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Pracin Bharatiya Veshabhusha c5: प्रथम अध्याय : प्रागैतिहासिक युग में भारतीय वेश-भूषा—मोहेनजोदड़ो और हड़प्पा

Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c5

Language
Hindi

Contents

प्रथम अध्याय : प्रागैतिहासिक युग में भारतीय वेश-भूषा—मोहेनजोदड़ो और हड़प्पा

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प्रागैतिहासिक युग में भारतीय वेश-भूषा—मोहेनजोदड़ो और हड़प्पा

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ऐतिहासिक अनुश्रुतियों के आधार पर तो हमारी सभ्यता सनातन है, और अधिकतर भारतीयों का विश्वास भी ऐसा ही है। पर किसी सभ्यता का इतिहास केवल अनुश्रुति गत कल्पनाओं को ही लेकर नहीं लिखा जा सकता। आजकल का वैज्ञानिक युग सत्य तो उसे ही मानता है जो दृश्य है और जिसकी सत्ता वैज्ञानिक आधारों पर साबित की जा सकती है। केवल आज से पचीस तीस वर्ष पहिले पुरातत्व शास्त्री भारतीय सभ्यता के इतिहास का आरंभ वैदिक युग यानी १५०० ई० पू० या अधिक से अधिक २००० ई० पू० से करते थे। वैदिक आर्यों के पूर्व इस देश में एक सभ्यता थी, यह तो विद्वान मानते थे पर उसका ठीक ठीक रूप क्या था इसका निश्चय बिना पुरातत्व के सहारे करना कठिन था। युरोपीय विद्वानों को तो दृढ़ विश्वास हो चुका था कि भारतीय इतिहास का आरंभ करीब १५०० ई० पू० से ही होता है और इसके पहिले शायद एक द्रविड़ सभ्यता इस देश में थी पर उसकी संस्कृति आर्य संस्कृति से काफी कमजोर थी। द्रविड़ एक तरह से जंगली थे और उनके धार्मिक विश्वास अर्थात नाग, वृक्ष पूजा इत्यादि भी उनके जंगलीपन के सबूत हैं। इस विश्वास की मजबूती का अन्दाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वेदों में या बौद्ध और पौराणिक साहित्यों में अगर भारत का किसी ऐसे देश से संबंध का जिक्र है जिसकी ऐतिहासिक स्थापना से भारतीय सभ्यता का इतिहास १५०० ई० पू० के कुछ आगे बढ़ सकता हो तो विद्वानों में एक तरह की खलबली मच जाती थी और वे इन ऐतिहासिक स्थापनाओं का खंडन कर के यह दिखलाने का प्रयत्न करते थे कि भारतीय साहित्य में यह अवतरण बाद के हैं। उदाहरण के लिए बावेरु जातक (जातक ३३९) में बाबुल देश को भारत से मयूर पक्षी जाने का उल्लेख है, जिससे पता चलता है कि इस देश से बाबुल का संबंध काफी प्राचीन समय से था१। इस संदर्भ को लेकर विद्वानों में काफी बहस छिड़ पड़ी। पालि बावेरु प्राचीन ईरानी हखामनी बादशाहों के अभिलेखों में आये बबिरु का रूपान्तर माना गया और इस आधार पर इस मत की स्थापना हुई कि फारस की खाड़ी के देशों से और भारतवर्ष से ई० पू० पांचवीं से सातवीं सदी तक व्यापारिक संबंध था। लेकिन इस स्थापना को विद्वानों ने एक स्वर से स्वीकार नहीं किया। श्री हलेवी का तो यह दृढ़ मत था कि यह उद्धरण ई० पू० दूसरी शताब्दी के पहिले का नहीं हो सकता लेकिन इस संबंध में श्री हलेवी इस बात की मीमांसा करना भूल गये कि जातककार ने अगर अपनी कथा ई० पू० पहली

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१ सिलवाँ लेवी, ओतूर दु बावेरु—जातक, पृ० २८४ आगे, मेमोरियल सिलवाँ लेवी, पेरिस, १६३७

