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भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c13.32

भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c13.32

Language
Hindi

c13.32

यह लिपिपत्र 'उष्णीषविजयधारणी' नामक ताड़पत्र पर लिखी हुई पुस्तक के अंत में दी हुई पूरी वर्णमाला१, मि. बावर के प्राप्त किये हुए प्राचीन हस्तलिखित पुस्तकों२, मौखरी शर्ववर्मन् की आसीरगढ़ से मिली हुई मुद्रा३, मौखरी अनंतवर्मन् के २ लेखों४ तथा महानामन् के बुद्धगया के लेख५ से तय्यार किया गया है. 'उष्णीषविजयधारणी' के अंत की वर्णमाला के अक्षरों में अ, उ, ऋ, क, ख, ग, घ, ङ, च, ज, ट, ड, ढ, ण, त, थ, द, न, प, म, य, र, ल, व, श, ष, स और 'ह' नागरी के उन अक्षरों से बहुत कुछ मिलते हुए हैं और 'ब' तथा 'व' में भेद नहीं है. 'इ' की तीन बिंदियों में से नीचे की बिंदी को वर्तमान नागरी के 'उ' की मात्रा का सा रूप दिया है. 'इ' का यह रूप ई. स. की १३ वीं शताब्दी तक कहीं कहीं मिल आता है. 'ॠ', 'ॡ', 'लृ' और 'लॄ' पहिले पहिल इसी में मिलते हैं. वर्तमान नागरी के 'ऋ' और 'ॠ' इन्हीं से बने हैं परंतु वर्तमान 'लृ' और 'लॄ' के मूल संकेत नष्ट हो चुके हैं जिससे अब 'लृ' के साथ 'ऋ' और 'ॠ' की मात्राएं लगा कर काम चलाया जाता है. 'ओ' की आकृति नागरी के वर्तमान 'उ' से मिलती हुई है परंतु उसका सिर बाईं तरफ अधिक लंबा हो कर उसका बांया अंत नीचे को मुड़ा है. 'ओ' का यह रूप पिछले लेखों तथा प्राचीन हस्तलिखित पुस्तकों में भी मिलता है और कोई कोई लेखक अब तक 'ओं' लिखने में 'ऊ' के ऊपर रेफ तथा अनुस्वार लगा कर इस प्राचीन 'ओ' की स्मृति को जीवित रखते हैं. 'ङ', 'ज' और 'ट' के सिरों के दाहिनी तरफ़ के अंत में [Figure:] चिह्न लगाया है. वह अथवा उसका परिवर्तित रूप [Figure:] पिछले लेखों में मिलता है (देखो, लिपिपत्र २१, २३, २४, २८, २६, ३०, ३१, ३२, ३३, ३४). वर्तमान नागरी के 'ङ' में, 'ड' की आकृति बना कर उसके आगे बिंदी लगाई जाती है जो इसी चिह्न का स्थानांतर् है और 'ङ' तथा 'ड' की आकृति एकसा बन जाने पर उन अक्षरों का भेद बतलाने के लिये ही लगाई जाने लगी है. 'ओं' का सांकेतिक चिह्न नागरी के ७ के अंक सा है जो वास्तविक 'ओं' नहीं किंतु कल्पित चिह्न है. यह कई रूपांतरों के साथ पिछले लेखों तथा प्राचीन जैन, बौद्ध और ब्राह्मणों के हस्तलिखित पुस्तकों के प्रारंभ में मिलता हैं.