Pracin Bharatiya Veshabhusha c6.s2: कंबल और शामुल्य
Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c6.s2
- Language
- Hindi
कंबल और शामुल्य
c6.s2.1
कंबल७ और शामुल्य८ स्त्रियों और पुरुषों के नित्य के पहिनने के वस्त्र थे। कंबल से शायद खुरदरे ऊनी कपड़े का तात्पर्य रहा हो । प्रो० प्रिजलुस्की के मतानुसार९ कंबल मुंडा-ख्मेर भाषा का शब्द है और वैदिक संस्कृत ने इस शब्द को उस भाषा से उधार लिया है। अथर्ववेद में सबसे पहले यह शब्द आने से यह धारणा होती है कि इस शब्द को आर्यों ने आदिवासियों से अधिक घनिष्ठता बढ़ने पर अपना लिया। शामुल्य समूर का बना कपड़ा होता था। पर
c6.s2.2
७ अथर्ववेद, १४।२।६६, ६७
c6.s2.3
८ ऋ० वे० १०।८५।२६; अथ० वे० १४।१।२५
c6.s2.4
९ प्री आर्यन एण्ड प्री ड्रीविडियन, पृ० ६-८, श्री बागची द्वारा संपादित
c6.s2.5
शामुल्य के संबंध में डा० सुविमलचंद्र सरकार१० का और ही मत है। उनका विचार है कि शामुल्य रुई भरा कोई हल्का कपड़ा था। वे हमारा ध्यान इस ओर भी दिलाते हैं कि आधुनिक शमला जो एक संकरा शाल है, और जिसका व्यवहार पगड़ी पर के बंद के लिए होता है और जिसकी व्युत्पत्ति अरबी शामिलात से जिसके अर्थ होते हैं जोड़ना, वास्तव में शामुल्य से निकला है। इस धारणा को सत्य मानने में कई कठिनाइयां हैं। शामुल्य को रुई से भरा वस्त्र मानने में संदेह होता है क्योंकि रुई का ज्ञान, जैसा कि हम आगे चल कर देखेंगे, आर्यों को सूत्र काल में हुआ। शामुल्य तो समूर शब्द का प्राचीन रूप मात्र है जिसका अर्थ आज दिन भी रोएंदार चमड़ा होता है। इसी अर्थ में इस शब्द का व्यवहार कौटिल्य के अर्थशास्त्र में भी हुआ है।
c6.s2.6
१० सरकार, सम आस्पेक्टस् ऑफ दी अर्लियस्ट सोशियल हिस्ट्री ऑफ इंडिया, पृ० ५१, फु० नो० ६
Linked texts (3)
- Bṛhadāraṇyakopaniṣad — Sanskrit
- Ṛgvedasaṃhitā — Sanskrit
- Atharvavedasaṃhitā — Atharvan & Aṅgiras, Sanskrit