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Pracin Bharatiya Veshabhusha c7.s21: सिलाई और उसके उपकरण

Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c7.s21

Language
Hindi

सिलाई और उसके उपकरण

c7.s21.1

कंचुक इत्यादि के उल्लेखों से यह तो निश्चय हो गया है कि बौद्धकालीन भारत में या उसके पहले भी लोग सीना-पिरोना बहुत अच्छी तरह जानते थे। इससे कुछ अंग्रेज विद्वानों का यह विचार भ्रमात्मक सिद्ध होता है कि भारतीयों में सिले वस्त्रों की परंपरा का आरंभ मुसलमानों के भारत विजय के बाद से आरंभ होता है। महावग्ग में तो सिलाई

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का विशद वर्णन आया है जिससे पता चलता है कि कम से कम २५०० बरस पहले लोग सीने की कला में पूरी तौर से प्रवीण हो चुके थे । सिलाई संबंधी जो कुछ भी ज्ञान हमें बौद्ध साहित्य से प्राप्त होता है उसका वर्णन नीचे दिया जाता है ।

c7.s21.3

सूची—सूई लोग व्यवहार में लाते थे और सुइयां सूचीनालिका में रखी जाती थीं। सूइयों में मोरचा लगने के भय से सूचीनालिका में मोम का एक अस्तर दे दिया जाता था१२६ ।

c7.s21.4

१२६ चुल्लवग्ग ५।११।२

c7.s21.5

पहले भिक्षुगण अपने कपड़े परगजे और बांस के बने सूजे से सीते थे लेकिन बाद में उन्हें लोहे की सूई से अपने कपड़े सीने की आज्ञा मिल गई ।

c7.s21.6

सूचिक और सूचिक नाली के उल्लेख चुल्लवग्ग में१२७ भी आते हैं। सूई की धार भोथरी न होने देने के लिए खाने में चूना, जोंका आटा, बालू तथा सिपिटक गोंद मिली हुई मोम का प्रयोग होता था।

c7.s21.7

१२७ चुल्लवग्ग, ५।११।२

c7.s21.8

जातकों में एक स्थान पर एक सूई बनाने वाले की कथा दी हुई है जिससे पता चलता है कि सूचिकार अपने व्यवसाय में काफी निपुण होते थे। कथा यह है१२८ कि बोधिसत्व एक सूचिकार के चोले में उत्पन्न हुए और उनकी इच्छा गांव के एक लुहार की कन्या से विवाह करने की हुई। उन्होंने बहुत ही अच्छे किस्म के लोहे से एक सूई बनाई जो इतनी हल्की थी कि पानी पर तैर सकती थी । इस सूई को उन्होंने एक कोश में (सत्थकोश) रक्खा और उस कोश को एक नाली में, और फिर इस नाली को एक पेटी में रख कर (ओवट्टिकायकरण्ड) वे लोहार के गांव में जाकर फेरी लगा कर आवाज देने लगे । "मेरी सूई सीधी और चिकनी है इसमें डोरा जल्दी पिरोया जा सकता है । कोरण्ड से इस पर पालिश की गयी है, इसकी नोक तेज है, सूई कौन लेगा।" "जल्दी पिरोई जाने वाली सीधी और मजबूत ठीक तरह से गोल की हुई मेरी सूई लोहे तक को छेद सकती है, बताओ मेरी सूई कौन लेगा।" लोहार की लड़की ने जब एक बाहरी को अपनी सूई को इस तरह प्रशंसा करते सुना तो उसे एक आदमी की मूर्खता पर इसलिए आश्चर्य हुआ कि उस लोहारों के गांव की सुइयां इतनी अच्छी बनती थीं कि चारों ओर से आदमी उन्हें खरीदने आते थे । लड़की ने बोधिसत्व को उत्तर दिया—

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१२८ जातक (३८७), भा० २, पृ० १७८-१७६

c7.s21.10

"हमारी हुकें (वलिसानि) चारों ओर बिकती हैं, और आदमी हमारे गांव में बनी सुइयों से भली भांति अवगत हैं, फिर यहां सुइयां कौन बेंच सकता है।" "लोहे के काम में

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हमारी ख्याति है, हमारे हथियार सब से अच्छे बनते हैं, हम इस गांव के लोहार हैं, फिर यहां सुइयां कौन बेच सकता है।'

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ऊपर की गाथाओं से, जो तत्कालीन लोकगीत के सुन्दर नमूने हैं, यह पता चलता है कि सुइयों की यथेष्ट मांग थी और इस व्यवसाय में काफी प्रतिस्पर्धा भी थी।

