Vastu-shastra (Vol. I: Hindu Science of Architecture; Vol. II: Hindu Canons of Iconography and Painting) v1.c62: विषयानुक्रमणी
Vāstu-śāstra (Vol. I: Hindu Science of Architecture; Vol. II: Hindu Canons of Iconography and Painting) v1.c62
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- English
विषयानुक्रमणी
v1.c62.1
| विषयाः | पृष्ठाः | विषयाः | पृष्ठाः |
| मुख-पृष्ठम् | १ | **द्वितीयः पटलः** | |
| प्रकाशित-ग्रन्थानां सूची | २ | **मौल्लिकाधाराः** | ३६—८१ |
| समर्पणम् | ३ | १-दिक्-निर्णयः (प्राची-साधनं वा) | ३६—४५ |
| . . . . . | | २-वास्तु-पद-विन्यासः | ४५—५९ |
| प्राक्-कथनम् | ४-५ | (वास्तु-पुरुष-मण्डलं वा) | |
| विषयानुक्रमणिका | ६—१४ | ३-मानं (हस्तलक्षणं वा) | ५९—६६ |
| **प्रथम खण्डः** | १७--८१ | ४-आयादि-षड्वर्गः | ६६—७७ |
| **प्रथमः पटलः** | १७—३५ | ५-पताकादि-षट् छन्दांसि | ७७-८१ |
| **वास्तुशास्त्रोपोद्घातः** | | **दिक्-निर्णये** | |
| वास्तु-लक्षणम् | १७-१८ | अ. शङ्कुस्थापनं(प्राची-साधनंवा) | ३६—४४ |
| वास्तु-शास्त्र-जन्म | १८—२० | ब. प्लव-विचारश्च | ४४-४५ |
| वास्तु-शास्त्राचार्याः | २१ | **वास्तु-पद-विन्यासे** | |
| नैगमाः तान्त्रिकाश्च | ,, | समराङ्गणदिशा | |
| वास्तु-शास्त्रस्य विस्तारः | | प्रमुखवास्तुभेदाः | ४५—४८ |
| विषयाश्च | २१—३५ | तेषु एकाशीतिपदवास्तु | ४५-४६ |
| (अ) विस्तारः | | शतपदवास्तु | ४६-४७ |
| (i) स्वातन्त्रिकः | | चतुष्षष्टिपदवास्तु | ४७ |
| (ii) सार्वभौमिकः | | शतपदचतुष्षष्टिपद्वृत्तवास्तु | ४७ |
| (iii) भौगोलिकः | | द्व्यश्रादिवास्तुकपदानि | ४८ |
| (iv) खगोलीयः | | वास्तु-पुरुष-विकल्पन। | ,, |
| (v) भौगर्भिकश्च | | पुरुषाङ्ग-देवता-निघण्टुः | ४८—५० |
| टि०-तत्र मम भारतीय-वास्तु-शास्त्र-नामके | | तस्य नाड्यादिसिरादिविकल्पाः | ५० |
| ग्रन्थेऽवलोकनीयाः | | तत्र गृह-निर्माण त्याज्यस्थानानिच | ,, |
| (ब) विषयाश्च | | वास्तु-पद-प्रयोगाः | ५१ |
| (i) विज्ञानात्मकाः | २१—२६ | वास्तु-मर्माणि | ,, |
| (ii) कलात्मकाः | २६—३५ | तेषां पीडनफलञ्च | ५१-५२ |
| क-चतुर्विधं स्थापत्यं | | अपराजितदिशा | |
| स्थपतिलक्षणमित्यर्थः | ३०-३१ | वास्तुभेदाः | ५२ |
| सूत्रधार-लक्षणम् | ३१—३३ | तेषां प्रयोगाः | ५२-५३ |
| शिल्प-कोट्यः | ३३-३४ | देवतानां सामान्यस्थितिः | ५३ |
| आचार्य-शिल्पि-लक्षणम् | ३४ | तेषां पदभोगाः | ५३-५४ |
| ख-अष्टांगं स्थापत्य | ३५ | वास्तु-मार्मोपमर्म-निर्णयः | ५४-५५ |
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| विषयाः | पृष्ठाः | विषयाः | पृष्ठाः |
| मानसारदिशा वास्तु-भेदाः | ५५-५६ | **पताकादि षट्छन्दस्सु (स० सू)** षट्छन्दांसि | ७७ |
