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Pracin Bharatiya Veshabhusha c8.s4.4

Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c8.s4.4

Language
Hindi

c8.s4.4

(१) खचित२१—टीका में इस कारीगरी का अर्थ दिया हुआ है-- सूचिवाप कर्म निष्पादितम्—सुईकारी और बुनाई से बना हुआ। इस संबंध में मैं पाठकों का ध्यान, कश्मीर की पुरानी शाल बीनने की पद्धति की ओर आकर्षित करना चाहता हूं क्योंकि अर्थशास्त्र में शाल बिनने की पद्धति और आधुनिक कश्मीर में शाल बिनने की पद्धति प्रायः एक सी है । कश्मीर में शाल बुनने के दो तरीके हैं तिल्ली या कनीकार और अम्लीकार । तीलीकार में नक्काशियां करघे पर बुन ली जाती हैं । सुईकारी में बेल बूटियां सुई से काढ़ी जाती हैं । तात्पर्य यह है कि एक में बेल बूटियां बुनी जाती हैं और दूसरी में काढ़ी जाती हैं । लेकिन वास्तव में करघे पर फूल पत्तियां केवल बहुत ही महंगे जामेवारों पर बनती हैं, और उनमें भी थोड़ी बहुत कढ़ाई सुई की करनी ही पड़ती है। सत्य तो यह है कि कश्मीरी शाल कनीकार और अम्लीकार के संयोग से बनते हैं, केवल एक ही पद्धति से बने शाल बहुत कम मिलते हैं२२। अर्थशास्त्र में वर्णित खचित शाल में फूल पत्तियां या और अलंकार बुने अथवा काढ़े भी जाते थे । इसलिए प्राचीन खचित पद्धति आधुनिक कनीकार और अम्लीकार के मेल की द्योतक थी ।