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या दूसरी शताब्दी में लिखा तो उसने बाबुल का ग्रीक नाम जो सिकंदर के समय से चल चुका था क्यों न देकर उसके पहले चलने वाले ईरानी नाम का क्यों प्रयोग किया। इन सब तर्कों से यह पता चलता है कि पश्चिमी पुरातत्त्ववेत्ता और भाषाशास्त्री भारतीय सभ्यता को मिश्र और बाबुल की प्राचीन सभ्यताओं की कोटि में नहीं आने देना चाहते थे। इस बात से उनका पक्षपात तो साबित होता है पर प्रमाणाभाव से हम उनकी विधिवत युक्तियों के खंडन में प्रायः असमर्थ थे । लेकिन उनका मत कुछ दिनों तक ही चल सका। १९२२ ई० में मोहेन-जोदड़ो के एक बौद्धस्तूप की खुदाई करते हुए श्री राखालदास बेनर्जी को सिंधु-घाटी की प्रागैतिहासिक सभ्यता का पता चला। मोहेनजोदड़ो और हड़प्पा की खुदाई जैसे जैसे आगे बढ़ती गयी वैसे वैसे भारतीय सभ्यता की प्राचीनता के ठोस सबूत मिलते गये और पुरातत्त्ववेत्ताओं ने एक स्वर से इस बात को स्वीकार कर लिया कि भारतीय सभ्यता प्राचीनता में सुमेर और मिश्र की सभ्यताओं से न केवल टक्कर ही लेती है वरन कुछ बातों में जैसे नगर रचना में तो उनसे भी आगे बढ़ जाती है।

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इस सिंधुघाटी की प्रागैतिहासिक सभ्यता के जो कुछ भी अवशेष मिले हैं उनसे पता चलता है कि यह सभ्यता वैदिक सभ्यता से कहीं आगे बढ़ी हुई थी। सिंधुसभ्यता ३००० ई० पू० या ४००० वर्ष पूर्व फूल फल रही थी और इसमें वैदिक आर्यों की सभ्यता का कोई लेश नहीं मिलता। इस सभ्यता का संबंध सुमेर, अक्काड और एलम से भी था और अफगानिस्तान, कश्मीर और सुदूर दक्षिण से भी। उस प्राचीन काल में भी सिंधुघाटी की सभ्यता काफी आगे बढ़ी हुई थी। बड़े बड़े शहरों में लोग रहते थे । गेहूँ और जौ की खेती होती थी और लोग बैल, भैंसे, भेड़ें, सूअर, कुत्ते तथा हाथी पालते थे । सवारी के लिए वे पहियेदार गाड़ियों का व्यवहार करते थे। वे धातुओं के सामान और औजार बना सकते थे। लड़ाई और शिकार में वे धनुष बाण, भाले, कुल्हाड़ियाँ, छुरे तथा गदा व्यवहार में लाते थे । उनके घरेलू मिट्टी के बरतन चाक पर चढ़े होते थे और अक्सर उन पर अलंकार बने होते थे। समृद्धजन प्रसाधन के लिए सोने, ताँबे, कच्चे शीशे, हाथीदांत और अकीक इत्यादि की मणियों से बने गहने पहनते थे, गरीब मिट्टी तथा शंख के बने गहनों ही पर संतोष करते थे । लेखन कला से भी वे अवगत थे । सभ्यता के इतने आगे बढ़ने पर भी सिंधु सभ्यता में वस्त्र काफी सादे होते थे । साधारणतः लोग लंगोटी या तहमत पहनते थे। बहुधा लोग नंगे भी रहते थे । कभी कभी चादर से छाती ढंकी होती थी। बाल बहुधा फीतों से बंधे रहते थे। स्त्रियों के शिरोवस्त्र कभी कभी पंखे के आकार के होते थे ।

मोहेनजोदड़ो में कताई के साधन

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मोहेनजोदड़ो से बहुत सी तकुओं की फिरकियां मिली हैं जिनसे पता लगता है कि अमीर गरीब सब सूत कातते थे । गरम कपड़े ऊन से बनते थे और हलके कपड़े सूती होते

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थे। मोहेनजोदड़ो से मिले हुए एक चांदी के पात्र में चिपके वस्त्र के कुछ टुकड़ों के वैज्ञानिक अनुसंधान से इस बात का पता चला कि इन टुकड़ों में सूत उस साधारण कपास का है जो आज दिन बहुतायत से भारतवर्ष में होती है। सर जान मार्शल का कहना है कि इस खोज से अब यह बात पुष्ट हो जाती है कि बाबुली भाषा में सिंधु और ग्रीक भाषा में सिडोन (Sindon) जिनका अर्थ कपड़ा होता है सेंबल रूई के सूत के न हो कर कपास के होते थे२ ।

