्य थे। अभाग्यवश इस युग के साहित्य में कपड़ों के छिटपुट वर्णन आये हैं; पर बाण-भट्ट की कादंबरी और हर्षचरित से तथा जैन छेद सूत्रों से तत्कालीन कपड़ों के वर्णन मिल जाते हैं। वस्त्र चार विभागों में बंटे थे यथा वल्कल, फल, कोशेय और रांकव । रांकव पश्मीना था, जो पामीर के प्रदेश से आता था।
c4.125
जैन साहित्य में कपड़ों की निम्नलिखित तालिका आई है—भंगिय (भंगेला), जंगिय (ऊंट के बाल से बना कपड़ा), पोत्तग (ताड़ के पत्तों से बना कपड़ा), खोम, तूल कड (सेमल की रुई से बना वस्त्र), आइणग (चमड़े के बने वस्त्र), सहिण (महीन कपड़े), महिण कल्लण (रंगीन और नक्काशीदार कपड़े), आजक (बकरे के रोएं से बने कपड़े), काय (नीली रूई के सूत से बने कपड़े), दूकूल (दुकूल वृक्ष की छाल के रेशे से बने कपड़े), हंस दुकूल (हंसाकृतियों से अलंकृत महीन दुकूल), पट्टू (रेशमी वस्त्र) जिसके बहुत से भेद होते थे यथा मलय अंशुक, चीनांशुक, हमिराज और सुवर्ण; पमोणं (शायद जंगली रेशम), देसराग (जाटों के देश का रंगीन कपड़ा ), अमिला (कलफदार कपड़ा), गज्जफल (कड़कड़ाता कपड़ा), फालिय (पारदर्शी कपड़ा), कोयव (रोयेंदार कंबल), कंबल (ऊनी चादर), पावर (चादर) इत्यादि ।
c4.126
शाल और चादरें निम्न लिखित भांति की होती थीं—उद्द (ऊद बिलाव के चमड़े के बने रूमाल), पेस (सुईकारी के कामवाला शाल), पेसल (पश्मीने की चादर), नीला आइणग (नीलगाय के चमड़े से बना ओढ़ना), गोरभिगाइणग (एक सफेद पशु के चमड़े से बनी चादर), कणग (सुनहरे काम की चादर), कणगकंतिय (सोने के भरपूर काम वाली चादर), कणगपट्ट (पूरी कलाबत्तू से विनी चादर), कणगखचित (जरदोज़ी के काम की चादर), कणगफूसिय (थोड़े सुनहले काम की चादर), कणगपक्क (सुनहरे किनारे वाली चादर), कणगफुल्लिय (जिसके फूल कलाबत्तू से कढ़े हों), ऊंट, बाघ और चीतों की खालों से बने प्रावार, आभरण (पत्तों की नक्काशी वाली चादर), आभरण-विचित (भरी नक्काशीदार चादर), मसंग (पश्मीना), तिरोटपट्ट (तिरोट वृक्ष की छाल के रेशे से बने महीन कपड़े), बद्धस (टसर), इत्यादि । इनके सिवाय रल्लक (एक तरह का कंबल) और शांणक (सणी कपड़ा ) के नाम भी आये हैं।
c4.127
इस युग के सूती कपड़ों का कम उल्लेख आया है । इसका कारण यह हो सकता है कि सूती कपड़े इतने प्रचलित थे कि उनके वर्णन की आवश्यकता नहीं समझी गयी, फिर भी उपरोक्त तालिका में गज्जफल और फालिक शायद सूती वस्त्र थे ।
c4.128
अमर कोश में कपड़े बुनने की क्रिया का उल्लेख है। करघे से तुरन्त उतरे कपड़े को निष्प्रवाणि, बिना कुंदी किये कपड़े को अनाहत, और करघे पर चढ़े कपड़े को तंत्रक कहते थे । कपड़े के किनारे को दशा या वलति, लंबाई को दैर्ध्य, आयाम और आरोह और पनहे को परिणाह और विशालता कहते थे । साधारणतः बहुमूल्य कपड़ों के लिए सुचेलक और पट और मामूली कपड़ों के लिए वराकि और स्थूलशाटक शब्द आये हैं। कपड़े धोने के लिए पहले वे सज्जीखार के घोल में डाल दिये जाते थे और बाद में उबाल कर साफ पानी में धो लिये जाते थे ।