| मयमते वास्तु-भेदाः | ५६-५७ | मेरुविन्यासः | " |
| शिल्परत्ने वास्तु-भेदाः | ५७-५८ | खण्डमेरु-विन्यासः | " |
| शिल्परत्ने अवास्तुकार्म्मणज्ञानम् | ५८-५९ | पताका-विन्यासः | ७७-७८ |
| .... .... | .... | सूची-विन्यासः | ७८ |
| **माने** विश्वकर्मवास्तु-शास्त्रे मानव्यवस्था | ५९-६० | उद्दिष्ट-विन्यासः | " |
| | | नष्ट-विन्यासः | " |
| | | तेभ्यो गृहमूषासंख्यादिज्ञानम् | " |
| समरांगणदिशा-हस्तविभाजनम् | ६० | अपराजितदिशा—गृह-प्रासाद-संभूत-षट्छन्दभेदाः | " |
| मान-विभाजनम् | ६०-६१ | छन्दादिविकाशसंख्याधिकारः | ७८-८० |
| मान-प्रयोगः | ६१ | मेरुच्छन्दः | ८० |
| आपराजिती शैली | ६१-६३ | खण्डमेरुः | ८०-८१ |
| मानसारीया " | ६३-६४ | पताकाच्छन्दः | ८१ |
| मयमतीयापि " | ६४-६५ | सूची-छन्दः | " |
| शिल्परत्नीया तथा | ६५-६६ | उद्दिष्टछन्दः | " |
| **आयादिषड्वर्गाः** आयादीनां शरणं सामान्यम् | ६६-६७ | नष्टस्याप्रयोजनम् | " |
| प्राचीसाधने आयादीनां महत्वम् | | **द्वितीयः खण्डः ग्राम-नगर-दुर्गादिवास्तु** | ८२-१३० |
| विशेषतश्च योनेः | ६७ | **प्रथमः पटलः (औपोद्धातिकः) देशचयने** प्रशस्ता वास्तुभूमिः | ८२-९४ ८२ |
| आयादीनां निर्णायके द्वे सरणी मानसारीया समरांगणादि-तन्त्रसमुच्चयीया समरांगणदिशा आय-लक्षणम् | ६७-६८ | अप्रशस्ता वास्तुभूमिः | ८२ |
| व्यय-लक्षणम् | ६८ | खेटादिपुरविशेषोचिता देशाः देशभूमयश्च | ८२ ८३ |
| अंशक-लक्षणम् | " | पुर-निवेशे सुरम्यदेशचयनम् | ८३-८४ |
| तारा-लक्षणम् | ६८-६९ | शिल्परत्नदिशा पूर्गादिश्चतुर्धा भूमिः | ८४-८५ |
| षड्वर्गस्य समान्यम् | ६९ | **भूमि-संग्रहे—** | |
| तस्य च शुभाशुभम् | ६९ | अ—भू-परीक्षा | ८५-६० |
| अपराजितपृच्छायां | " | (i) गन्धोचिता भूमिः | ८५-८७ |
| अ. आयाधिकारः | ७०-७२ | (ii) वर्णोचिता " | " |
| ब. नक्षत्रराशि-चन्द्रमैत्र्यनुक्रमः | ७२-७४ | (iii) शब्दोचिता " | " |
| स. व्ययांशकताराग्रहजीवमृत्युसर्वबलम् | ७४-७७ | (iv) स्वादूचिता " | " |
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| विषयाः | पृष्ठाः | विषयाः | पृष्ठाः |
| (v) स्पर्शोचिता ,, | ,, | मयमते मानादिपरिखादिपुरस्सर-नगर-खेटादि— | |
| (vi) ऋतूचिता ,, | ,, | प्रभेदाः | १०८-११० |
| (vii) अप्रशास्ता भूमिः | ८७—६१ | **नगर-निवेशे च** | |
| ब—मृत्तिका-परीक्षा | ९१—६४ | १—मार्ग-विन्यासः | ११०-११२ |
| विभिन्ना प्रकाराः | ,, ,, | विश्वकर्म-दिशा— | |
| प्लवमुद्दिश्य भूमिसंज्ञाश्च | | पद्ममन्गरे प्रतोलीपुरस्सर- | |
| स—प्लव-परीक्षा | | राजवीथ्यादिवीथयः | ११० |
| टि० (१) तत्र ४४ तमे पृष्ठे दत्तास्ति | | सर्वतोभद्रे यथा | ,, |
| टि० (२) वास्तु-पूजन-बलिदान-हलकर्षणारोपणारोहणमांगलिक-प्रभृतीनि वास्तु-कृत्यानि तत्र भवन-खण्डे वक्ष्यमाणानीति नात्र निर्दिंष्टानि । | | प्रस्तरे यथा | ,, |