सिंधु सभ्यता में पहनने के कपड़े

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सूती वस्त्र खंड के मिलने से यह विचार स्वाभाविक ही है कि मोहेनजोदड़ो में भांति भांति के वस्त्र पहने जाते रहे होंगे लेकिन वस्त्रों के इतिहास के सम्बन्ध में जो कुछ भी सामग्री हमें मोहेनजोदड़ो और हड़प्पा से मिली है उससे हमारी वह धारणा गलत सिद्ध होती है । एक मनुष्य मूर्ति एक लंबी चादर पहने हुए है (चि० १-२ ) यह चादर छाती ढकती हुई बाएं कंधे पर डाल दी गई है, बांयां हाथ खाली है । यह चादर काफी लंबी होती थी और बैठने पर पैरों तक पहुंच जाती थी। पत्थर की एक दूसरी मूर्ति एक तहमत नुमा कपड़ा पहने हुए है ३ । बाएं कंधे के नीचे एक अनिर्धारित रेखा से शायद चादर का तात्पर्य हो। अगर हमारा अनुमान ठीक है तो चादर दाहिने कंधे को ढकती थी। लेकिन चादर पहिनने का यह ढंग अनियमित सा है क्योंकि अब तक मिली हुई मूर्तियों में चादर बांयें कंधे को ही ढांकती हुई दिखलायी गयी है; उनका दाहिना कंधा हमेशा खुला हुआ होता है ।

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२ मार्शल, मोहेनजोदड़ो एंड इंडस वेली सिविलाइजेशन १, पृ० ३३, प्लेट ९८

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३ मेके, फरदर एक्सकेवेशंस एट मोहेनजोदड़ो, भा० १, पृ० २५७; भा० २, प्ले० १०५, सं० ६०-६१

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यह कहना तो कठिन है कि आदमी चादर के नीचे धोती, लंगोटी या तहमत ऐसा कोई वस्त्र बराबर पहिना करते थे क्योंकि मनुष्य मूर्तियां प्रायः नंगी बतलायी गयी हैं। लेकिन मुद्राओं पर चित्रित देवता और वीर पुरुष एक बहुत संकरा कोपीन पहने हुए दिखलाये गये हैं। हड़प्पा से मिले हुए एक ठीकरे पर बनी हुई मनुष्य मूर्ति ४ एक तंग मोहरी वाला पाजामा या धोती पहने हुए दिखलायी गयी है ।

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४ मेके, इंडस वैली सिविलाइजेशन, पृ० १०३

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हड़प्पा और मोहेनजोदड़ो से अभी तक जो सामग्री हमें मिली है उसके आधार पर यह कहना मुश्किल है कि सिंधु सभ्यता के लोग सिले हुए कपड़ों से अवगत थे अथवा नहीं। केवल एक मूर्ति कमीज जैसा वस्त्र पहिने हुए है जो कमर पर एक डोर से बंधी हुई है ५ ।

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५ मेके, उपरोक्त

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बाल बहुधा फीते से बंधा होता था (आ० १)। लगता है मनुष्य कभी कभी नोकदार चपकी हुई टोपी भी पहनते थे। इस टोपी की नोक या तो फीते से बंधी हुई एक तरफ झुकती हुई दिखलाई गई है (आ० ३)६ या वह पेंचदार है (आ० ४)७।

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कभी कभी दुपट्टे की तरह का वस्त्र मनुष्य गले में पहने दिखलाये गये हैं। यह एक तरफ झुकता हुआ होता है (आ० ५)८। बटन या ब्रूच से बंधा हुआ यह दुपट्टा प्रायः दोहरा होता था (आ० ६)९। डा० मेके१० का यह अनुमान है कि यह दुपट्टा शायद किसी पद के अधिकार का अथवा किसी धर्म विशेष का द्योतक है ।

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६ ६—मार्शल, वही, प्ले० ६४, ११

