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भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c14.24

भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c14.24

Language
Hindi

c14.24

कि अक्षर की चौड़ाई होती है. *११वीं शताब्दी की नागरीलिपि वर्तमान नागरी से मिलती जुलती ही है और १२ वीं शताब्दी से वर्तमान नागरी बन गई, केवल 'इ', और 'ध' में ही कहीं पुरानापन नज़र आता है (देखो, लिपिपत्र २६ में जाजल्लदेव के लेख के अक्षर) और व्यंजनों के साथ जुड़नेवाली ए, ऐ, ओ और औ की मात्राओं में कभी कभी यह अंतर पाया जाता है कि 'ए' की मात्रा व्यंजन के पूर्व खड़ी लकीर के रूप में सिर की लकीर से सटी रहती है, 'ऐ' की मात्रा में एक तो वैसी ही खड़ी लकीर और दूसरी तिरछी रेखा व्यंजन के ऊपर लगाई जाती है (देखो, लिपिपत्र २७ में धारावर्ष के लेख से दिये हुए अक्षरों में 'ने' और 'लै'); 'ओ' की मात्रा दो खड़ी लकीरों से बनाई जाती है जिनमें से एक व्यंजन के पहिले और दूसरी उसके पीछे ('आ' की मात्रा की नांई) रहती है, और 'औ' में वैसी ही दो लकीरें तथा एक वक्र रेखा व्यंजन के ऊपर रहती हैं (देखो, लिपिपत्र २७ की मूल पंक्तियों की दूसरी पंक्ति में 'वंशोद्धरण' में 'शो', और पहिली पंक्ति में 'औमे' में 'औ' तथा 'चौल्लुक्य' में 'चौ'). उक्त ४ स्वरों की इस प्रकार की मात्राएं शिलालेखादि में कहीं कहीं ई. स. की १५ वीं शताब्दी तक और हस्तलिखित पुस्तकों में १६वीं शताब्दी के पीछे तक मिल आती हैं, जिनको राजपूताना के पुस्तकलेखक 'पड़ी मात्राएं' (पृष्ठमात्रा) कहते हैं. ई. स. की १२ वीं शताब्दी से लगा कर अब तक नागरी लिपि बहुधा एक ही रूप में चली आती है तो भी लेखनशैली और देशभेद से कुछ अंतर रह ही जाता है, जैसे कि जैन लेखकों के इ, उ, छ, झ, ठ, ड, ल और क्ष अक्षर (इ, उ, छ, झ, ठ, ड, ल, क्ष ), और दक्षिणवालों के अ, झ, ण, भ और क्ष अक्षर (अ, झ, ण, भ और क्ष) नागरी के उन अक्षरों से अब भी भिन्न हैं.