Pracin Bharatiya Veshabhusha c7.s18.28
Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c7.s18.28
- Language
- Hindi
c7.s18.28
जिन जूतों का वर्णन हम ऊपर कर आये हैं उनके अलावा भी सिंह, व्याघ्र, मृग, चीते, ऊदबिलाव, बिल्ली, गिलहरी और उल्लू के चमड़ों से भी जूते बनाये जाते थे[^१२०। उन दिनों इस देश में जूतों का इतना अधिक चलन था कि चर्मकार के व्यवसाय से ली गयी उपमाओं का प्रयोग कहीं कहीं पालि साहित्य में हुआ है। काम जातक की एक गाथा में कहा गया है कि जिस तरह चर्मकार जूता बनाने में चमड़े के कोने काट कर उसमें रूप पैदा करता है (रथकारो व चम्मस्स परिकन्तं उपाहनं) उसी तरह इच्छाओं के नाश होने पर सुख की प्राप्ति होती है।