भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c11.34
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c11.34
- Language
- Hindi
c11.34
उनके लिये स्वतंत्र संकेत और मात्रायें मिलती हैं वैसे ही प्राचीन काल में प्लुत स्वरों के लिये भी कोई विशेष चिह्न रहे होंगे जिनका अब पता नहीं चलता. जैसे वर्तमान नागरी में ‘ओ’ और ‘औ’ के, और गुजराती तथा मोडी (मराठी) में ‘ए’, ‘ऐ’, ‘ओ’ और ‘औ’ के मूल संकेत न रहने से ‘अ’ पर ही मात्रा लगा कर काम चलाया जाता है (ॲ, ॲे, ओ, औ-गुजराती) वैसे ही प्लुत के प्राचीन चिह्नों के लुप्त होने पर दीर्घ के आगे ३ का अंक लगाया जाने लगा हो. वस्तुतः संस्कृत साहित्य में भी प्लुत का प्रयोग क्रमशः बिलकुल उठ गया. संबोधन, वाक्यारंभ, यज्ञकर्म, मंत्रों के अंत, यज्ञ की आज्ञाएं, प्रत्युत्तर, किसी के कहे हुए वाक्य को दोहराने, विचारणीय विषय, प्रशंसा, आशीर्वाद, कोप, फटकारने, सदाचार के उल्लंघन आदि अवसरों पर वैदिक साहित्य और प्राचीन संस्कृत में प्लुत का प्रयोग होता था (पाणिनि, ८. २. ८२-१०८), परंतु पीछे से केवल संबोधन और प्रणाम के प्रत्युत्तर में ही इसका व्यवहार रह गया. पतंजलि ने व्याकरण न पढ़नेवालों को एक पुरानी गाथा उद्धृत करके डराया है कि यदि तुम अभिवादन के उत्तर में प्लुत करना न जानोगे तो तुम्हें स्त्रियों की तरह सादा प्रणाम किया जायगा. इस से यह तो स्पष्ट है कि स्त्रियों की बोलचाल से तो उस समय प्लुत उठ गया था परंतु पीछे से पुरुषों के व्यवहार से भी वह जाता रहा. केवल कहीं कहीं वेदों के पारायण में और प्रातिशाख्यों तथा व्याकरणों के नियमों में उसकी कथा मात्र बची है. ‘ए’, ‘ऐ’, ‘ओ’ और ‘औ’ के प्लुत, कहीं पूरे संध्यक्षर का प्लुत करने से, और कहीं ‘इ’ और ‘उ’ को छोड़ कर केवल ‘अ’ के प्लुत करने से बनते थे, जैसे अग्ने३ या अग्ना३इ.