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भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c20: १४—ग्रंथ लिपि

भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c20

Language
Hindi

१४—ग्रंथ लिपि

c20.1

१ ये मूल पंक्तियां चेब्रोल् के लेख से हैं.

c20.2

४ ईं. एं; जि. २०, पृ. ३६२ और ३६३ के बीच के प्लेटों से.

c20.3

ई. स. की ७ वीं शताब्दी से (लिपिपत्र ५२ से ५६).

c20.4

२ एपि. इंडि; जि. ५, पृ. २६४ और २६७ के बीच के प्लेटों से.

c20.5

५ ये मूल पंक्तियां नामयनायक के दोनेपूंड़ि के दानपत्र से हैं.

c20.6

इस लिपि का प्रचार मद्रास इहाते के उत्तरी व दक्षिणी आर्काट, सलेम, त्रिचिनापली, मदुरा और तिन्नवेल्लि जिलों में तथा त्रावनकोर राज्य में ई. स. की सातवीं शताब्दी के आस पास से

c20.7

मिलता है और इसीमें क्रमशः परिवर्तन होते होते वर्तमान ग्रंथ लिपि बनी (देखो, ऊपर पृ. ४३-४४). मद्रास इहाते के जिन हिस्सों में तामिळ लिपि का, जिसमें वर्गों की अपूर्णता के कारण संस्कृत ग्रंथ लिखे नहीं जा सकते, प्रचार है वहां पर संस्कृत ग्रंथ इसी लिपि में लिखे जाते हैं इसीसे इसका नाम 'ग्रंथ लिपि' (संस्कृत ग्रंथों की लिपि) पड़ा हो. यह पल्लव, पांड्य, और चोल राजाओं, तथा चोल-वंशियों का राज्य छीननेवाले वेंगी के पूर्वी चालुक्य राजा राजेंद्रचोड़ के वंशजों, गंगावंशियों, बाणवंशियों, विजयनगर के यादवों आदि के शिलालेखों या ताम्रपत्रों में मिलती है. यह लिपि प्रारंभ में तेलुगु-कनड़ी से बहुत कुछ मिलती हुई थी (लिपिपत्र ५२ में दी हुई राजा राजसिंह के कांचीपुरम् के लेख की लिपि को लिपिपत्र ४३ में दी हुई पल्लववंशी विष्णुगोपवर्मन् के उरुपुवल्लिर के दानपत्न की लिपि से मिला कर देखो), परंतु पीछे से चलती कलम से लिखने तथा खड़ी और आड़ी लकीरों को चक्र या रामदार रूप देने (देखो, ऊपर पृ. ८०) और कहीं कहीं उनके प्रारंभ, बीच या अंत में ग्रंथि लगाने के कारण इसके रूपों में विलक्षणता आती गई जिससे वर्तमान ग्रंथ लिपि वर्तमान तेलुगु और कनड़ी लिपियों से बिल्कुल भिन्न हो गई.

c20.8

यह लिपिपत्र पल्लववंशी राजा नरसिंहवर्मन् के समय के मामल्लपुरम् के छोटे छोटे ६ लेखों१, उसी वंश के राजा राजसिंह के समय के कांचीपुरम् के कैलासनाथ नामक मंदिर के शिलालेख२ तथा कूरम से मिले हुए उसी वंश के राजा परमेश्वरवर्मन् के दानपत्र३ से तय्यार किया गया है. नरसिंह-वर्मन् के लेखों में '**अ**' के तीन रूप मिलते हैं. राजा राजसिंह के समय के कांचीपुरम् के लेख के '**अ**' की बाईं तरफ़ के गोलाईदार अंश को मूल अक्षर से मिला देने से '**अ**' में ग्रंथि बन गई है. '**अ**' के उक्त तीन रूपों में से दूसरा मुख्य है और उसीको त्वरा से लिखने से पहिला और तीसरा रूप बना है जिनमें ग्रंथि मध्य में लगाई है. विसर्ग के स्थानापन्न दोनों आड़ी लकीरों को एक खड़ी लकीर से जोड़ दिया है. राजा राजसिंह के समय के कांचीपुरम् के लेख के लिखनेवाले ने अपनी लेखनकला की निपुणता का खूब परिचय दिया है. '**अ**' की खड़ी लकीर को दाहिनी ओर घुमा कर सिर तक ऊपर बढ़ा दिया है, '**आ**' की मात्रा की खड़ी रेखा को सुंदर बनाने के लिये उसमें विलक्षण घुमाव डाला है (देखो, टा, णा, मा, ला). परमेश्वरवर्मन् के कूरम के दानपत्र की लिपि त्वरा से लिखी हुई है उसमें '**ए**' और '**ज**' के नीचे के भाग में ग्रंथि भी लगी है और अनुस्वार को अक्षर के ऊपर नहीं किंतु आगे धरा है.