| | | चतुर्मुखे च यथेति दिक् | ,, |
| | | समरांगणदिशा— | |
| | | नगरस्य सप्तदश मार्गाः | |
| **द्वितीयः पटलः** | | तेषां संज्ञाः विन्यासाश्च | ११०-१११ |
| **ग्रामलक्षणं ग्राम-विन्यासश्च** | ६५-१०४ | मयमते नगर-विधाने मार्ग-संख्या | १११-११२ |
| विश्वकर्मीयाः— | | तत्रैव मार्ग-भेदेन दण्डकादि-पुर-भेदाः | ११२ |
| द्वादशग्रामाः | ९५ | मार्ग-चतुष्पथाः | ११२ |
| खेटादिवास्तुभूमिर्यथा | ६५-९६ | मार्गेषु जलभ्रमाः | ,, |
| मानसारीयं ग्राम-लक्षणं | ६६-६८ | २—नगर-निवेशे जातिवर्णाधिवासः | ११३-११६ |
| ततं एव नन्द्यावर्तस्य सविस्तरं लक्षणम् | ६८-१०२ | वि० वा०—दिशा | ११३ |
| मयमते ग्राम-प्रभेदाः | १०२-१०३ | स० सू०—दिशा | ११३-११४ |
| तत्रैव ग्राम-विन्यासश्च | ,, ,, | अ० पृ०—दिशा | ११४-११५ |
| शिल्प-लक्षणे— | | (क्रयविक्रययुतौकविन्यासः) | |
| वीथीः पुरस्कृत्य ग्राम-विन्यासभेदाः | १०३-१०४ | मयमते—अन्तरापणिकं यथा | ११५-११६ |
| **तृतीयः पटलः** | | ३—नगर-निवेशे देवतायतनानि | |
| **नगर लक्षणं नगर-निवेशश्च—** | १०५ १२४ | आरामोद्यानानि च | ११६—१२० |
| नगर-लक्षणं | | अ—देवगाराणि | |
| विश्वकर्म-वास्तु शास्त्रे— | | स० सू० | ११६-११८ |
| निगमादिनुपयोग्य-सप्तनगर-भेदाः | १०५ | अ० पृ० | ११८-११६ |
| तत्रैव सामान्यविंशति-नगर-प्रभेदाः | ,, | शिल्प० | ११९-१२० |
| समरांगणे नगरोपभेदाः | १०५-१०६ | ब—आरामोद्यानानानि | १२०-१२१ |
| समरांगणदिशा राष्ट्र-निवेश-पुरस्सरं एवं नगराणां निवेशः | १०६ | पादपारोपणस्य प्राचीना संस्था नगर-निवेशे तस्याः महन्महत्वम् | |
| अपराजितपृच्छायां— | | ४—नगर-निवेशे प्राकारादिविन्यासः | |
| विंशति-पुर-प्रभेदाः | ,, | (स०सू०) | १२१-१२३ |
| तेषां विशेषाश्च | १०६-७ | ५—नगर-निवेशे वर्ज्याः निवेशाः | १२३-१२४ |
| मानहारे नगर-भेदाः तेषां विशेषाश्च | १०७-१०८ | गर्हित-पुराणि तन्निवासफलञ्च | ,, |
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| विषयाः | पृष्ठाः | विषयाः | पृष्ठाः |
| (स० सू०) | १२३-१२४ | शिविर-वाहिनीमुख-स्थानीय-द्रोणक-सम्विद्धार्थक- | |
| छिन्नकर्णम् | ,, | कोलक-निगम-स्कन्धावारादयः | |
| विकर्णम् | ,, | पुनस्तत्रैव स्थित्यनुरूपे तेषां प्रभेदाः | |
| वज्राकृतिः | ,, | मयमते दुर्गभेदाः | १२८-१२९ |
| सूचीमुखं | ,, | तत्रैव दुर्गनिवेशस्य | ,, |
| वर्तुलम् | ,, | प्रकृष्टं प्रवचनम् | ,, |
| व्यजनाकारम् | ,, | शिल्परत्ने दुर्गभेदाः | १२९-३० |
| चापाकृतिधरम् | ,, | ग्राम-नगर-शोभायाम् | १३० |
| शकटद्विसमम् | ,, | ## तृतीयः खण्डः | |
| विस्तारद्विगुणायतम् | ,, | भवन-वास्तु | १३१-१७७ |
| विदिकूस्थम् | ,, | ## प्रथमः पटलः | |