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**केंची**—इसे सत्थक कहते थे और इसके रखने का खाना (आवेसनवत्थक) से बनाया जाता था१२९। केंची की मूंठें कभी कभी सोने चांदी की होती थीं लेकिन भिक्षु केवल हड्डी, हाथी दांत, सींग, बेंत, बांस, कड़ी लकड़ी, कांसा और शंख के बनी मूठ ही व्यवहार में ला सकते थे ।

c7.s21.14

**प्रतिग्रह**१३० (अंगुश्ताना)—सुई से अंगुलियों की रक्षा के लिए प्रतिग्रह या अंगुश्ताने का व्यवहार होता था। रईस सोने चांदी के अंगुस्ताने बनवाते थे पर भिक्षु केवल हड्डी या शंख इत्यादि के ।

c7.s21.15

१३० चुल्लवग्ग, ५।११।५

c7.s21.16

**कठिन**—यह एक प्रकार का फ्रेम या पट्टा होता था जिस पर दरजी सीने के कपड़े फैला देता था । कपड़ा पट्टे पर फैला कर इधर उधर रस्सियों से बांध दिया जाता था और इसके बाद कठिन को घास की चटाई पर रख देते थे। कठिन की दोनों बगलें मजबूती के लिए या तो दुहरी कर दी जाती थीं या उन्हें कस कर बांध दिया जाता था (अनुवातं परिभण्डं) कठिन के पायों या डंडों को दंड कठिन कहते थे, खूंटों को पिदल्क, बांस की खपच्चियों को शलाका और बांधने की रस्सियों को विनन्धन रज्जु या विनन्धन सुत्तक कहते थे।१३१

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१३१ चुल्लवग्ग, ५।११।३

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सीयन की पंक्तियों के बीच की चौड़ाई में कमी-बेशी न आने देने के लिए कपड़े पर ताड़पत्र अंकित कर दिये जाते थे । कपड़े की सिलाई या कटाई के लिए ठीक जगह पर पहले लंगर (मोघसुत्तकम्) डाल दिये जाते थे । बुद्धघोस के अनुसार ये लंगर हरे डोरे से उसी प्रकार डाले जाते थे जैसे बढ़ई काले डोरे से तख्ता काटने के लिए निशान बनाते थे ।१३२

c7.s21.19

१३२ वही, ५।११।३

c7.s21.20

दरजी की दूकान में खानेदार पेटियां (आवेसनवित्यक) होती थीं। कठिन एक मंडप या छप्पर के नीचे रक्खा जाता था। यह मंडप चबूतरे (चय) पर इसलिए होता था जिससे पानी दूकान के अंदर न घुस सके । चबूतरे में ईंट, पत्थर या लकड़ी का मुखौटा (facing) तथा ईंट, पत्थर या लकड़ी की सीढ़ियां जिनमें रेलिंग (आलंबनबाहु) लगी

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१२६ चुल्लवग्ग, ५।११।१

c7.s21.22

होती थीं, दीवारें और छत पहले चमड़े से ढोंक दी जाती थीं और बाद में उन पर भीतर बाहर से पलस्तर कर दिया जाता था। इसके बाद दुकान की छहाई होती थी और उसमें काले-लाल रंग (गेरुकपरिकम्म) रंग लगाये जाते थे। इसके बाद माला और बेलों से वह अलंकृत की जाती थी और उसमें खूटियां, टांड़े (पंचपट्टिक) तथा कपड़े टांगने के लिए बांस और रस्सियां लगायी जाती थीं१३३।

c7.s21.23

१३३ चुल्लवग्ग, ५।११।६

c7.s21.24

कठिन में घुन लगने के भय से उसे गोचर्म (गोघंसिका) से मढ़ देते थे। और काम न होने पर उसे एक खूंटी (नागदन्त) से लटका देते थे१३४।

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१३४ चुल्लवग्ग, ५।११।७

c7.s21.26

महावग्ग में काटने, सीने और रफू करने के संबंध में बहुत से शब्द दिये गये हैं जिनसे पता चलता है कि प्राचीन भारत के लोग कटाई और सिलाई के प्रत्येक अंगों से भली भांति परिचित थे। इन पारिभाषिक शब्दों के अर्थ समझने में काफी कठिनाई पड़ती है क्योंकि शब्द इतने प्राचीन हैं कि उनके अर्थ प्रायः लुप्त हो गये हैं। शब्द और परिभाषाएं नीचे दी जाती हैं—

c7.s21.27

(१) उल्लिखित—कपड़े की लंबाई चौड़ाई पर नाप के लिए नख या खड़ी से निशान बना देते थे१३५।