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९ ९—वही, प्ले० ७६, १५

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१० १०—वही, भा० १, पृ० २६२

स्त्रियों की वेश-भूषा

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मट्टी की मूर्तियों में स्त्रियों के जो भी वस्त्र आते हैं वे काफी साधारण हैं। अगर गहने बाद कर दिये जावें तो स्त्रियों के धड़ नंगे दीखते हैं । संकरी साड़ी घुटने के बहुत ऊपर पहुंचती हैं; इसे साड़ी न कह कर लंगोटी कहना बेहतर होगा। जंतरों पर बनी स्त्री मूर्तियां भी ऐसी ही लंगोटी पहने हैं। लेकिन इस लंगोटी का आगा पीछा के बनिस्बत काफी छोटा होता है। लंगोटी को कमर से बांधने के लिए मेखला पहनी जाती थी। यह मेखला कई लड़ मनकों या सादे कपड़े की, जिसके छोर मिलाने के लिए एक चपकन होती थी, बनी होती थी। एक जगह मेखला किसी बुने कपड़े के फूंदने से बंधी दिखलायी देती है । कहीं कहीं लंगोटी किसी गुलिका (boss) जैसे आभरण से भूषित दिखलायी गयी है११। एक मट्टी की मूर्ति में एक स्त्री घोघी (cloak) पहने दिखलायी गयी है । इस घोघी ने स्त्री के हाथ छिपा रखे हैं, और वह लंगोटी के छोर के नीचे नहीं पहुंचती (आ० ७) । डा० मेके का अनुमान है कि शरीर रक्षा के अतिरिक्त साधन के रूप में इसका व्यवहार हुआ है१२ ।

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७ ७—मार्शल, वही, प्ले० ६४, ४

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११ ११—मेके, इंडस बेली सिविलिजेशन, पृ० १००-१०१

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१२ १२—मेके, फर्दर एक्सकेवेशंस्......आ० २, प्ले० ७५, ६, इंडस वेली...पृ० १०१

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स्त्रियां और पुरुष भी पंखे के आकार का एक शिरोवस्त्र पहनते हैं (आ० ८)। अभी तक इस बात का पता नहीं चल सका है कि उसके बनाने में कौन सा कपड़ा लगता था । डा० मेके का अंदाजा है कि शायद यह फ्रेम पर चढ़े मांड़ीदार कड़े कपड़े से बना हो१३। यह भी हो सकता है सिर पर की चादर का एक कोना बांध कर इस शिरोवस्त्र का रूप खड़ा किया

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८ ८—मेके, फर्दर एक्सकेवेशन...२, प्ले० ७६, २२

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१३ १३—मेके, इंडस वेली......पृ० १०१

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गया हो क्योंकि सांची में इस शिरोवस्त्र का रूप ऐसा ही बनाया गया है। जब यह शिरोवस्त्र दोनों तरफ दियलीदार न होकर सादा होता था तो इस पर कुछ अलंकार होते थे। कभी कभी इसके दोनों ओर वृत्ताकार अलंकार होते थे और कभी मनके की लड़ों और एक चों गानुभा अलंकार से इसकी सजावट होती थी (आ० ९-१०) १४। कहीं कहीं शिरोवस्त्र सीधा सिर पर रक्खा हुआ देख पड़ता है और कहीं कहीं वह पीठ पर गिरती चोटी से लगा हुआ और सिर से एक फीते से बंधा मालूम पड़ता है१५। दियलीदार शिरोवस्त्र तो शायद देवी माता ही पहिनती थीं। पेशानी पर बंधे एक फीते के सहारे ये शिरोवस्त्र टिके रहते थे। शिरोवस्त्र में लगी दियलियों में काजल ऐसे कुछ धब्बे मिले हैं जिनसे पता चलता है कि शायद इनमें किसी समय दीपक जलाये जाते थे१६। इससे यह भी सिद्ध होता है कि हाथ में या सिर पर दीप धारण किये हुए मध्यकालीन और आधुनिक दीपलक्ष्मी की मूर्तियों का स्रोत प्रागैतिहासिक काल में है।

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१४ मेके, फर्दर एक्सकेवेशंस......भा० २, प्ले० ७५, ३, ८; ७६, १७

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१५ मार्शल, वही, भा० १, पृ० ३३८

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१६ वही, भा० १, पृ० २६०; २, प्ले० ७३, ३, ४; ७५, २१-३७

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कहीं कहीं कुछ अजीब ढंग के शिरोवस्त्र भी मिलते हैं१७। पंखे के आकार वाले इन शिरोवस्त्रों पर एक तिपाई सी दीख पड़ती है, यह तिपाई शायद किसी अलंकार की द्योतक हो। यह भी हो सकता है कि इस तिपाई का तात्पर्य किसी देवपीठ से हो। आज दिन भी देवयात्राओं में स्त्रियां अपने सिरों पर देवपीठ ले कर चलती हैं। पगड़ी पहने हुए स्त्री मूर्तियां (आ० ११) कम मिली हैं१८। लगता है स्त्रियां कभी कभी ढीली टोपी भी पहिनती थीं (आ० १२) १९।

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१७ वही, भाग २, प्ले० ७५, १५, १६

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१८ वही, भा० २, प्ले० ७६, १६

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१९ मार्शल, वही, भा० १, पृ० ३४०, प्ले० १५३, २५

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