| सर्पचक्रम् | ,, | प्रारम्भिकेषु | |
| (अ० पृ०) | १२४ | (अ) भूखननं हलकर्षणं | |
| सप्त दोषदाः पुरः | ,, | माङ्गलिकञ्च | १३१-१३४ |
| टि०—प्राचीन-पुर-निवेश-पद्धतौ राजहर्म्यादीनां | | (ब) गृहारम्भकाल-परीक्षणम् | १३४—१३६ |
| सभा-न्यायालय-वाजिाशाला-गजशाला-गोशाला- | | (स) कीलक-सूत्रपातादि-लक्षणम् | १३६-१४१ |
| चित्रशाला-पुस्तकालय-विद्याशालादीनां भवन- | | (द) बलिदान-विधि-लक्षणम् | १४१-१४२ |
| निवेश-स्यात्रैव प्रासंगिकत्व-मासीत्परं तस्य | | मण्डलकरणंकलशन्यसनञ्च | ,, |
| भवन-खण्डे वक्ष्यमाणत्वाद्न न दीयते । | | वास्तुदेवता-प्रकल्पन-पुरस्सरं | ,, |
| | | विश्वकर्मणः वास्तुदेवानाञ्च पूजा-विधिः | ,, |
| ## चतुर्थः पटलः | | स्थपत्यादीनां कर्मकाराणाञ्च पूजनादिकम् | ,, |
| दुर्ग-लक्षणं दुर्गनिवेशश्च | १२५—१३० | शान्तिबलिकर्माहाणि वास्त्वादीनि | ,, |
| दुर्गस्थापनम् | | शिलान्यास-लक्षणम् | १४२-१४५ |
| विश्वकर्म-वास्तु-शास्त्रे द्वादश दुर्गभेदाः | | विहितायनपक्ष-तिथिनक्षत्रादिः | १४२-१४३ |
| १—गिरिदुर्गम् | १२५ | प्रथमेष्टिका-लक्षणम् | १४३ |
| २—वनदुर्गम् | ,, | वर्जनीयाः शिलाः | १४३ |
| ३—जलदुर्गम् | ,, | नन्दादिकाश्चतस्रः शिलाः | ,, |
| ४—इरिणदुर्गम् | ,, | तद्देवताश्च | ,, |
| ५—दैवतदुर्गम् | १२६ | वेदीकल्पनम् | ,, |
| ६—८ एकमुख-द्विमुख-चतुर्मुखदुर्गाणि | ,, | नन्दाप्रतिष्ठापनविधिः | १४३-१४४ |
| ६—कूर्मदुर्गम् | ,, | उपशिलान्यासनम् | १४४ |
| १०—पारावतदुर्गम् | १२७ | शिलाङ्गाःप्रतिष्ठापनमन्त्रादिश्च | १४४—१४५ |
| ११—प्रभुदुर्गम् | ,, | द्रव्यसंग्रहणम् | |
| १२—युद्धदुर्गम् | ,, | (वि० वा०) | |
| समरांगणस्य दुर्गषट्कम् | १२७ | निर्माणद्रव्योपोद्घातः | |
| मानसारस्य दुर्गाष्टकम् | १२७-१२८ | द्रव्यं द्विविधम् | १४५ |
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| विषयाः | पृष्ठाः | विषयाः | पृष्ठाः |
| द्रव्यसंग्रहकालः वनप्रवेशमाङ्कलिकञ्च | ,, | सौधस्य | ,, |
| प्रशस्ताः देववृक्षाः | १४५-१४६ | अभिगुप्याख्यस्य | ,, |
| ,, मानववृक्षाः | १४६ | वातायनस्य | ,, |
| तेषां शिल्पिकार्य-प्राशस्त्यम् | ,, | अवलोकनस्य | ,, |
| अन्येषां वृक्षाणां प्राशस्त्याप्राशस्त्ये | ,, | उलोकस्य | १५४ |
| वृक्षच्छेदन-विधिः | १४६-१४७ | हर्म्यप्राकारस्य | ,, |
| द्रव्यानयनवनप्रवेशकालादिः (स० सू०) | १४७ | वितर्दिकायाः | ,, |
| वृक्षपरीक्षायां वर्जनीयवृक्षाः | ,, | ईहामृगस्य | ,, |
| तेषां वर्णास्नेहत्वगादिविचारः | ,, | निर्यूहस्य | ,, |
| वय-निर्धारणञ्च | ,, | बलीकस्य | ,, |
| गृहकर्महिताः वृक्षाः | १४८ | चतुश्शालत्रिशालद्विशालैकशालानाम् | ,, |
| अहिताश्च | ,, | शालायाः | ,, |
| वृक्षनक्षत्र-विज्ञानम् | ,, | वापीसंज्ञस्य | ,, |
