Pracin Bharatiya Veshabhusha c4.32
Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c4.32
- Language
- Hindi
c4.32
चांदनी, मेजपोश, परदे इत्यादि भी सादे अथवा ऊनी होते थे । गोणक बकरे के बाल से बने आस्तरण होते थे । लगता है यह कपड़ा ईरान से आता था जहां इसे कौनकेस कहते थे । ईरान में बना कौनकेस बाबुल भी जाता था जहां इसे लोग अधोवस्त्र की तरह पहनते थे । चित्तक ऊनी पट्टियों को सींकर बना कालीन होता था । सफेद कालीन को पतिका कहते थे तथा फूलदार कालीन का नाम पटलिका था । रजाई को तूलिका कहते थे । सिंह, व्याघ्र इत्यादि के चित्रों से अलंकृत कालीन विकटिका थी। ऊद बिलाव की खालों से कंबल बनते थे । रूखे रोयें वाले कंबल एकंतलोमी कहे जाते थे । कट्टिस नाम के आस्तरण में जवाहर जड़े होते थे । कोसेय्य रेशमी कालीन को और कुत्तक बड़े भारी कालीन को कहते थे। हाथी, घोड़ों और रथों के लिए भी आस्तरण होते थे। मृगचर्म साट कर कंबल बनते थे। कदली मृग के समूरों से भी आस्तरण बनते थे । चिर्रिमिका चांदनी थी। बाहीतिक १६ हाथ लंबी और ८ हाथ चौड़ी ऊनी चादर थी। नमतक नमदा था और कोजव लंबे रोयें वाला कंबल।