भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c11.46
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c11.46
- Language
- Hindi
c11.46
शताब्दी के पीछे, लेखनशैली में अक्षरों के रूपों में परिवर्तन होते होते संयुक्ताक्षर ‘क्ष’ में ‘क्’ और ‘ष’ के मूल रूप अस्पष्ट होकर उसका एक विलक्षण ही रूप ‘क्ष’ बन गया तब बौद्धों ने ‘क्ष’ को भी वर्णों अर्थात् मातृकाओं (सिद्धमातृकाओं) में स्थान दिया. इसी तरह पीछे से संयुक्ताक्षर ‘ज्ञ’ के ‘ज्’ और ‘ञ’ के रूप अस्पष्ट होकर उसका एक विलक्षण रूप ‘ज्ञ’ बन गया तब उसको भी लोगों ने वर्णों में स्थान दिया. तंत्रग्रंथों में ‘क्ष’ और ‘ज्ञ’ की वर्णों अर्थात् मातृकाओं में संज्ञा की गई है परंतु ये दोनों सर्वथा वर्ण नहीं किंतु संयुक्तवर्ण हैं और उनके घटक दो दो अक्षरों के मूलरूप न रहने पर एक ही विलक्षण नया संकेत बन जाने से ही उनकी वर्णों में गणना हुई है जैसे कि वर्तमान काल में नागरी की वर्णमाला में ‘त्र’ की भी१.