| वृक्षच्छेदनविधिः | ,, | गर्भगृहस्य | ,, |
| तत्र शुभाशुभविलोकनम् | १४८-१४९ | उपस्थानाभिधस्य | ,, |
| वृक्षमण्डलज्ञानम् | १४९—१५० | प्रासादस्य | ,, |
| मण्डलगतानां जन्तूनाञ्च परिज्ञानम् | ,, | वलभ्याः | ,, |
| **द्वितीयः पटलः** | | अलिन्दस्य | ,, |
| **निर्वाणीयेषु —** | | वलभायाः | ,, |
| **( जन-निवेशे )** | | अपवरकस्य | ,, |
| भवनोत्पत्तिं तद्विकासञ्च | | शुद्धान्तस्य | ,, |
| प्रतिपादयतां भवन-पर्यायाणां | | .... | .... |
| सूची यथा | १५० | प्रतोल्याः | ,, |
| विषयाः | पृष्ठाः | कक्ष्यायाः | ,, |
| भवनजन्मनि (शाल-भवनोत्पत्तौ) | | कोष्ठकस्य | ,, |
| पुरावृत्तम् | १५०-१५२ | भित्तेः | ,, |
| तद्विकासे विविधशाल-भवनानामुपन्यासः | | महानसस्य | ,, |
| दशवर्गाः | १५२-१५३ | द्वारकोष्ठकस्य | ,, |
| शाल-भवन-संयोजनम् | १५३ | प्रवेशनस्य | ,, |
| भवनाङ्गानां निघण्टुः | १५३-१५६ | उदकभ्रमस्य | ,, |
| हर्म्यम् | १५३ | भवनाङ्गिरवना- | |
| सोपानेत्त्वादयः | ,, | जिराश्रमाजिराणाम् | ,, |
| सोपानस्य स्वरूपनिदेशः | ,, | देहल्याः | ,, |
| अधिरोहणस्य | ,, | द्वारपक्षस्य | ,, |
| निःश्रेण्याः | ,, | अर्गलागलसूच्योः | १५५ |
| काष्ठविटङ्कस्य | ,, | परिघफलकगवाक्षाणाम् | ,, |
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| विषयाः | पृष्ठाः | विषंयाः | पृष्ठाः |
| तोरणस्य तद्विशेषाणाञ्च ,, | १५ | भवनानां लक्षणम् | |
| सिंहकर्णस्य ,, | , | एकशालस्य उत्पत्तिप्रसरः | -१५७ |
| संयमनाख्यस्य ,, | , | प्रथमः प्रकारः | ,, |
| मरालपालीप्रणालीप्रद्वाराणां ,, | , | अलिन्दसंयोगादन्यः | १५७-१५८ |
| प्राकारस्य ,, | , | द्वितीयः प्रकारः | ,, |
| आस्यलकाख्यस्य ,, | , | तृतीयः प्रकारः | १५६ |
| अमेध्यभूमेः ,, | , | चतुर्थः प्रकारः | ,, |
| अवस्करस्य ,, | , | पञ्चमः प्रकारः | ,, |
| परिसरस्य ,, | , | षष्ठः प्रकारः | ,, |
| अट्टामिधस्य ,, | , | अन्तिमश्च विशिष्टः प्रकारः | १५६-१६० |
| अट्टालकस्य ,, | , | द्विशालस्य मुख्यभेदाः षट् | १६० |
| अट्टाल्याः ,, | , | भेदोपभेदाश्च | ,, |
| अट्टालिकायाः ,, | , | त्रिशालस्य मुख्यभेदाः चत्वारः | १६१ |
| काष्ठप्रणाल्याः ,, | , | भेदोपभेदाश्च | ,, |
| धारागृहस्य ,, | , | चतुश्शालस्य विप्रादिविषये मानविकल्पाः | १६२ |
| दर्पणगृहस्य ,, | १५६ | तेषु शालालिन्द-प्रमाणम् | ,, |
| पक्षद्वारस्य ,, | , | तेषु मूषावकोसिमयोः स्वरूपं फलञ्च | १६२-१६३ |
| गोपुरद्वारस्य ,, | , | मूषाभेदेन तेषां भेदप्रभेदाः | १६३—१६५ |
| उपकार्यायाः ,, | , | गृह-विशेष-मूषास्थितः | १६५ |
| क्षौमाख्यस्य ,, | , | **तृतीय पटलः** | |
| पुरीसंवरणस्य ,, | , | **निर्वाणीयेषु अन्येषु च** | |
| उपनिष्कलस्य ,, | , | जन-निवेशे प्रमुख-गृह-निवेशाः | |