c4.129
गुप्तयुग के साहित्य में कपड़े बुनने के प्रसिद्ध स्थलों के नाम आये हैं । मधुरा की डोरिया प्रसिद्ध थी। लाट देश से आकर मंदसोर में बसे पट्टवाय बहुत ही कोमल रंग बिरंगे और नक्काशोदार रेशमी कपड़े बिनते थे । आसाम के रेशमी कपड़ों में जाती पट्टिका (चमेली के फूलों से अलंकृत मूंगा) और कोमल चित्रपट मुख्य थे । पौंडू (उत्तर बंगाल) के धोती दुपट्टे प्रख्यात थे । गुजरात की बांधणी या चूँदरी को पुल्कबंध कहते थे । कोट्टम्ब (आधुनिक पठान कोट), ताम्रलिप्ति (आधुनिक तामलुक) और सिधु कपड़े बुनने के बड़े केन्द्र थे । शायद पुष्पपट्ट (किखाब) काशी में बुने जाते थे ।
c4.130
विवाह के अवसर पर धनिक वर्ग और राजे महराजे दहेज में तरह-तरह के कीमती कपड़े देते थे । राज्यश्री के विवाह अवसर पर राज महल में अनेक तरह के कपड़े दहेज में देने के लिए सजाये गये थे जिनमें क्षौम, बादर (सूती कपड़े), दुकूल, लालातंतुक (बहुत महीन रेशमी कपड़ा) और नेत्र (एक तरह का रेशमी कपड़ा) मुख्य थे ।
c4.131
इस युग में सर्व साधारण जन धोती दुपट्टा पहनते थे । धोती के लिए चार शब्द यथा अंतरीय, उपसंस्थान, परिधान और अधोंशुक आये हैं और चादर के लिए प्रावार, उत्तरसंग, बृहत्तिका, संव्यान और उत्तरीय । कूर्पासक एक मिर्जई अथवा चोली की तरह कोई वस्त्र था । आधी जांघ तक की घघरी को चंडातक कहते थे । जाड़े में पहरे जाने वाले लबादे को नौशार और पैर तक लटकते अंगें को प्रपदीन ।
c4.132
इस युग में स्त्रियां साड़ी, चादर और कंचुक पहनती थीं । कभी-कभी वे रंग बिरंगे कंचुक और चंडातक पहनती थीं । साड़ियां कभी-कभी पुष्पों और चिड़ियों की नक्काशी से सजी होती थीं। स्त्रियां बहुधा मौसम के अनुकूल कपड़े पहनती थीं। गरमी में हलकी दुकूल की साड़ी और वसंत में केसरिया साड़ी और लाल स्तनपट्ट पहनने के उल्लेख हैं ।
c4.133
राजे सादे पर सजीले कपड़े पहनते थे । रेशमी धोती, सितारे टंके हुए दुपट्टे, तथा हंसदुकूल वे अक्सर पहनते थे । उच्चवर्ग के लोग भी अपनी मान मर्यादा के अनुकूल कपड़े पहनते थे ।
First 133 of 184 passages. Read on
Linked texts (14)
- Jātaka — Pāli
- Kauṭilīya Arthaśāstra — Kauṭilya, Sanskrit
- Āśvalāyanaśrautasūtra — Āśvalāyana, Sanskrit
- Harṣacarita — Bāṇabhaṭṭa, Sanskrit
- Tibetan translation ('Chi med mdzod) — Classical Tibetan
- Kādambarī — Bāṇabhaṭṭa, Sanskrit
- Mahābhārata — Vyāsa, Sanskrit
- Rāyapaseṇaijja — Ardhamāgadhī Prakrit
- Atharvavedasaṃhitā — Atharvan & Aṅgiras, Sanskrit
- Kauśāmbī
- Sāñcī
- Bagh
- Bhâjâ
- Ajanta