c20.9

१ एपि. इं. जि. १०, पृ. ६ के पास का प्लेट, लेख संख्या २-१०.

c20.10

३ सा. इं. इं; जि. १, भाग ३, प्लेट ११-२.

c20.11

लिपिपत्र ५२ वें की मूल पंक्तियों४ का नागरी अक्षरांतर—

c20.12

२ सा. इं. इं; जि. १, भाग ३, प्लेट १.

c20.13

४ ये मूल पंक्तियां कूरम के दानपत्र से हैं.

c20.14

नरसिंहवर्मणः स्वयंमिव भगवतो नृपतिरूपावतो-
र्णस्य नरसिंहस्य मुहुर्पराजितचोळ(ल)केरल(ल)कळ(ल)भ्रपादद्य-
स्य सहस्रबाहोरिव समरशतनिर्विष्टसहस्रबाहु-
कर्मायाः परियळमंगळपूरप्रभृतिरणाविदग्धा(ग्धा)-

c20.15

लिपिपत्र ५३ वां.

c20.16

यह लिपिपत्र माबलीपुरम् के अतिरणचंडेश्वर नामक गुफामंदिर के लेख१, कशाकूड़ि से मिले हुए पल्लव राजा नंदिवर्मन् के दानपत्र२ और पांड्यवंशी राजा परांतक के समय के नारसिंगम् के लेख३ से, जो गत कलियुग संवत् ३८७१ (ई. स. ७७०) का है, तय्यार किया गया है. नंदिवर्मन् के दानपत्र के अक्षरों में से इ, ख, ग, ज, त और ब वर्तमान ग्रंथ लिपि के उक्त अक्षरों से कुछ कुछ मिलते हुए हैं.

c20.17

२ सु; सा. इं. इं; जि. २, भाग ३, प्लेट १३-१४, पंक्ति १-११४ से.

c20.18

लिपिपत्र ५३वें की मूल पंक्तियों४ का नागरी अक्षरांतर—

c20.19

३ ऎ. इं; जि. ८, पृ. ३२० के पास का प्लेट, लेखसंख्या १ से.

c20.20

लंकाजयाधरितरा[मपरा]क्रमश्रौरुदृप्तअ(श)त्रुकुलसंक्षयधूम-
केतुः वातापिनिर्जयविक्ल(ड)म्बितकुम्भजन्मा वीरस्ततोऽजनि
जयि(यी) नरसिंहवर्म्मा ॥ तस्मादजायत निजायतबाहुदण्ड-
ऽवध्वाशनो रिपुकुलस्य महेन्द्रवर्म्मा यस्मात्प्रभृ(भू)त्यल[म-

c20.21

लिपिपत्र ५४ वां.

c20.22

यह लिपिपत्र पल्लववंशी राजा नंदिवर्मन् (पल्लवमल्ल) के उदयेंदिरम् के दानपत्र५ और गंगवंशी राजा पृथ्वीपति (दूसरे) के वहीं के दानपत्र६ से तय्यार किया गया है. नंदिवर्मन् के दानपत्र के अक्षरों में से अ, इ, उ, ए, ख, ग, घ, च, ज, ठ, ड, ढ, ण, त, थ, ध, प, ब, भ, म, य, व, ष और स वर्तमान ग्रंथ लिपि से कुछ कुछ मिलते हुए हैं.

c20.23

६ सु; सा. इं. इं; जि. २, भाग ३, प्लेट १६, पंक्ति १-७१ से.

c20.24

लिपिपत्र ५४वें की मूल पंक्तियों७ का नागरी अक्षरांतर—

c20.25

४ ये मूल पंक्तियां कशाकूड़ि के दानपत्र से हैं.