| उद्यानस्य ,, | , | टि०-आवास-गृहेषु मुख्याष्टकं—स्नानगृहम्, | |
| जलोद्यानजलवेश्मनोः ,, | , | अलंकारणगृहं, द्रव्यस्थापनगृहं, पचन-गृहं, | |
| क्रीडागारस्य ,, | , | पूजागृहं, भोजनगृहं, शयनगृहं; धनगृह- | |
| विहारभूमेः ,, | , | ञ्चेति । | |
| चैत्यस्य ,, | , | तत्र केषाञ्चिल्लक्षणं यथा— | |
| सभायाः ,, | , | भोजनशालायाः | १६६ |
| गोष्ठस्य ,, | , | शय्यागृहस्य | १६७ |
| **गृह-भेदाः** | | **भवन-रचनाङ्गेषु---** | |
| गृहोत्पत्तिर्व्याख्या च | १५६-१५७ | द्वारम् | १६७-१६८ |
| द्वारभेदैः गृह-भेदाः | १५७ | द्वारशाखाः | १६८ |
| तेषां षट्छन्दांसि | ,, | द्वारशोभा | ,, |
| हर्म्य-व्याख्या | ,, | - तोरणम् | ,, |
| शांल-भवन-प्रभेदाः (स०सू०) | ,, | स्तम्भाः | १६९ |
| एकशालादिदशशालान्तशाल- | ,, | छाद्यम् | ,, |
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| विषयाः | पृष्ठाः | विषयाः | पृष्ठाः |
| भित्तिस्तम्भवयविधौ विशंतिश्चयगुणास्तद्विपरीताः दोषाश्चापि विशतिः | १७० | सभा | १८८ |
| | | अश्वशाला | १८८-१८९ |
| कुड्यचयनप्रकारः | ,, | गज-शाला | १८९ |
| कुड्यचयनदोषाः | १७०-१७१ | **राज-निवेशे प्रमुख-निवेशानां लक्षणम्** | |
| **सवन-भूषायां—** | | न्यायशाला | १९६-१६० |
| प्रयोज्याप्रयोज्यानि | १७१--१७४ | पौरा देशा च सभा | १६१ |
| अ, अप्रयोज्यानि | १७२-१७२ | भाण्डागारम् | १९१-१९२ |
| ब, प्रयोज्यानि | १७२—१७४ | आयुधागारम् | १९२-१९३ |
| **भवन-दोषेषु—द्वारगुणदोषाः** | | पुस्तक-शाला | १९३-१९४ |
| | | बसन्तगृहम् | १९४ |
| निवेक्षाः | १७४-१७५ | **द्वितीयः पटलः** | |
| भवन-दोषाः | १७५ | **पुर-निवेशोचित-द्वार-भवनादिलक्षणम्** | |
| अन्ये दोषाः | १७६ | प्रतोली-लक्षणम् | १६५-१९६ |
| प्लव-दोषाः | ,, | राजालयछत्रादिकम् | १६६-१९८ |
| दुष्टभवनानि | ,, | विद्या-शाला | १९८—१९६ |
| तत्फलानि | ,, | रङ्गशाला | १६९—२०० |
| भङ्गात्तत्फलञ्च | ,, | गोशाला | २००—२०१ |
| वेधः | १७७ | मृगशाला | २०१ |
| तोरण-भङ्गः | ,, | मार्ग-विश्रान्ति-स्थानम् | २०१—२०२ |
| कपोत-प्रवेशः | ,, | वाप्यः | २०२—२०३ |
| गृहदारुभंगशान्तिः | ,, | तटाकाः | २०३ |
| **चतुर्थः खण्डः** | | कूपाः | ,, |
| **राज-निवेशोचित-भवनासन-शय्या-यन्त्रादिलक्षणम्** | | **तृतीयः पटलः** | |
| **प्रथमः पटलः** | | **भवन-सज्जा** | |
| | | सर्वजनोचित-शयनासनादि—शयनानि | |
| **राज-भवन-लक्षणम्** | | शय्या-लक्षणम् | |
| सामान्य-निवेशः | १७८-१७६ | शय्या-द्रव्यम् | २०४ |
| अन्तःपुरम् | १७६ | निषिद्धद्रव्यम् | ,, |
| तत्रैव गवाक्षाः | १७९-१८० | गुणदोषाः | ,, |
| राज-वेश्म—सामान्यनिवेशः | १८०-१८१ | छिद्रभेदाः | ,, |
| प्रमुखराज-भवनानि | १८१ | आसनानि | ,, |
