Pracin Bharatiya Veshabhusha c7.s18: कमरबंद
Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c7.s18
- Language
- Hindi
कमरबंद
c7.s18.1
कायबंध१०८ कमरबंद बांधने के भी अनेक तरीके थे तथा आकार के अनुसार इसके अनेक नाम भी थे । कलावुक नाम का कमरबंद बटी रस्सियों से बना होता था । डेड्डुभक की शक्ल जल में रहने वाले डेड़े साँप की तरह होती थी, मुरज ढोल के आकार का होता था और मद्दवीन नामक कमरबंद से एक अलंकार लटका करता था ।
c7.s18.2
१०८ वही, ५।२९।२
c7.s18.3
कलात्मक ढंग से कमरबंद और पटके बांधने की रीति स्त्रियों में काफी प्रचलित थी, लेकिन बुद्ध की आज्ञानुसार भिक्षुणियां अपने कमरबंद सादे तौर से ही बांध सकती थीं ।
c7.s18.4
उनके कमरबंदों में एक ही फेंटा लगता था। पटके बांस के रेशे (विलीव) चर्मपट्ट, ऊनी पट्टी (दुस्सपट्ट) गुथे हुए ऊन (दुस्सवेणी), बंटे हुए ऊन (दुस्सवट्टी), बंटे हुए चोलवस्त्र (चोलवट्टी) गुथे हुए चोल वस्त्र (चोलवेणी) और गुथे हुए सूती कपड़े (चोलवट्टी) के बनते थे१०९।
c7.s18.5
१०९ चुल्लवग्ग, १०।१०।१
c7.s18.6
जूते मनुष्य के पहिरावे में जूतों और पादुकाओं का एक विशेष स्थान होता था। एक जातक में कहा गया है कि शरीर की रक्षा और आराम के लिए जूतों का खरीदना आवश्यक था११०। जूते आकार और रंग में भिन्न भिन्न प्रकार के होते थे। जूते एकतल्ले (एक पलासिक), दोतल्ले (द्विपटल), तिनतल्ले (तिपटल) और चौतल्ले होते थे१११। जूते नील, लोहित, मंजीठ, कृष्ण, नारंगी (महारंग) और पीले (कुरुंदिय) चमड़ों से बनाये जाते थे । जूतों में रंग बिरंगे किनारे भी लगाये जाते थे११२। ऐसे रंग बिरंगे तथा अनेक तल्ले वाले जूते केवल गृहस्थ पहन सकते थे । भिक्षु केवल एक तल्ले जूते पहन सकते थे११३ लेकिन अनेक तल्ले वाले पुराने जूते पहने जा सकते थे११४।
c7.s18.7
१११ महावग्ग, ५।१।२६
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११२ महावग्ग, ५।२।२
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११३ महावग्ग, ५।२।१
c7.s18.10
११४ महावग्ग, ५।३।२
c7.s18.11
जूते निम्नलिखित आकारों के होते थे११५ —
c7.s18.12
११५ महावग्ग, ५।२।२३
c7.s18.13
(१) पुटबद्ध—घुटने तक चढ़े हुए जूते । बुद्धघोस के अनुसार ये जूते यवनों के होते थे और ये जंघों से लेकर सब पैर को ढक लेते थे । सांची के एक अर्धचित्र में इसी तरह का जूता चित्रित किया गया है । बाद में वृहद् कल्पसूत्र भाष्य में इस जूते को जंघा अथवा खपुसा कहा गया है ।
c7.s18.14
(२) पालिगुंठिम—ये जूते केवल पैर ढकते थे और जंघे खुले रहते थे। सांची के अर्धचित्रों में एक जगह इस जूते की आकृति बतलायी गयी है ।
c7.s18.15
(३) खल्लकबद्ध—बुद्धघोस के अनुसार इस जूते के तले में एंड़ी ढांकने के लिए खल्लक लगा होता था। लगता है इस जूते का आकार आधुनिक पेशावरी चप्पल जैसा रहा होगा (आ० ११०)। वृहद कल्पसूत्र भाष्य११६ में पूरे पैर ढकने वाले जूते को खल्लक कहते थे। (४) मेण्डविषाण बद्धिक—बुद्धघोस के अनुसार इस जूते की नोक पर अलंकार स्वरूप मेंढ़े के सींग लगाये जाते थे।
c7.s18.16
११० जातक (२२७), २, पृ० १५५
c7.s18.17
११६ बृहत्कल्प सूत्रभाष्य, ४,३८४७
c7.s18.18
(५) अजविषाण बद्धिक—इस जूते की नोक (कर्णिका) पर बकरे के सींग लगाये जाते थे।
c7.s18.19
(६) वृश्चिकालिक—इस जूते की नोक पर बिच्छू की पूंछ का अलंकरण होता था।
c7.s18.20
(७) मोरपिंछ परिसिब्वित—बुद्धघोस के अनुसार इस जूते के तले या बंदों में मोरपंख सिला हुआ होता था।
c7.s18.21
(८) तूलपुण्णिक—लगता है यह जूता रुई से भरा हुआ होता था।
c7.s18.22
(९) तित्तिरपट्टिक—इस जूते की बनावट तीतर के पंखों जैसी होती थी।
c7.s18.23
उपरोक्त किस्म के जूते केवल गृहस्थ पहन सकते थे। भिक्षुओं को इनके पहनने की मनाही थी। लेकिन उन प्रत्यन्त देशों में जहाँ बौद्ध धर्म घुस नहीं सका था उन्हें वहां के बने हर एक प्रकार के जूते पहनने की आज्ञा थी[^११७।
c7.s18.24
११७ महावग्ग, ५।१३।६
c7.s18.25
भिक्षु धार्मिक शिक्षा ग्रहण करते समय चप्पल नहीं पहन सकते थे[^११८। आराम में प्रवेश करते हुए भिक्षुओं को आदेश था कि वे अपनी चप्पलें अथवा पादुकाएं उतार दें और उनसे गरदा पीट कर निकाल दें। बाद में वस्त्र मांग कर चप्पलें पोंछें। पहले सूखे कपड़े से और बाद में गीले कपड़े से जूते पोंछने का आदेश मिलता है[^११९।
c7.s18.26
११८ पातिमोक्ख, ६१
c7.s18.27
११९ चुल्लवग्ग, ८।२
c7.s18.28
जिन जूतों का वर्णन हम ऊपर कर आये हैं उनके अलावा भी सिंह, व्याघ्र, मृग, चीते, ऊदबिलाव, बिल्ली, गिलहरी और उल्लू के चमड़ों से भी जूते बनाये जाते थे[^१२०। उन दिनों इस देश में जूतों का इतना अधिक चलन था कि चर्मकार के व्यवसाय से ली गयी उपमाओं का प्रयोग कहीं कहीं पालि साहित्य में हुआ है। काम जातक की एक गाथा में कहा गया है कि जिस तरह चर्मकार जूता बनाने में चमड़े के कोने काट कर उसमें रूप पैदा करता है (रथकारो व चम्मस्स परिकन्तं उपाहनं) उसी तरह इच्छाओं के नाश होने पर सुख की प्राप्ति होती है।
c7.s18.29
१२० महावग्ग, ५।२।४
c7.s18.30
१२१ जातक, ४,१७२
Linked texts (4)
- Cullavagga — Pāli
- Mahāvagga — Pāli
- Jātaka — Pāli
- Pātimokkha — Pāli