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Pracin Bharatiya Veshabhusha c7.s2: बौद्ध और जैन साहित्यों में कारीगरों का सामाजिक स्थान

Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c7.s2

Language
Hindi

बौद्ध और जैन साहित्यों में कारीगरों का सामाजिक स्थान

c7.s2.1

जातक कथाओं के अनुसार कारीगर अट्ठारह श्रेणियों में विभक्त थे जिनमें बढ़इयों, लुहारों और चितेरों की श्रेणियां भी सम्मिलित थीं। कसीदा काढ़ने वालों (पेसकारसिप्प) और बेंत बीनने वालों (नलकार)१ को शायद इसलिये नीच काम करने वाला कहा गया है कि ये व्यवसाय देश के आदिम निवासियों के हाथों में थे जिन्हें आर्य हेय दृष्टि से देखते थे। भीमसेन जातक२ में एक धनुर्धारी ब्राह्मण बुनकर (तंतुवाय) के व्यवसाय को नीच काम कहता है। सुत्तविभंग३ में भी नलकारशिल्प, कुंभकारशिल्प, पेशकार शिल्प और स्नापित शिल्प को नीच काम कहा गया है। ऊपर के उल्लेखों से यह न समझ लेना चाहिए कि यह विचार बौद्धों के हैं क्योंकि बुद्ध ने तो जात पांत तोड़ने की पूरी व्यवस्था दी है। ये भाव तो केवल तत्कालीन ब्राह्मण आर्य सभ्यता के प्रतीक मात्र हैं जो कहानियों के प्रसंग में बौद्ध साहित्य में भी आ गये हैं। जंबूद्वीप प्रज्ञप्ति४ में जो जैनग्रंथ है दरजियों (तुण्णाग), बुनकरों (तंतुवाय) और रेशमी कपड़े बिनने वालों (पट्टगार) को शिल्पायों के श्रेणी में रक्खा गया है जिसका मतलब यह है कि अपने शिल्प बल से ये कारीगर आर्यत्व को प्राप्त थे। इसी तरह दौष्यिक, सौत्रिक और कार्पासिक भी कर्म आर्य५ माने गये हैं।

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१ जातक, भा० ४, पृ० २५१

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२ जा०, भा० १, पृ० ३५६

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३ पाचित्तिय, २।२।१

c7.s2.5

४ जं० प्र०, सूत्र ७०

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५ वही, सूत्र ६१

c7.s2.7

इस युग में निम्नलिखित तरह के कपड़ों का व्यवहार होता था :—

c7.s2.8

कपास—हम दूसरे अध्याय में दिखला चुके हैं कि वैदिक साहित्य में कपास का सर्वप्रथम उल्लेख आश्वलायन गृह्य सूत्र में आया है। पाणिनि के सूत्रों में कर्पास का उल्लेख नहीं है लेकिन पाणिनि तूल से, जैसा कि ईषीका तूल६ से मालूम पड़ता है परिचित थे। तूल का अर्थ बाद में तो कपास होता है लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि पाणिनि के युग में भी इस शब्द के यही अर्थ होते थे। आचारांग सूत्र७ में भी तूल (तूलकड) का उल्लेख है लेकिन

c7.s2.9

६ अष्टाध्यायी, ६।३।६५; डा० वासुदेव शरण, यू० पी० हि० सो० ज०, जुलाई १९४०, पृ० १०६

c7.s2.10

७ आचारांग सूत्र, २।५।१।१

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टीकाकार ने इसका अर्थ कपास का बना कपड़ा न करके सेमल की रुई (अर्कतूल) किया है। यह अर्थ संदेहात्मक है क्योंकि सेमल की रुई का सूत इतना कोमल होता है कि उसका बना कपड़ा एक धोब के बाद फट जाता है। लगता है यहां तूल से कपास का ही मतलब है। जातक कथाओं८ में तो कपास का बहुत उल्लेख हुआ है। तुंडिल जातक९ में बनारस के आसपास कपास के खेतों का वर्णन है। स्त्रियां कपास के खेतों की रखवारी करती थीं। महाजनक जातक१० में इन्हें कप्पास रक्खिका नाम से संबोधन किया गया है। कताई और बुनाई संबंधी उपकरणों के भी कभी कभी उल्लेख आते हैं। रुई धुनने की धनुही (कप्पास-पोथन-धनुके) का उल्लेख आता है११। स्त्रियों द्वारा महीन सूत कात कर (सुखुम सुत्तानि कन्तित्वा) गंडी (गुलं)१२ बनाने का भी उल्लेख है।

c7.s2.12

९ जातक, भाग ३, पृ० २८६

c7.s2.13

१० जातक, भाग ६, पृ० ३३६

c7.s2.14

११ जातक, भाग ६, पृ० ४१

c7.s2.15

१२ जातक, भाग ६, पृ० ३३६

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