| तत्र विविधाः निवेक्षाः | १८१—१८६ | पादुकादयः | २०४-२०५ |
| राज-वेश्मनां षड् भेदाः | १८५ | मानसारदिशा—आसनानि | २०५ |
| विविधवर्गीय-राजवेश्ममालिका-प्रकराः | १८५-१८६ | शयनम्- | २०५ |
| | | सिंहासनम् | २०६ |
| राज-भवन-निवेशः | १८६—१८८ | तत्र तोरणम् | २०६-३०८ |
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| विषयाः | पृष्ठाः | विषयाः | पृष्ठाः |
| पञ्जराणि | २०८ | **धारा-गृह-यन्त्राणि** | |
| तोरणानि | २०८-२०९ | १. धारागृहम् | २१५-२१६ |
| **चतुर्थः पटलः** | | २. प्रवर्ष णम् | २१६-२१७ |
| **राज-भवन-सज्जा** | | ३. प्रणालगृहम् | २१७ |
| **यन्त्राणि** | | ४. जलमग्नम् | २१७-२१८ |
| यन्त्र-निर्वचनम् | २१० | ५. नन्द्यावर्तम् | २१८ |
| यन्त्र-बीजानि | ,, | **दोला-यन्त्राणि** | |
| यन्त्र-कोटयः | ,, | पञ्चविधानि | |
| पार्थिवादीनां पदार्थानां बीजबीजिभावविकल्पनानां नानात्वं | २१०-२११ | १. वसन्तः | २१८-२१९ |
| | | २. मदननिवासः | २१९-२२० |
| क्रियानिष्पादनाधिष्ठानम् | २११ | ३. वसन्तलिकः | २२० |
| यन्त्र-गुणाः | २११-२१२ | ४. विभ्रमकः | ,, |
| यन्त्र-कर्माणि | २१२ | ५. त्रिपुराख्यः | २२०-२२१ |
| **विविधानि यन्त्राणि** | | **पञ्चमः खण्डः** | |
| शय्या-प्रसर्पण-यन्त्रम् | २१२-२१३ | **प्रथमः पटलः** | |
| पुत्रिका-नाडी-प्रबोधनम् | २१३ | प्रासाद-वास्तु | |
| अद्भुतदर्शन-यन्त्रम् | ,, | **प्रासाद-लक्षणम्—सामान्यम्** | |
| गोलभ्रमण-यन्त्रम् | ,, | लोक-व्यवहारः | २२२ |
| दारवपुरुष-गमनम् | ,, | शास्त्रीयाश्च | ,, |
| तैल-प्रक्षेप-यन्त्रम् | ,, | प्रासाद-प्रयोजनम् | ,, |
| हस्ति-भूरिपान-यन्त्रम् | ,, | प्रासादोत्पत्तौ | ,, |
| शुक-गान-नर्तनादि | ,, | आध्यात्मिक-प्रतिकृतौ | ,, |
| अन्यानीदृशानि | ,, | अ. प्रासादः पुरुष-मूर्तिः | ,, |
| क्षेत्र-यन्त्रम् | ,, | ब. प्रासादो भागवती मूर्तिः | ,, |
| स्वनोद्गारि-यन्त्रम् | २१३-२१४ | भौतिक-प्रतिकृतौ च | ,, |
| अम्बरचारि विमानम् | २१४ | वैदिकी चितिः | ,, |
| रस-यन्त्रम् | ,, | वैदिक-सद्-संस्थाः | ,, |
| दास-यन्त्रम् | ,, | पाषाण-पट्टिकाः | ,, |
| द्वारपाल-यन्त्रम् | ,, | अवैदिक-देव-गृहाः | ,, |
| योध-यन्त्रम् | ,, | पर्वताकृतयः | ,, |
| **वारि-यन्त्राणि** | | गुहानिवासाश्च | ,, |
| १. पात-यन्त्रम् | २१५ | **प्रासादाः विमान-मूलाः** | २२२-२२३ |
| २. उच्छ्रायसमपातयन्त्रम् | ,, | तेषु वैराज-भेदाः चतुरश्राः ब्राह्म-प्रासादाः | २२४ |
| ३. पातसमोच्छ्राययन्त्रम् | ,, | कैलास-भेदाः वृत्ताः शैव-प्रासादाः | ,, |
| ४. उच्छ्रययन्त्रम् | ,, | पुष्पक-प्रभेदाः चतुरश्रायताः | ,, |
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| विषया: | पृष्ठा: | विषयां: | पृष्ठा: |
