Pracin Bharatiya Veshabhusha c8.s4: कंबल और शाल
Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c8.s4
- Language
- Hindi
कंबल और शाल
c8.s4.1
इस प्रकरण के आरंभ में भेड़ के ऊन से बने कंबल और शालों का वर्णन दिया गया है। भेड़ के ऊन से बने शाल (आविकं) सफेद, गहरे लाल (शुद्धरक्त) या मिश्रित लाल (पद्मरक्त) रंग के होते थे२०।
c8.s4.2
२० ग० शा० १, पृ० १६३, शा० शा० पृ० ८१
c8.s4.3
अलंकार और कारीगरी के हिसाब से अर्थशास्त्र में शालों का अच्छा वर्णन आया है। शालों पर सुईकारी और अमलकारी रीति से अलंकार बनाने के निम्न लिखित तरीके दिये गये हैं--
c8.s4.4
(१) खचित२१—टीका में इस कारीगरी का अर्थ दिया हुआ है-- सूचिवाप कर्म निष्पादितम्—सुईकारी और बुनाई से बना हुआ। इस संबंध में मैं पाठकों का ध्यान, कश्मीर की पुरानी शाल बीनने की पद्धति की ओर आकर्षित करना चाहता हूं क्योंकि अर्थशास्त्र में शाल बिनने की पद्धति और आधुनिक कश्मीर में शाल बिनने की पद्धति प्रायः एक सी है । कश्मीर में शाल बुनने के दो तरीके हैं तिल्ली या कनीकार और अम्लीकार । तीलीकार में नक्काशियां करघे पर बुन ली जाती हैं । सुईकारी में बेल बूटियां सुई से काढ़ी जाती हैं । तात्पर्य यह है कि एक में बेल बूटियां बुनी जाती हैं और दूसरी में काढ़ी जाती हैं । लेकिन वास्तव में करघे पर फूल पत्तियां केवल बहुत ही महंगे जामेवारों पर बनती हैं, और उनमें भी थोड़ी बहुत कढ़ाई सुई की करनी ही पड़ती है। सत्य तो यह है कि कश्मीरी शाल कनीकार और अम्लीकार के संयोग से बनते हैं, केवल एक ही पद्धति से बने शाल बहुत कम मिलते हैं२२। अर्थशास्त्र में वर्णित खचित शाल में फूल पत्तियां या और अलंकार बुने अथवा काढ़े भी जाते थे । इसलिए प्राचीन खचित पद्धति आधुनिक कनीकार और अम्लीकार के मेल की द्योतक थी ।
c8.s4.5
१४-१८ ग० शा० १, पृ० १६२
c8.s4.6
२१ वही
c8.s4.7
२२ जार्ज वाट, इंडियन आर्ट एट देहली, १६०३, पृ० ३४४, कलकत्ता, १६०२
c8.s4.8
(२) वानचित्र२३—टीका में इसका अर्थ दिया हुआ है, ‘वान कर्मणाकृत वैचित्र्यम् ‘करघे पर ही अलंकार बुनना’ । इसमें कोई संदेह नहीं कि वानचित्र आधुनिक तिली या कनीकार पद्धति का ही प्राचीन संस्कृत नाम है ।
c8.s4.9
२३ गणपति शास्त्री, वही, १, पृ० १६३; शा० शा० पृ० ८६
c8.s4.10
(३) खंडसंघात्य२४—जुड़े हुए टुकड़ों पर बना शाल । टीका में दूसरी व्याख्या इस प्रकार की गयी है—खचितानां उतानां वा बहूनां खंडानां संघातेन निष्पादितम्—‘बिने हुए अथवा काढ़े हुए टुकड़ों को जोड़ कर बना हुआ शाल, खंडसंघात्य का यह वर्णन कश्मीरी पट्टीदार रूमालों के वर्णन से बहुत मिलता है । इस पद्धति में जब अलंकार करघे पर बिनने होते हैं तब कई १२ से १८ इंच चौड़े टुकड़े ले लिए जाते हैं और उन पर फूल पत्तियों की नक्काशियां बुन दी जाती हैं । इन पट्टियों को मनचाहे नाप में काट लेते हैं और फिर जोड़ कर एक पूरी नक्काशी का रूप दे देते हैं और रूमाल के बीच में इसे साट देते हैं। किनारे की पट्टियां रेशमी होती हैं जिनमें बहुधा एक ताना पश्मीने का होता है । ये पट्टियां भारी और मजबूत होती हैं। शाल की रफल बहुत बढ़िया पश्मीने की होती है। ये शाल अम्लीकार भी होते हैं। इसके लिए बढ़िया पश्मीने के टुकड़े नकशे के मुताबिक काट लिये जाते हैं और फिर इन पर बेल बूटे काढ़ दिये जाते हैं। अम्लीकार और तीलीकार शालों में इतनी समानता होती है कि इनमें से एक दूसरे को अलग करना कठिन होता है२५ ।
c8.s4.11
२४ गणपति शास्त्री, वही, १, पृ० १६३; शा० शा० पृ० ८६
c8.s4.12
२५ जार्ज वाट, वही, पृ० ३४४-४५
c8.s4.13
(४) तंतुरिच्छिन्न२६—टीकाकार ने इसकी परिभाषा दी है—अनुतविसृष्टैः तंतुभिः
c8.s4.14
मध्ये कृतविच्छेद्यं जालकोपयोगि च—‘बिना बुने किनारे को बांध कर जाली बनाना।' लगता है यहां शाल के जालीदार झालर की ओर संकेत है । जाली अनबुने किनारे को बांध कर बनायी जाती है ।
Linked texts (1)
- Kauṭilīya Arthaśāstra — Kauṭilya, Sanskrit