Pracin Bharatiya Veshabhusha c8.s1: समूर और चमड़े
Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c8.s1
- Language
- Hindi
समूर और चमड़े
c8.s1.1
कौटिल्य अर्थशास्त्र में तरह तरह के चमड़ों और समूरों का विशद वर्णन दिया हुआ है। ये समूर और चमड़े हिमालय से आते थे और इतने कीमती समझे जाते थे कि राजभंडार में रत्नों तथा और सुगंधित द्रव्यों के साथ रखे जाते थे। निम्नलिखित समूरों और चमड़ों की परिभाषाएं श्री गणपति शास्त्री द्वारा संपादित अर्थशास्त्र से ली गयी हैं। श्री शामा शास्त्री के अंग्रेजी अनुवाद का भी संकेत इसलिए कर दिया गया है कि उनके अनुवाद और श्री गणपति शास्त्री की टीका में काफी अंतर है।
c8.s1.2
(१) कान्तानावक१—इस समूर का रंग मोर की गरदन की तरह हरा होता था और यह कान्तानावक प्रदेश से आता था। इस देश की स्थिति का पता नहीं है।
c8.s1.3
(२) प्रेयक२—यह समूर सफेद और नीले रंग का होता था और इस पर बूंदकियां और धारियां (लेखा बिंदुचित्र) पड़ी होती थीं। न० १-२ के चमड़ों की लंबाई आठ अंगुल होती थी।
c8.s1.4
इन समूरों के नाप से पता चलता है कि शायद वे छोटे जानवरों के समूर रहे हों अथवा एक बड़े चमड़े के आठ अंगुल के बराबर टुकड़े रहे हों।
c8.s1.5
द्वादशग्राम में तैयार किये हुए चमड़े
c8.s1.6
(३) बिसी३—इसका कोई खास रंग नहीं होता था और यह बालदार और चित्तीदार होता था। गणपति शास्त्री की टीका के अनुसार इस समूर में बहुत से रंगों के मेल होते थे और इसलिए यह कहना कठिन है कि उसका खास रंग क्या होता था। इस पर रोएं (दुहिल्लिका या दुहिलितिका) और चित्तियां होती थीं।
c8.s1.7
(४) महाबिसी४—यह समूर खुरखुरा और प्रायः सफेद होता था ३-४ नं० के चमड़े १२ अंगुल लंबे होते थे और हिमालय पर्वत पर बसे म्लेच्छों के द्वादशग्राम से आते थे।
c8.s1.8
१ गणपति शास्त्री, अर्थशास्त्र, १, पृ० १६१; शामा शास्त्री, अ० शा० पृ० ६८ आगे हम गणपति शास्त्री द्वारा संपादित अर्थशास्त्र के लए ग० शा० और शामा शास्त्री के अर्थशास्त्र के अनुवाद के लिए शा० शा० का लघप्रयोग करेंगे।
c8.s1.9
२ वही
c8.s1.10
३ वही
c8.s1.11
४ वही; शा० शा० पृ० ८८, फु० नं० ५
c8.s1.12
निम्नलिखि समूर आरोह से आते थे जो टीका के अनुसार हिमालय प्रदेश में स्थित था५। (५) श्यामिका६—यह भूरे रंग का बूंदीदार बिंदुचित्रा समूर था।
c8.s1.13
५ शा० शा०, पृ० ८८, फु० नं० ६
c8.s1.14
(६) कालिका७—यह भूरे और फाख्ताई रंग का समूर था।
c8.s1.15
नं० ५-६ के चमड़े ८ अंगुल लंबे होते थे।
c8.s1.16
(७) कदली८—यह खुराखुरा समूर दो हाथ चौड़ा और २४ अंगुल लंबा होता था। महाभारत के अनुसार९ कदली मृग के समूर, काले, भूरे और लाल रंग के होते थे। कम्बोज (आधुनिक ताजिकिस्तान) के निवासी राजसूय यज्ञ के अवसर पर कदली मृगचर्म युधिष्ठिर को भेंट देने लाये थे।
c8.s1.17
७ वही
c8.s1.18
(८) चन्द्रोत्तरा१०—इस समूर पर गोल चित्तियां पड़ती थीं और इसका नाप कदली जैसा ही होता था।
c8.s1.19
८ ग० शा०, १, पृ० १६१-६२
c8.s1.20
(९) शाकुला११—इस पर गोल चित्तियां (कोष्ठमंडल-चित्रा) पड़ती थी और इसमें कर्णिकाएं (कृतकर्णिकाजिनचित्रा) भी रहती थीं। गणपति शास्त्री की टीका के अनुसार इसकी चौड़ाई तीन हाथ अथवा आठ अंगुल होती थी।
c8.s1.21
९ महाभारत, २, ४५, १६
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