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१३५ महावग्ग, ७।१।५

c7.s21.29

(२) बन्धन—सिलने के पहले कपड़े के टुकड़ों को आपस में लंगर से जोड़ना१३६। पक्की सिलाई होने पर लंगर तोड़ दिये जाते हैं।

c7.s21.30

१३६ वही

c7.s21.31

(३) ओवट्टियकरण—लंबान में मोड़ कर लंगर के सहारे सिलाई१३७।

c7.s21.32

१३७ वही, ८।१४।२; चुल्लवग्ग ५।१।२

c7.s21.33

(४) कंडुसकरण—बुद्धघोस इसका अर्थ करते हैं मुद्दियपट्टवन्धनमत्तेन जिसका अर्थ ठीक ठीक नहीं लगता। हो सकता है इसका अर्थ कपड़े के छोटे टुकड़े से बड़े कपड़े का जोड़ हो१३८।

c7.s21.34

१३८ महावग्ग, ७।१।५

c7.s21.35

(५) दंडिकरण—बुद्धघोस इस शब्द के निम्नलिखित अर्थ करते हैं (अ) दो चिमिलिकाओं (परतों) को दोहरा कर के सीना, (आ) एक परत के फट जाने पर दूसरी परत लगा कर उसे मजबूत करना, (इ) पट्टचीवर, कुक्षि इत्यादि के फट जाने पर उनमें

c7.s21.36

प्योंदे लगा कर उसे मजबूत करना१३९। यहां हमने बुद्धघोस की परिभाषाओं का केवल आशय दिया है ।

c7.s21.37

(६) अनुवातकरण१४०—मजबूती के लिए बटाईदार सिलाइ, पिट्ठि अनुवात-आरोपण-मत्तेन, बुद्धघोस ।

c7.s21.38

१४० —महावग्ग, ७।१।५; ८।२१।१

c7.s21.39

(७) परिभण्डकरण१४१—बगल और पीछे की सिलाई, कुच्छिअनुवातआरोपण मत्तेन, बुद्धघोस ।

c7.s21.40

१४१ —महावग्ग, ७।१।५

c7.s21.41

(८) ओवद्वेयकरण१४२—कुछ जगहों में दोहरी सिलाई—कठिन या दूसरे पट्ट को लेकर अकठिन चीवर से सीना ।

c7.s21.42

१४२ —वही [^१४३-१५०]: —महावग्ग, ७।१२।२

c7.s21.43

(९) कुसि१४३—तिरछेवल दो सिले हुए कपड़े—आयामतो दीघ च वित्थस्तो च अनुवातादीनं दीघपट्टानं एतो अधिवचनं—बुद्धघोस ।

c7.s21.44

(१०) अड्ढकुसी१४४—तिरछे वल आधी दूर तक सिले हुए दो कपड़े। अन्तरन्तरारस्स पट्टानं नामम्, बुद्धघोस ।

c7.s21.45

(११) मंडल१४५—पांच टुकड़े वाले वस्त्र में एक खंड में गोल सिलाई।

c7.s21.46

(१२) विवट्ट१४६—भीतरी मोड़ । मंडलों को एक कर के सीने में इस मोड़ की जरूरत पड़ती है ।

c7.s21.47

(१३) अनुवट्ट१४७—मोड़ों में लगा हुआ अस्तर। उभेसू पस्सेसु द्वे खण्डानि अथवा विवट्टस्स एक पस्सतो द्विन्नंपि चतुरंपि खंडानं एतं नामम्, बुद्धघोस ।

c7.s21.48

(१४) जांघेयक१४८—घुटने पर सिला हुआ विशेष वस्त्र ।

c7.s21.49

(१५) गिवेय्यक१४९—कालर । ग्रीवास्थान पर दृढ़ता लाने के सूत से सिला हुआ टुकड़ा ।

c7.s21.50

(१६) बहन्त१५०—केहुनी पर लगे हुए कपड़ों के टुकड़े । अनुवट्टानं बहि एक खण्डम्, अथवा सुप्पमाणं बहाय उपरि ठपिता उभो अन्तो बहिमुखा तिट्ठन्ति तेसं एतं नामम् ।

c7.s21.51

१३६ —वही

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