| कौवेरा: | २२४ | **पञ्चविधा: शतस्तम्भमण्डपा:** | |
| मणिक-प्रभेदा: वृत्तायता: वारुणा: | ,, | १. सूर्य्यकान्त: | २३९-२४० |
| त्रिविष्टप-प्रभेदा: वैष्णवा: | ,, | २. चन्द्रकान्त: | २४० |
| तेषु एकस्य स्वस्तिकस्य लक्षं। यथा | २२४-२२५ | ३. इन्द्रकान्त: | ,, |
| शिखरोत्तमा: | २२५ | ४. गन्धर्व्वकान्त: | ,, |
| भूमिका-युक्ता: | ,, | ५. ब्रह्मकान्त: | ,, |
| **प्रासाद-रचनायां** | | **प्रासाद-मण्डपानां द्वौ वर्गौ** | २४० |
| शिखरादिविरचना: | २२५-२२८ | तेषां भूषण-क्रिया | २४०-२४१ |
| भिट्ट: | २२५ | मानसार्रीय-मण्डपा: | ,, |
| पीठम् | २२५-२२६ | **प्रासाद-जगती-लक्षणम्** | |
| मण्डोवर: | २२६ | जगत्यामाहात्म्यम् | २४१ |
| शिखरम् | २२६-२२७ | आकारा: | ,, |
| कलश: | २२७-२२८ | प्रासाद-शोभा जगती | २४१-२४२ |
| ध्वजा | २२८ | जगत्य: | २४२ |
| **प्रासाद-द्रव्येषु** | | **प्रासाद-निवेश:** | |
| सुधा-लक्षणम् | २२८-२२९ | तथाहि विश्वकर्म-वास्तु-शास्त्रे | |
| लोह-लक्षणम् | २२९ | देव-प्रासाद-लक्षणम् | २४२ |
| **प्रासाद-भूषायाम्** | | तत्र गोपुर-प्रकारादीनां निवेशा: | २४२-२४३ |
| लुमा: | २२९-२३० | **प्रासादे गर्भगृह-निवेश-** | |
| वितानानि | २३० | **लक्षणम्** | २४३-२४४ |
| छात्रोदया: | ,, | **द्वितीय: पटल:** | |
| वृत्तश्च | ,, | **विमान-वास्तु** | |
| सिंहकर्णम् | ,, | **विमान-लक्षणम्** | २४५-२४६ |
| पत्रजातय: | ,, | **विमान-प्रासाद-निवेश:** | |
| स्तम्भ-चित्राणि | २३०-२३१ | विमान-प्रासादानां देवता: | २४६ |
| **प्रासाद-संस्तवनायाम्** | २३१-२३२ | तेषु जगत्यादिनिवेश: | २४६-२४७ |
| **कर्तृ-कारक-व्यवस्थायाम्** | | देवपरीवारस्थापनञ्च | २४७ |
| मेरो: वथा | २३२ | मानशारीय-विमान लक्षणम् | २४७-२५० |
| **प्रासाद-रचना-शैलीषु** | | **विमानेषु भूमि-लम्ब-** | |
| नागरादय: | २३२-२३४ | **विधानं यथा** | २५०-२५१ |
| **प्रासादस्य विभिन्ना: वर्गा:** | | **गोपुर-लक्षणम्** | |
| मेर्वादिर्विंशिका | २३४-२३५ | एकादिनवभौमगोपुर-विधानम् | २५१-२५३ |
| शिखरोत्तमा: | २३५-२३६ | **प्राकार-लक्षणम्** | २५३-२५५ |
| द्राविडा: | २३६-२३७ | **विमान-वैशिष्ट्ये** | |
| वावाटा: | २३७-२३८ | स्तूपिका | २५५ |
| भूमिजा: | २३८ | स्तूपिकील्म् | २५५-२५६ |
| **प्रासाद-मण्डप-लक्षणम्** | | लुपा | २५६ |
| मण्डपस्यावश्यकता | २३८-२३९ | **प्रासाद-निर्माणे** | |
| तेषां स्तम्भा: | २३९ | इष्टापूर्त्त-सिद्धि: | २५६-२५८ |
| तेषां प्रयोजनम् | ,, | | |
Cites (6)
- Samarāṅgaṇasūtradhāra — Bhoja, Sanskrit
- Mānasāra — Sanskrit
- Mayamata — Maya, Sanskrit
- Viśvakarmavāstuśāstra — Sanskrit
- Aparājitapṛcchā — Bhuvanadeva, Sanskrit
- Śilparatna — Śrīkumāra (Śilparatna) 1500, Sanskrit