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भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c10.1

भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c10.1

Language
Hindi

c10.1

भारतवर्ष के विद्वान् ई. स. की १४ वीं शताब्दी के पहिले ही अपने देश की प्राचीन लिपि ब्राह्मी तथा उससे निकली हुई ई. स. की छठी शताब्दी तक की लिपियों का पढ़ना भूल गये थे, परंतु पिछली अर्थात् ७ वीं शताब्दी से इधर की लिपियां, संस्कृत और प्राकृत के विद्वान, जिनको प्राचीन हस्तलिखित पुस्तकों के पढ़ने का अभ्यास था, यत्न करने से पढ़ सकते थे. ई. स. १३५६ में देहली के सुल्तान फ़ीरोज़शाह तुग़लक़ ने बड़े उत्साह के साथ टोपरा२ तथा मेरठ से अशोक के लेखों वाले दो विशाल स्तंभ उठवा कर असाधारण श्रम२ से देहली में लाकर एक (सवालक स्तंभ) को फ़ीरोज़शाह के कोटले में और दूसरे को 'कुश्क शिकार' (शिकार का महल) के पास३ खड़ा करवाया. उस ने उन स्तंभों पर के लेखों का आशय जानने के लिये बहुत से विद्वानों को एकत्र किया परंतु किसी से वे पढ़े न गये४. यह भी प्रसिद्धि है कि बादशाह अकबर को भी उक्त लेखों का आशय जानने की बहुत कुछ जिज्ञासा रही परंतु उस समय एक भी विद्वान ऐसा न था कि उनको पढ़ कर बादशाह की जिज्ञासा पूर्ण कर सकता.