c20.26

७ ये मूल पंक्तियां नंदिवर्मन् के उदयेंदिरम् के दानपत्र से हैं.

c20.27

[अ](श्रो) स्वस्ति सुमेरुगि[रि]मूर्द्धनि प्रवरयोगब-
द्धासनं जगत्त्र(त्त्र)यविभूतये रविशशांकनेत्रद्व-
यमुमासहितमादरादुदयचन्द्रलक्ष्मौ(क्ष्मी)प्रदम्(दं) सदाशि-
वमहन्नमामि शिरसा जटाधारिणम् ॥[१] श्रीमान्-
नेकराभुवि(भूमि)षु पल्लवाय राज्यप्रदः परहि-

c20.28

लिपिपत्र ५५ वां.

c20.29

५ इं. ऎं; जि. ८, पृ. २७४ और २७६ के बीच के प्लेट, पंक्ति १-१०५ से.

c20.30

यह लिपिपत्र राजा कुलोत्तुंगचोलदेव के चिदंबरम् के लेख८, विक्रमचोड़ के समय के शेविल्लि-मेडु के लेख९ और बाणवंशी राजा विक्रमादित्य दूसरे (विजयबाहु) के उदयेंदिरम् के दानपत्र१० से तय्यार किया गया है. इस लिपिपत्र में दिये हुए अक्षरों में से कई एक वर्तमान ग्रंथाक्षरों से मिलते जुलते हैं (इस लिपिपत्र को लिपिपत्र ८० में दी हुई वर्तमान ग्रंथ लिपि से मिला कर देखो).

c20.31

१ ऎ. इं; जि. १०, पृ. १२ के पास के प्लेट से.

c20.32

८ ऎ. इं; जि. ६, पृ. २२८ के पास के प्लेट से.

c20.33

९ ऎ. इं; जि. ५, पृ. १०४ के पास का प्लेट, लेख A से.

c20.34

१० ऎ. इं; जि. ३, पृ. ७६ और ७७ के बीच के प्लेटों से.

c20.35

लिपिपत्र ५५वें की मूल पंक्तियों१ का नागरी अक्षरांतर—

c20.36

क्षि(क्षौ)रोदम् मथितम् मनोभिरतुलम्(लं) देवासुरैर्मंदरं
हित्वाक्षिप्त इवाञ्जनाद्रिरिव यस्तत्राधिकम्(कं) राज-
ते यो भोगि(गौ)न्द्रनिषिष्टमूत्ति(त्तिं)रनिशम् भूयोमृतस्या-
प्नये रक्ष्रे[द्द्व]वः सुरदृ(दृ)न्दवन्दितपत(द)हद्वः स्त(न्दस्त)

c20.37

लिपिपत्र ५६ वां.

c20.38

यह लिपिपत्र पांड्यवंशी राजा सुंदरपांड्य के श्रीरंगम् के लेख२, आलंणूं‌डि से मिले हुए विजय-नगर के यादव राजा विरूपाक्ष के शक सं. १३०५ (ई. स. १३८३) के दानपत्र३ और वहीं के श्रीगिरि-भूपाल के शक सं. १३४६ (ई. स. १४२४) के दानपत्र४ से तय्यार किया गया है. इस लिपिपत्र में दिये हुए अक्षरों में से अ, आ, इ, उ, ऊ, ऋ, ए, ओ, क, ख, ग, घ, ङ, च, ज, ठ, ड, ण, त, थ, द, ध, न, प, फ, ब, भ, म, य, र, ल, व, श, ष, स, ह और ळ वर्तमान ग्रंथ लिपि के उक्त अक्षरों से मिलते जुलते ही हैं. ई. स. की १४ वीं शताब्दी के पीछे थोड़ा सा और अंतर पड़ने पर वर्तमान ग्रंथ लिपि बनी.

c20.39

२ ऍ. इं; जि. ३, पृ. १४ के पास के सेट से.

c20.40

३ एं. इं; जि. ३, पृ. २२८ के पास के प्लेट से.

c20.41

लिपिपत्र ५६ वें की मूल पंक्तियों५ का नागरी अक्षरांतर—

c20.42

हरिः ओम् स्वस्ति श्रीः येनासौ
करुणामनीयत दशां श्रीरंगपत्मा(द्मा)करः
कृत्वा तम् भुवनान्तरप्रणायिनं करुणा-