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Pracin Bharatiya Veshabhusha c5.2

Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c5.2

Language
Hindi

c5.2

ऐतिहासिक अनुश्रुतियों के आधार पर तो हमारी सभ्यता सनातन है, और अधिकतर भारतीयों का विश्वास भी ऐसा ही है। पर किसी सभ्यता का इतिहास केवल अनुश्रुति गत कल्पनाओं को ही लेकर नहीं लिखा जा सकता। आजकल का वैज्ञानिक युग सत्य तो उसे ही मानता है जो दृश्य है और जिसकी सत्ता वैज्ञानिक आधारों पर साबित की जा सकती है। केवल आज से पचीस तीस वर्ष पहिले पुरातत्व शास्त्री भारतीय सभ्यता के इतिहास का आरंभ वैदिक युग यानी १५०० ई० पू० या अधिक से अधिक २००० ई० पू० से करते थे। वैदिक आर्यों के पूर्व इस देश में एक सभ्यता थी, यह तो विद्वान मानते थे पर उसका ठीक ठीक रूप क्या था इसका निश्चय बिना पुरातत्व के सहारे करना कठिन था। युरोपीय विद्वानों को तो दृढ़ विश्वास हो चुका था कि भारतीय इतिहास का आरंभ करीब १५०० ई० पू० से ही होता है और इसके पहिले शायद एक द्रविड़ सभ्यता इस देश में थी पर उसकी संस्कृति आर्य संस्कृति से काफी कमजोर थी। द्रविड़ एक तरह से जंगली थे और उनके धार्मिक विश्वास अर्थात नाग, वृक्ष पूजा इत्यादि भी उनके जंगलीपन के सबूत हैं। इस विश्वास की मजबूती का अन्दाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वेदों में या बौद्ध और पौराणिक साहित्यों में अगर भारत का किसी ऐसे देश से संबंध का जिक्र है जिसकी ऐतिहासिक स्थापना से भारतीय सभ्यता का इतिहास १५०० ई० पू० के कुछ आगे बढ़ सकता हो तो विद्वानों में एक तरह की खलबली मच जाती थी और वे इन ऐतिहासिक स्थापनाओं का खंडन कर के यह दिखलाने का प्रयत्न करते थे कि भारतीय साहित्य में यह अवतरण बाद के हैं। उदाहरण के लिए बावेरु जातक (जातक ३३९) में बाबुल देश को भारत से मयूर पक्षी जाने का उल्लेख है, जिससे पता चलता है कि इस देश से बाबुल का संबंध काफी प्राचीन समय से था१। इस संदर्भ को लेकर विद्वानों में काफी बहस छिड़ पड़ी। पालि बावेरु प्राचीन ईरानी हखामनी बादशाहों के अभिलेखों में आये बबिरु का रूपान्तर माना गया और इस आधार पर इस मत की स्थापना हुई कि फारस की खाड़ी के देशों से और भारतवर्ष से ई० पू० पांचवीं से सातवीं सदी तक व्यापारिक संबंध था। लेकिन इस स्थापना को विद्वानों ने एक स्वर से स्वीकार नहीं किया। श्री हलेवी का तो यह दृढ़ मत था कि यह उद्धरण ई० पू० दूसरी शताब्दी के पहिले का नहीं हो सकता लेकिन इस संबंध में श्री हलेवी इस बात की मीमांसा करना भूल गये कि जातककार ने अगर अपनी कथा ई० पू० पहली