भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c14.25
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c14.25
- Language
- Hindi
c14.25
दक्षिण में वर्तमान नागरी से अधिक मिलती हुई लिपि उत्तरी भारतवर्ष की अपेक्षा पहिले, अर्थात् ई. स. की आठवीं शताब्दी से, मिलती है. पहिले पहिल वह राष्ट्रकूट (राठौड़) वंश के राजा दंतिदुर्ग के सामनगढ़१ से मिले हुए शक संवत् ६७५ (ई. स. ७५४) के दानपत्र में; उसके बाद राष्ट्रकूट राजा गोविंदराज (दूसरे) के समय के धुलिआ से मिले हुए शक सं. ७०१ (ई. स. ७८०) के दानपत्र२ में; तदनंतर पैठण३ और वणीगांव४ से मिले हुए राष्ट्रकूट गोविंद (तीसरे) के दानपत्रों में, जो क्रमशः शक संवत् ७१६ और ७३० (ई. स. ७६४ और ८०८) के हैं; बड़ौदे५ से मिले हुए गुजरात के राष्ट्रकूट ध्रुवराज (धारावर्ष, निरुपम) के श. सं. ७५७ (ई. स. ८३५) के दानपत्र में और राष्ट्रकूट अमोघवर्ष और उसके शिलारवंशी सामंत पुल्लशक्ति (प्रथम और द्वितीय) के समय के कन्हेरी के लेखों६ में, जो क्रमशः श. सं. ७६५ (?) और ७७३ (ई. स. ८४३ और ८५१) के हैं, पाई जाती है और उक्त समय के पीछे भी दक्षिण की लिपियों के साथ साथ बराबर मिलती चली आती है. उपर्युक्त सब ताम्रपत्र और शिलालेख भिन्न भिन्न पुरुषों के हाथ के लिखे हुए होने से उनकी लेखनशैली कुछ कुछ निराली है परंतु उनकी लिपि को नागरी कहने में कोई संकोच नहीं है. इस प्रकार नागरी लिपि ई. स. की ८ वीं शताब्दी के उत्तरार्ध से विस्तृत रूप में लिखी हुई मिलती है परंतु उससे पहिले भी उसका व्यवहार होना चाहिये क्योंकि गुजरात के गुर्जरवंशी राजा जयभट (तीसरे) के कलचुरि संवत् ४५६ (ई. स. ७०६) के दक्षिणी शैली की पश्चिमी लिपि के दानपत्र७ में उक्त राजा के हस्ताक्षर 'स्वहस्तो मम श्रीजयभटस्य' नागरी लिपि में ही है.